मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें' भूमिका । ६७ और दशावतार का संग्राहक यह श्लोक है— ' मत्स्यः कूर्मोऽथ वाराहो नरसिंहोऽथ वामनः । रामो रामश्च रामश्च बुद्धः कल्की च ते दश ॥ ' उक्त अवतारों से औपासनिक नाम-रूप-लिङ्ग का बोध स्पष्टरूप से होता है । परन्तु वैदिक निघण्टु में ऐसे नाम नहीं प्राप्त होते जिनसे चतुर्भुजादि आकार का परिचय हो; विष्णु आदि नाम प्राप्त होकर भी पूर्वकाण्ड में अग्नि आदि अन्य देवता के समान हविर्मात्र के भागी हैं; उत्तरकाण्ड में निरा- कार हैं; ' अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ' इत्यादि स्थल में उपास- नार्थ साकार होकर भी किसी नियत आकार के बोधक नहीं हैं; जहां विष्णु आदि नाम नामान्तर के साथ पढ़े हैं—जैसे ' आग्नावैष्णवं—' इत्यादि—वहां पर भी अर्थान्तर के बोधक हैं; और ' यथाभिमतध्यानाद्वा ' इत्यादि दार्शनिक लिङ्ग भी नियत आकार के व्यवस्थापक नहीं हैं। ऐसी दशा में विष्णु आदि पदार्थ के उपबृंहक इतिहास-पुराण ही शरण हैं; उनमें जिस आकार का जो उपबृंहक प्रकरण है उसके अनुसार आकार-प्रतिपादक नाम और सहपठित निराकार-प्रतिपादक नाम, व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दशा की सिद्धि के लिये पर्यायरूप मानने चाहिये । अतएव अग्निपुराण आदि के आधार से रचे नाम-लिङ्गानुशासनों ( कोषों ) में ब्रह्मादि देवताओं के नाम एकत्र किये गये, जिनमें वैदिक सिद्धान्त- सिद्ध भेदक और अभेदक ये दोनों नाम हैं । यह विषय आगे स्पष्ट होगा ।