मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ६१ नहीं । यह बात मनु, याज्ञवल्क्य, व्यास आदि के वाक्यों से विवेक रखनेवालों को अज्ञात नहीं है इसीलिये अधिक कहना व्यर्थ है । और उक्त वाक्यों से जो चक्रशंख से शरीर का अङ्कन तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र का धारण विधान किया है उसमें से चक्र-शङ्ख वा धनुर्वाण से वैष्णवों का अङ्कन; १ और त्रिशूल- डमरू से शैवों का अङ्कन; त्रै२वर्णिकों का धर्म नहीं है, किंतु अन्यों का धर्म है । और ऊर्ध्वपुण्ड्र का धारण त्रैवर्णिक-धर्म भी है; परन्तु नाना द्रव्यों से नानाप्रकार का ऊर्ध्वपुण्ड्र सर्व- वैष्णव-मान्य नहीं है, अत एव प्रत्येक संप्रदायों के ऊर्ध्वपुण्ड्रों के आकार पुराणों में नहीं प्राप्त होते । अङ्कन के विषय में कतिपय श्रुति प्रमाण दी जाती हैं उनमें से पहली श्रुति यह है— ‘ पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । अतप्ततनूर्नतदामोऽश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समासत ॥ ’ ( ऋक् सं० ७ अष्टक ३ अध्या० ८ वर्ग ५ मं० ) . इस मन्त्र से अङ्कन कथमपि नहीं सिद्ध होता । यह सोम के सम्बन्ध का मन्त्र है ( देखिये वेदभाष्य ) दूसरी श्रुति- ‘ सहोवाच याज्ञवल्क्यः, तस्मात् पुमान् आत्महिताय हरिं भजेत् । सुश्लोकमौलेर्वर्माप्यग्निना संदधते ॥ ’ यह श्रुति ‘ शतपथ ’ के नाम से निर्णयसिन्धु में लिखी है; परंतु ‘ शतपथ ’ में नहीं प्राप्त होती । १-२ धनुर्वाण से अङ्कन अर्थात् तप्तमुद्रा धारण वैरागियों में और त्रिशूल- डमरू से अङ्कन लिङ्गायतों में प्रसिद्ध है । ३ शिवकेशवयोरङ्कान् शङ्खचक्रादिकान् द्विजः । न धारयेत मतिमान् वैदिके वर्त्मनि स्थितः ॥ ’ निर्णयसिन्धु २ परि.