भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 649 में से

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६४ मनुस्मृति । जिसने (जज्ञान एव) प्रकट होतेही (स्पृधः) स्पर्धा करनेवाले पूतनादि शत्रुओं को (व्यबाधत) बाधित किया। (अद्रिं) गोवर्धन पर्वत को (अवशिश्चद्) धारण किया। (सस्यदः) धान्य देनेवाले वर्षते मेघों को (अवसृजत्) विसर्जित किया। (स्वपस्यया) अपनी माया से (पृथुं) महान् (नाकं) इन्द्र को (अस्तभ्नात्) स्तम्भित किया। (वीरः) महावीर होकर भी (अभिपौंस्यं) पौरुषसाध्य (रणं) भारत युद्ध को निरस्त्र (प्रापश्यत्) देखा। ‘द्वे विरूपे चरतः स्वर्थे अन्यान्‍या वत्समुपधापयेते । हरिरन्यस्यां भवति स्वधावा- ञ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुवर्चाः ॥’ (अन्यान्‍या) अलग अलग (स्वर्थे) कार्य में तत्पर (विरूपे) निराली छविवाले (द्वे) वे दो बालक (चरतः) विचर रहे हैं। (वत्सं) बछरों को (उपधापयेते) समीप में दूध पिलावरहे हैं। उनमें (अन्यस्यां) एक (स्वधावान्) अखण्डैश्वर्य (हरिः) श्यामवर्ण (भवति) है, (अन्यस्यां) दूसरा (सुवर्चाः) तेजस्वी (शुक्रः) गौरवर्ण (ददृशे) दिखलाई देता है। ‘पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परियातो अध्वरम्। विश्वान्यन्यो भुवनानि चष्ट ऋतून्यन्यो विदधज्जायते पुनः ॥’ तैत्तिरीयश्रुति.

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