भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

भूमिका। ८७ इतोऽधुना साधुविधां धुनाना शृङ्गारिणां वल्गति रासलीला ॥' चातुर्वर्ण्यशिक्षा० भक्ति और भक्तों के प्रसङ्ग में यह हठात् कहना पड़ता है कि वर्तमानकाल में प्रायः अपने अपने वर्ग को निराले ढंग पर चलाने के लिये निराले ही कुछ नियम कायम करने पड़े। इसी कारण से वैष्णव-शैवों में आपस में विरोध बढ़ने लगा, इनमें क्या वैष्णवों में भी आपस में नहीं बनती। पूर्वकाल में जो वैष्णव-शैव आदि सहमत होकर रहते थे वे सब बातें अब उठगईं, परस्पर विद्रोह होने लगा। यहां तक कि पुराने ग्रन्थों में प्रक्षेप कर दिये गये और पुराने के नाम से नये ग्रन्थ बना डाले गये। ऋषियों ने जिसलिये भक्ति को कहा वहां वह न रहकर माला-तिलक पर जा डटी। ये नये वैष्णव लोग शैव, शिवभस्म, रुद्राक्ष आदि की निन्दा करने लगे और शैव वैष्णवों के ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि की निन्दा करने लगे। परन्तु विष्णु की निन्दा नहीं, क्योंकि शैव लोग शिव और विष्णु का भेदभाव नहीं मानते जो कोई मानते हों वे शैव ही नहीं हैं और न ऐसे शैव वा वैष्णव ही का होना शास्त्र से सिद्ध है। यही पुराने वैष्णवों का भी मत है। देखिये श्रीतुलसी- दासजी ने अपने रामायण में कहा है— शिवद्रोही मम दास कहावै । सो नर सपनेउ मोहिं न पावै ॥ और इसी अभिप्राय से यह सुभाषित प्रसिद्ध है—

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 89, कुल 649 में से · BharatKosha