भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

भूमिका । ६६

`से उत्पन्न हुए; और जड़ तथा चेतन रूप से विभक्त स्थावर- जङ्गमात्मक पदार्थ के भीतर ऊष्मा, बाहर प्रकाश की आवश्य- कता के कारण अग्नीषोमात्मक सूर्य उत्पन्न हुए; पदार्थ और उसकी अवस्था सिद्धि के लिये गणेश उत्पन्न हुए; पदार्थों के यथायोग्य अवस्थान के निमित्त शक्ति उत्पन्न हुई । उक्त ब्रह्म- कार्य-उत्पत्ति को शक्ति में अन्तर्भूत मान कर परमेश्वर की विष्णु आदि पञ्चदेवतात्मक उपासना प्रवृत्त हुई, जिसका विस्तार विष्णुपुराण, शिवपुराण, मार्कण्डेयपुराण, सूर्यपुराण और गणेशपुराण में भली भांति किया है । किं बहुना; सारे पुराण, उपपुराण और इतिहासों का उपसंहार इन्हीं विष्णु- शिव-शक्ति-गणेश तथा सूर्य की विभूतियों में हुआ है। जैसे पदार्थ के उत्पत्ति आदि तीन भाव-विकार से ब्रह्मा आदि तीन देवता कहे हैं वैसे ही पदार्थ के ऊष्मा तथा प्रकाश के कारण अन्य भाव-विकार से सूर्य, और नियमित भाव-विकार के लाभार्थ गणेश कहे हैं । और भाव-विकार ही से वेदान्त-दर्शन में परमेश्वर का तटस्थ-लक्षण किया है । शब्दार्थरूप जगत् में यह अर्थ-सृष्टि की व्यवस्था है, एवं शब्द-सृष्टि की भी व्यवस्था जाननी चाहिये ।


१ पदार्थ की अवस्था । २ "जायतेऽस्ति, विपरिणमते वर्धते,ऽपक्षीयते विनश्यति" वाष्र्यायणि । ३ 'विनायकः कर्म विघ्न--' याज्ञवल्क्य । ४ 'जन्माद्यस्य यतः' वेदव्यास । ५ 'नित्यानन्दवपुर्निरन्तरगलत्पञ्चाशदर्णैः क्रमाद् व्याप्तं येन चराचरात्मकमिदं शब्दार्थरूपं जगत् । शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यमन्तर्गतं तद्वोऽव्यादनिशं शशाङ्कसदृशं वाचामधीशं महः ॥' शारदातिलककार ।