मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७० मनुस्मृति । परमेश्वरैक्य । चित्त के अत्यन्त चञ्चल होने से परमेश्वर की निराकारोपासना पूर्वकाल में भी दुर्घट थी, वर्तमान काल में तो अत्यन्त दुर्घट क्या बल्कि असम्भव सी है । शिव महिमा में कहा है— ‘ अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो- : रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि । : स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य त्रिपयः : पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥’ : अतएव मध्यमाधिकारी और मन्दाधिकारी के चित्तविश्रा- : मार्थ पञ्चदेवात्मक साकारोपासना वेददृष्टि से कही है और : उन पञ्चदेवताओं में श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के अनुसार : भेद नहीं है, किन्तु अभेद ही है । इस विषय में पहिले कुछ : श्रुतियां दिखलाई जाती हैं— : ‘ इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु- : रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । : एकं सद् बहुधा विप्रा वदन्ति : अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥’ : ( ऋ० सं० २ अ० ३ अं० २२ अनु० ) : ‘ तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । : तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ॥’ : ( य० सं० ३२ । १ ) : ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ : १ ‘ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथिवलवद्दृढम् ’ ( गीता ६ । ३४ ) : २-३ वर्तमान काल के उपासक मध्यम तथा मन्द नाम से चिढ़ेंगे क्योंकि उनके : विचार में निराकारोपासना मौसी का घर है ।