भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 649 में से

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८६ मनुस्मृति । ' यथाविधानेन पठन् सामगायमविच्युतम् । सावधानस्तदभ्यासात् परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ अपरान्तकमुल्लोप्यं मद्रकं मकरी तथा । औवेणकं सरोविन्दुमुत्तरं गीतकानि च ॥ ऋग्गाथा पाणिका दक्षविहिता ब्रह्मगीतिका । गेयमेतत्तदभ्यासकरणान्मोक्षसंज्ञितम् ॥ वीणावादनतत्त्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः । तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति ॥' प्रायश्चित्ताध्याय. ( १२-११४ ) इत्यादि वचनों से स्पष्ट ज्ञात होता है कि विषयवासना की बहुतायत से इस समय में देवमन्दिरों में जो नृत्य गान प्रवृत्त होरहे हैं और जो रासलीला 'आदि जगमगा रही हैं, वे सब परमार्थ में भक्ति के साधन न होकर विक्षेप वा व्यभिचार के अवश्य साधन होते हैं । इसी अभिप्राय से कहा है— ' उपासना ध्यानधृती समाधिः स्वर्गापवर्गौ चरितानि दूरे । १ देखिये श्रावण मास में अयोध्या आदि पुण्यक्षेत्रों में दोलोत्सव ( झूला ) की बहार । अत एव कहना पड़ा— ' वैधानि कर्माणि यथेष्टमावान्योद्वापनीत्याहह कल्पयित्वा । प्रायेण संप्रत्यपरे वरेण्या विश्वंभराचीं परिपीडयन्ति ॥ विधीयते यत्र न वेदपाठो न वा पुराणागमसद्गतानि । उद्योतितातौद्यविशानमद्गः किं ? सा सपर्या परमार्थकोटिः ॥ • श्रद्धाच भक्तिर्विहिता यदर्थे सा मूर्तिपूजा क्रमशोऽपयाति । यत्राद्भुता वैषयिकाः प्रवाहाः सा भूरिभावं भजते समन्तात् ॥ ' चातुर्वर्ण्यशिक्षा.

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