मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ मनुस्मृति ।
तीसरी श्रुति- ‘ प्रतद्विष्णो अब्जचक्रे सुतप्ते जन्माम्भोधी तर्तवे चर्षणीन्द्राः । मूले बाह्वोर्दधन्त्ये पुराणा तु लिङ्गान्यङ्गे तप्तायुधान्यर्पयन्त ॥ ’ यह श्रुति सामवेद के नाम से लिखी है, परंतु उसमें नहीं प्राप्त होती । यदि कहीं ‘ अल्लोपनिषद् ’ के समान कल्पित भाग में मिलै तो भलेही मिलो । और- ‘ अग्निहोत्रं तथा नित्यं वेदस्याध्ययनं तथा । ब्राह्मणस्य तथैवेदं तप्तमुद्रादिधारणम् ॥ ’ यह पद्मपुराण का वचन है, इसमें वेदपाठ-अग्निहोत्र के तुल्य अङ्कन-विधि लिखी है, यदि वास्तव में ऐसी ही होती तो वेदपाठ अग्निहोत्र के समान अङ्कनविधि भी ब्राह्मण, कल्पसूत्र और मन्वादि ग्रन्थ में अभ्रान्त प्राप्त होती और वेदपाठ अग्नि- होत्र के समान अङ्कन के विषय में किसी को संदेह न उत्पन्न होता । परंतु इस अङ्कन ( तप्तमुद्राधारण ) को श्रीरामानुजा- चार्य तथा श्रीमध्वाचार्य के संप्रदायवालों को छोड़कर अन्यसंप्रदायी भी नहीं मानते तो औरों की क्या कथा है ? ऊर्ध्वपुण्ड्र विशेष के विषय में ये वचन मिलते हैं- नारद उवाच । ऊर्ध्वपुण्ड्रविधिं द्रव्यमन्त्रस्थानादिसंयुतम् । ब्रूहि मे देवदेवेश यथाहं धारयामि ( वै ) ॥ ७६ ॥ श्रीवासुदेव उवाच । श्वेतं पीतं तथा रक्तं द्रव्यं तु त्रिविधं स्मृतम् । पुण्ड्राणां धारणे विप्र मयैव प्रकटीकृतम् ॥ ७७ ॥ तेषु रक्तं श्रिया देव्या मत्स्नेहात्प्रकटीकृतम् ।