भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 649 में से

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· भूमिका । ७१ स॑ ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥' १ ( कै० उ० प्रथम ख० ८ म० ) तथा, गायत्री-मन्त्र-प्रतिपाद्य एकही ब्रह्म सन्ध्या-प्रकरण में काल और स्थान भेद से ब्रह्मा-विष्णु-शिव रूप से ध्येय कहा है— ‘ पूर्वा संध्या तु गायत्री सावित्री मध्यमा स्मृता । या भवेत्पश्चिमा संध्या सा तु देवी सरस्वती ॥ रक्ता भवति गायत्री सावित्री शुक्लवर्णिका । कृष्णा सरस्वती ज्ञेया संध्या-त्रयमुदाहृतम् ॥ ’ ‘ नीलोत्पलदलश्यामं नाभिदेशे प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महात्मानं पूरकेणैव चिन्तयेत् ॥ कुम्भकेन हृदिस्थाने ध्यायेच्च कमलासनम् । ब्रह्माणं रक्तगौराङ्गं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥ रेचकेनेश्वरं ध्यायेल्ललाटस्थं महेश्वरम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निर्मलं पापनाशनम् ॥ ’ आचारादर्श । तथा, ‘ पञ्चायतन ’ पूजा में विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य, इन पांचों ब्रह्मधारा में प्रत्येक को प्रधान मान कर अन्य चारों को गौण माना है; इस प्रकार प्रत्येक देवता प्रधान और गौण सिद्ध होता है, यह बात परमार्थ-दृष्टि से अभेद मानने ही से संगत होती है अन्यथा मत्तप्रलाप समझी जायगी । इसी अभिप्राय से वेदव्यास ने विष्णुपुराण आदि १ इसी मन्त्र के पूर्व में ‘ उमासहायं—’ यह उक्त मन्त्र है । २ आदि शब्द से कहीं पुराण और कहीं पुराण के प्रकरण का ग्रहण करना चाहिये ।

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