मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८८ मनुस्मृति । 'उभयोरेका प्रकृतिः प्रत्ययभेदाच्च भिन्नवद्भाति । कश्चिन्मूढः कल्पयति हरिहरभेदं विना शास्त्रम् ॥' इत्यादि । और उक्त वैष्णवलोग, जो चार संप्रदायों में विभक्त हैं और जिन संप्रदायों की जाग्रति भारत के अन्तिम सम्राट् पृथ्विराज चौहान के बाद हुई है; उनमें से पहिले संप्रदायवाले श्रीविशिष्टाद्वैतवादी (आचारी लोग) अपने मत ग्रन्थों में, जो श्रुति स्मृति पुराण इतिहास में धक्का लगानेवाली विष्णुभक्ति प्रकट की है उसका दिग्दर्शन किया जाता है— 'तापादिपञ्चसंस्कारैर्महाभागवताः स्मृताः । चक्रादिहेतिभिस्तप्तं ताप इत्यभिधीयते ॥ संस्कारः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयः पुण्ड्रधारणम् । तृतीयो नामकरणं वैष्णवं पावनं परम् ॥ सर्वज्ञानं चतुर्थं स्यान्मन्त्राध्ययनमुच्यते । पञ्चमस्तु हरेः पूजा पञ्चरात्रोक्तमार्गतः ॥ तदीयार्चनपर्यन्तं हरेराराधनं स्मृतम् । .इत्येवमादिसंस्कारी महाभागवतः स्मृतः ॥ अन्येत्ववैष्णवाः प्रोक्ता हीनास्तापादिभिर्द्विजाः । तथा ह्यवैष्णवा ज्ञेयाः प्राकृताः पापकारिणः ॥ वादशास्त्रेषु निपुणास्ते वै निरयगामिनः । अवैष्णवत्वं विप्राणां महापातकसंमितम् ॥ १ आशय । विष्णु और शिव, इन दोनों का भक्तवत्सलता आदि एक ही स्वभाव है, पर ज्ञानभेद से दो मत मिलते हैं सो यह मानना सर्वनाश का निशान है । एवं, विष्णु शिववाचक-हरि हर नाम से भी वही बात सिद्ध होती है-हरि हर की एक प्रकृति ( धातु ) है प्रत्यय ( अ-इ ) भेद से दो नाम मालूम होते हैं, वह शास्त्र विरुद्ध है ।