मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
२७० मनुस्मृति । अपह्नवे तद्द्विगुणं तन्मनोरनुशासनम् ॥ १३६ ॥ वशिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद्वित्तविवर्धिनीम् । अशीतिभागं गृह्णीयान्मासाद्वार्धुषिकः शते ॥ १४० ॥ द्विकं शतं वा गृह्णीयात्सतां धर्ममनुस्मरन् । द्विकं शतं हि गृह्णानो न भवत्यर्थकिल्बिषी ॥ १४१ ॥ द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पञ्चकं च शतं समम् । मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ॥ १४२ ॥ यदि ऋणी सभा में महाजन का रुपया देना क़बूल करे तो सैकड़े पांच दण्ड देने योग्य है। और इन्कार करे तो सैकड़े दश दण्ड देवे। वशिष्ठ के नियमानुसार सैकड़े का अस्सीवां भाग (सवा रुपया सैकड़ा) व्याज लेवे । अथवा दो रुपया सैकड़ा व्याज़ लेवे। दो रुपया सैकड़ा ब्याज लेने से दोष नहीं होता । ब्राह्मण आदि चारों वर्णों से क्रम से दो, तीन, चार और पांच रुपये सैकड़ा माहवारी ब्याज ग्रहण करे ॥ १३६-१४२ ॥ न त्वेवाधौ सोपकारे कौसीदीं वृद्धिमाप्नुयात् । न चाधेः कालसंरोधान्निसर्गोऽस्ति न विक्रयः ॥ १४३ ॥ न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमुत्सृजेत् । मूल्येन तोषयेच्चैनमाधिस्तेनोऽन्यथा भवेत् ॥ १४४ ॥ आधिश्चोपनिधिश्चोभौ न कालात्ययमहर्हतः । अवहार्यौ भवेतां तौ दीर्घकालमवस्थितौ ॥ १४५ ॥ संप्रीत्या भुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन । धेनुरुष्ट्रो वहन्नश्वो यश्च दम्यः प्रयुज्यते ॥ १४६ ॥
आठवां अध्याय । २७९
आठवां अध्याय । २७९ यत्किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी । भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ॥ १४७ ॥ भूमि, गौ, धन आदि भोग के पदार्थ यदि आधि-गिरवी महा- जन के रक्खे तो महाजन को व्याज न मिले और नियमित समय में ऋणी छुड़ा न सके तो उसको महाजन बेंच या किसीको दे नहीं सकता । आधि-गिरवी की वस्तु को ऋणी की आज्ञा बिना न वर्ते यदि काम में लावे तो व्याज छोड़ देवे और टूट फूटजाय तो ऋणीको उसका बदला धन आदि देकर खुशकरे नहीं तो चोर माना जाता है । आधि-गिरवी और उपनिधि-अमानत के पदार्थ बहुत दिन पड़े रहें तो भी अवधि नहीं बीत जाती । जब मालिक चाहे तभी ले सकता है । गौ, ऊँट, घोड़ा वगैरह किसीने प्रेम से वर्तने को दिए हों और वह वर्तता हो तो भी उसके मालिक का हक बना रहता है । यदि किसी वस्तु को दूसरे लोग दश वर्ष तक वर्तते रहें और उसका मालिक चुपचाप देखाकरे, तो फिर वह उसको नहीं पासकता ॥ १४३-१४७ ॥ अजडश्चेदपौगण्डो विषये चास्य भुज्यते । भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद्द्रव्यमर्हति ॥ १४८ ॥ आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिः स्त्रियः । राजस्वं श्रोत्रियस्वं च नं भोगेन प्रणश्यति ॥ १४६ ॥ यः स्वामिनाऽननुज्ञातमाधिं भुङ्क्ते विचक्षणः । तेनार्धवृद्धिर्मोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्कृतिः ॥१५०॥ वस्तु का स्वामी पागल न हो और नादान न हो पर उसका वस्तु दूसरा भोगता रहे तो न्याय से उसका अधिकार नहीं रहता । भोगनेवाला पाजाता है । गिरवी वस्तु, सीमा, बालक का धन, धरोहर, प्रसन्नता से भोगार्थ दिया धन, स्त्री और राजा का धन,
२७२ मनुस्मृति ।
श्रोत्रिय का धन इनको दूसरा भोगे तो भी स्वामी का अधिकार नहीं जाता । जो चालाक मनुष्य आधि को बिना स्वामी के कहे भोगता है उसको आधा ब्याज छोड़ देना चाहिए क्योंकि उसका आधा भोग से पट गया ॥ १४८-१५० ॥ कुसीदवृद्धिद्वैगुण्यं नात्येति सकृदाहता । धान्ये सदे लवे वाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम् ॥ १५१ ॥ कृतानुसारादधिका व्यतिरिक्ता न सिध्यति । कुसीदपथमाहुस्तं पञ्चकं शतमर्हति ॥ १५२ ॥ – नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरेत् । चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिता कायिका च या ॥१५३॥ ऋणं दातुमशक्तो यः कर्त्तुमिच्छेत्पुनः क्रियाम् । स दत्त्वा निर्जितां वृद्धिं करणं परिवर्तयेत् ॥ १५४ ॥ अदर्शयित्वा तत्रैव हिरण्यं परिवर्तयेत् । यावती संभवेद्वृद्धिस्तावतीं दातुमर्हति ॥ १५५ ॥ कर्ज़ा के रुपयों का सूद एकबार लेने पर, ऋण का धन दूने से अधिक नहीं लिया जा सकता । और धान्य, वृक्ष के मूल, फल, ऊन और वाहन पांचगुने से अधिक नहीं लिये जाते हैं । जो सूद का ठहराव हो चुका है उससे अधिक शास्त्र के खिलाफ़ नहीं मिल सकता है । ब्याज का क़ायदा यही है कि-अधिक से अधिक पांच रुपये सैकड़ा लिया जा सकता है । एक वर्ष में ब्याज मिला- कर, मूल धन दूना हो जाय तो उतना ब्याज न लेय 'व्याज का ब्याज न लेय' नियतकाल बीतने पर दूना तिगुना आदि लेने का ठहराव न करे और उससे कोई काम धोखा देकर न करावे । जो कर्ज़दार पुराना कर्ज़ा अदा न करसके और नया व्यवहार चलाना चाहे तो पुराने काग़ज़ को बदलाकर नया करा लेवे । लेकिन
आठवां अध्याय । २७३
आठवां अध्याय । २७३ ब्याज भी न देसके तो उसको मूलधन में जोड़ देय । जो रक़म हो उसका सूद दिया करे ॥ १५१-१५५ ॥ चक्रवृद्धिं समारूढो देशकालव्यवस्थितः । अतिक्रामन् देशकालौ न तत्फलमवाप्नुयात् ॥ १५६ ॥ समुद्रयानकुशला देशकालार्थदर्शिनः । स्थापयन्ति तु यां वृद्धिं सा तत्राधिगमं प्रति ॥१५७॥ यो यस्य प्रतिभूस्तिष्ठेद्दर्शनायेह मानवः । अदर्शयन् स तं तस्य प्रयच्छेत्स्वधनादृणम् ॥ १५८ ॥ चक्रवृद्धि का आश्रय करनेवाला महाजन देश-काल के नियम से ही ब्याज आदि पावे, मियाद गुज़रने पर पाने योग्य नहीं है। समुद्र आदि के रास्ते देश-विदेश में व्यापार चतुर महाजन जो आय-व्यय के अनुसार भाड़ा ब्याज आदि तै करे वही प्रमाण है। जो मनुष्य जिसको हाज़िर करने के लिए प्रतिभू— ज़ामिन हो वह उसे हाज़िर न कर सके तो अपने पास से उसका ऋण चुकावे ॥ १५६-१५८ ॥ प्रातिभाव्यं वृथादानमाक्षिकं सौरिकं च यत् । दण्डशुल्कावशेषं च न पुत्रो दातुमर्हति ॥ १५६ ॥ दर्शनप्रातिभाव्ये तु विधिः स्यात्पूर्वचोदितः । दानप्रतिभुवि प्रेते दायादानपि दापयेत् ॥ १६० ॥ अदातरि पुनर्दाता विज्ञातप्रकृतावृणम् । पश्चात्प्रतिभुवि प्रेते परीप्सेत्केन हेतुना ॥ १६१ ॥ निरादिष्टधनश्चेत्तु प्रतिभूः स्यादलंघनः । स्वधनादेव तद्दद्यान्निरादिष्ट इति स्थितिः ॥ १६२ ॥ ३५
२७४ : मनुस्मृति । मत्तोन्मत्तार्ताध्यधीनर्बालेन स्थविरेण वा । असंबंधकृतश्चैव व्यवहारो न सिध्यति ॥ १६३ ॥ सत्या न भाषा भवति यद्यपि स्यात्प्रतिष्ठिता । बहिश्चेद्भाष्यते धर्मान्नियताद्व्यावहारिकात्॥ १६४॥ ज़मानत का धन, फ़िजूल दान, जुये का रुपया, मद्य का रुपया और जुर्माना का रुपया पिता के मरने पर उसके बदले, पुनः नहीं दे सकता । सिर्फ़ हाज़िर करने की ज़मानत में पहली बात जाने । परन्तु ऋणी के बदले में क़र्ज़ अदा करने की ज़मानत वाला मर जाय तो उसके वारिसों से भी दिलावे । क़र्ज़दार क़र्ज़ न दे और ज़ामिन मरजाय तो महाजन कैसे अपना रुपया वसूल करे ? किसी से नहीं। यदि ज़ामिन को ऋणी रुपया सौंप गया हो और उसके पास भी खूब धन हो तो ज़मानती के मरने पर उसका पुत्र ऋण चुकावे—यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है। नशाबाज़, पागल, दुःखी, पराधीन, बालक, बुड्ढा और सामर्थ्य के बाहर प्रतिज्ञा करनेवाले का व्यवहार ठीक नहीं माना जाता । आपस की लिखा- पढ़ी या ज़बानी ठहरी भी कोई बात यदि धर्म—क़ानून और रिवाज़ के खिलाफ़ हो तो सच्ची नहीं मानी जाती ॥ १५६-१६४ ॥ योगाधमनविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् । यत्र वाप्युपधिं पश्येत्तत्सर्वं विनिवर्तयेत् ॥ १६५ ॥ ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्बार्थे कृतो व्ययः । दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रविभक्तैरपि स्वतः ॥ १६६ ॥ कुटुम्बार्थेऽप्यधीनोऽपि व्यवहारं यमाचरेत् । स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान्न विचालयेत् ॥ १६७॥ कपट से किया हुआ बन्धक ( गिरवी ) विक्रय, दान, प्रतिग्रह और निक्षेप—धरोहर कोभी लौटा देना चाहिए। यदि ऋणी मर
आठवां अध्याय । २७५
आठवां अध्याय । २७५ गया हो और ऋण का द्रव्य कुटुम्ब में लगाया हो तो उसके बान्धव मिले या जुदे हों पर अपने धन से ऋण देवें । कोई अधीन पुरुष भी स्वामी के कुटुम्ब के लिए देश या परदेश में लेन-देन करले तो स्वामी उसको कबूल करलेवे, इन्कार न करे ॥ १६५-१६७ ॥ बलाद्दत्तं बलाद्भुक्तं बलाद्यच्चापि लेखितम् । सर्व्वान् बलकृतानर्थानकृतान् मनुरब्रवीत् ॥ १६८ ॥ त्रयः परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणः प्रतिभूः कुलम् । चत्वारस्तूपचीयन्ते विप्र आढ्यो वणिङ्नृपः ॥ १६६ ॥ अनादेयं नाददीत परिक्षीणोऽपि पार्थिवः । न चादेयं समृद्धोऽपि सूक्ष्ममप्यर्थमुत्सृजेत् ॥ १७०॥ अनादेयस्य चादानादादेयस्य च वर्जनात् । दौर्बल्यं ख्याप्यते राज्ञः स प्रेत्येह च नश्यति ॥ १७१ ॥ स्वादानाद्वर्णसंसर्गात्स्वबलानां च रक्षणात् । बलं संजायते राज्ञः स प्रेत्येह च वर्धते ॥ १७२ ॥ बलात्कार से दिया, बलात्कार से भोग किया, कुछ लिखाया या कुछ किसी से कराया न किये के समान मनुजी ने कहा है । तीन दूसरे के लिए दुःख पाते हैं—साक्षी, ज़ामिन और ऋणी के कुटुम्बी । और चार दूसरे के कारण बढ़ते हैं—ब्राह्मण, धनी, बनिया और राजा । राजा निर्धन होकर भी अनुचित धन आदि न लेवे और धनी होकर भी लेने योग्य धन थोड़ा भी न छोड़े । न लेने लायक़ वस्तु को लेने और लेने लायक़ को छोड़ने से राजा का ढीलापन ज़ाहिर होता है। और अपयश पाकर नष्ट होजाता है। उचित धन लेने से प्रजाओं को वर्णसंकर न होने देने से और दुर्बलों की रक्षा करने से राजा को बल प्राप्त होता है। और लोक-परलोक में सुख भोगता है ॥ १६८-१७२ ॥
२७६ मनुस्मृति । तस्माद्यम इव स्वामी स्वयं हित्वा प्रियाप्रिये । वर्तेत याम्यया वृत्त्या जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ १७३ ॥ यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्कुर्यान्नराधिपः । अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥ १७४ ॥ कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति । प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ १७५ ॥ इसलिए राजा यमराज के समान अपना प्रिय और अप्रिय छोड़कर क्रोध और इन्द्रियों को वश में करके, समभाव प्रजापर रक्खे। जो राजा मूर्खता से अधर्म के कार्य करता है, उस दुष्ट को शत्रु शीघ्रही वश में कर लेते हैं। परन्तु जो काम, क्रोध को वश में करके, धर्म से कार्यों को देखता है, उसकी प्रजा समुद्र के नदियों की भांति अनुगामिनी होती हैं ॥ १७३-१७५ ॥ यः साधयन्तं छन्देन वेदयेद्धनिकं नृपे । स राज्ञा तच्चतुर्भागं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ १७६ ॥ कर्मणापि समं कुर्याद्धनिकायाधमर्णिकः । समोऽवकृष्टजातिस्तु दद्याच्छ्रेयांस्तु तच्छनैः ॥ १७७ ॥ अनेन विधिना राजा मिथो विवदतां नृणाम् । साक्षिप्रत्ययसिद्धानि कार्याणि समतां नयेत् ॥ १७८ ॥ यदि ऋणी (अपने को राजप्रिय मानकर) राजा से कहे कि धनी ज़बरदस्ती ऋण वसूल करता है तोभी राजा उसका धन दिलावे और ऋणीपर ऋण का चौथाई दण्ड करे। समानजाति वा हीनजाति कर्ज़दार, महाजन का धन उसके यहां काम करके चुका दे और महाजन से ऊंची जाति का ऋणी धीरे धीरे अदा करदेवे। इसभांति राजा आपस में झगड़ा करनेवालों का निर्णय साक्षी, लेख आदि के आधार से करे ॥ १७६-१७८ ॥
आठवां अध्याय। २७७
आठवां अध्याय। २७७ कुलजे वृत्तसंपन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि । महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ १७६ ॥ यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः । स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः ॥ १८० ॥ यो निक्षेपं याच्यमानो निक्षेतुर्न प्रयच्छति । स याच्यः प्राङ्विवाकेन तन्निक्षेपुरसन्निधौ ॥ १८१ ॥ साक्ष्यरूपे प्रणिधिभिर्वयोरूपसमन्वितैः । अपदेशैश्च संन्यस्य हिरण्यं तस्य तत्त्वतः ॥ १८२ ॥ स यदि प्रतिपद्येत यथान्यस्तं यथाकृतम् । न तत्र विद्यते किंचिद्यत्परैरभियुज्यते ॥ १८३ ॥ निक्षेप-धरोहर-अमानत रखना । कुलीन, सदाचार, धर्मज्ञ, सत्यवादी, कुटुम्बी, धनी और प्रति- ष्ठित पुरुष के पास निक्षेप-धरोहर रखना चाहिए। जो मनुष्य जिसके यहां जो द्रव्य जिसप्रकार रक्खे, उसको उसीप्रकार लेना उचित है। क्योंकि-जैसा देना, वैसा लेना। जो धरोहर रखनेवाले की वस्तु मांगने पर नहीं देता, उससे न्यायकर्त्ता राज- पुरुष रखनेवाले के पीछे मांगे। धरोहर के समय साक्षी न हो, तो राजा किसी वृद्ध-प्रामाणिक कर्मचारी से कुछ वस्तु किसी बहाने से उसके यहां रखवावे और थोड़ेही दिनों में मँगवाले। यदि वह राजकर्मचारी अपनी रक्खी वस्तु ठीक ठीक मांगने पर पा जावे तो जो धरोहर न पाने की नालिश करे उसको झूठा समझे ॥ १७६-१८३ ॥ तेषां न दद्याद्यदि तु तद्धिरण्यं यथाविधि । उभौ निगृह्य दाप्यःस्यादिति धर्मस्य धारणा ॥ १८४ ॥
२७८ मनुस्मृति। निक्षेपोपनिधी नित्यं न देयौ प्रत्यनन्तरे । नश्यन्ते विनिपाते तावनिपाते त्वनाशिनौ ॥ १८५ ॥ स्वयमेव तु यो दद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे । न स राज्ञा नियोक्तव्यो न निक्षेतुश्च बन्धुभिः ॥१८६॥ अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम् । विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिसाधयेत् ॥ १८७ ॥ निक्षेपेष्वेषु सर्वेषु विधिः स्यात्परिसाधने । समुद्रे नाप्नुयात्किञ्चिद्यदि तस्मान्न संहरेत् ॥ १८८ ॥ चौरैर्हृतं जलेनोढमग्निना दग्धमेव वा । न दद्याद्यदि तस्मात्स न संहरति किंचन ॥ १८६ ॥ निक्षेपस्यापहर्त्तारमनिक्षेप्तारमेव च । सर्वैरुपायैरन्विच्छेच्छपथैश्चैव वैदिकैः ॥ १६० ॥ यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते । तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ वा तत्समं दमम् ॥ १६१ ॥ और यदि वह ठीक ठीक न देवे तो राजा पकड़कर दोनों की धरोहर दिलवावे। खुली या मुहर लगी धरोहर या मांगी वस्तु रखनेवाले की वस्तु उसके वारिसों को न देवे, क्योंकि रखनेवाले की मृत्यु होजाने से धरोहर नष्ट हो जाती है। जीता हो तो मिल सकती है। परन्तु धरोहर रखनेवाले की मृत्यु होजाने पर, यदि साहूकार खुशी से उसके वारिसों को दे देय, तो कम देने का दावा वारिस या राजा न चलावे। उस धन को प्रसन्नता से कम ज्यादा का कपट छोड़कर, स्वीकार करले। यही सब धरोहरों का नियम है जोकि बिना मुहर रक्खी गई है और मुहरवाली में कोई शक नहीं होती। अमानत की वस्तु को चोर ले जाय, जल में
आठवां अध्याय । २७६
आठवां अध्याय । २७६ बह जाय, आग में जल जाय तो यदि साहूकार ने उसमें से कुछ न लिया हो, तो देनी नहीं पड़ती। जो धरोहर न लौटावे या जो बिना रक्खेही जाल से मांगे उन दोनों का साम आदि उपाय और वैदिक शपथों (हलफ़) से राजा निर्णय करे। जो धरोहर नहीं देता, या जो बिना रक्खे ही मांगता है, उन दोनों को राजा चोर के समान दण्ड देवे और धरोहर के बराबर जुर्माना करे ॥ १८४-१६१ ॥ निक्षेपस्यापहर्त्तारं तत्समं दापयेद्दमम् । तथोपनिधिहर्त्तारमविशेषेण पार्थिवः ॥ १६२ ॥ उपदाभिश्च यः कश्चित्परद्रव्यं हरेन्नरः । स सहायः स हन्तव्यः प्रकाशं विविधैर्वधैः ॥ १६३ ॥ निक्षेपो यः कृतो येन यावांश्च कुलसन्निधौ । तावानेव स विज्ञेयो विब्रुवन् दण्डमर्हति ॥ १६४ ॥ मिथोदायः कृतो येन गृहीतो मिथ एव वा । मिथ एव प्रदातव्यो यथादायस्तथा ग्रहः ॥ १६५ ॥ निक्षिप्तस्य धनस्यैवं प्रीत्योपनिहितस्य च । राजा विनिर्णयं कुर्यादक्षिपन्न्यासधारिणम् ॥ १६६ ॥ धरोहर और उपनिधि मारलेनेवालों को भी राजा यही दण्ड देवे। छल, कपट करके पराया धन हरनेवालों को उनके मदद- गारों के साथ सबके सामने अनेक पीड़ा दण्ड देवे। गवाहों के सामने जितना धरोहर हो उतना स्वीकार करने से पीछे, बखेड़ा करनेवाला दण्डनीय होता है। जिसने एकान्त में धरोहर रक्खी और एकान्त में ली हो, वह एकान्त में ही देना चाहिए। जैसे लेवे, वैसे देवे। धरोहर और प्रेमसे भोगार्थ दिए धन का फ़ैसला ऐसा करना चाहिए, जिसमें धरोहर करनेवाले को कोई दुःख न पहुँचे ॥ १६२-१६६ ॥
२८० मनुस्मृति । विक्रीणीते परस्य स्वं योऽस्वामी स्वाम्यसंमतः । न तं नयेत साक्ष्यं तु स्तेनमस्तेनमानिनम् ॥ १९७ ॥ अवहार्यो भवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम् । निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम्॥ १९८॥ अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एव वा । अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथास्थितिः ॥ १९६ ॥ दूसरे की वस्तु विना मालिक की आज्ञा जिसने बेंची हो उस चोर व साहूकार को विना गवाह चोर की भांति दण्ड देवे । दूसरे की वस्तु बेंचनेवाला यदि उस धन के मालिक के वंश में हो तो छः सौ पण दण्ड देवे और सम्बन्धी या बेंचने का अधिकार न रखता हो तो चोर के मुवाफ़िक़ दण्ड योग्य है । इस प्रकार विना मालिक की आज्ञा, बेंचा या दियाहुआ कोई पदार्थ नाजायज़ है । यही धर्मशास्त्र (क़ानून) की मर्यादा है ॥ १९७–१९६ ॥ सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् । आगमः कारणं तत्र न सम्भोग इति स्थितिः ॥ २०० ॥ विक्रियाद्यो धनं किञ्चिद् गृह्णीयात्कुलसन्निधौ । क्रयेण स विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम् ॥ २०१ ॥ अथ मूलमनाहार्यं प्रकाशक्रयशोधितः । अदण्ड्यो मुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम् ॥ २०२ ॥ नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमहति । न चासारं न च न्यूनं न दूरेण तिरोहितम् ॥ २०३ ॥ जिसको कोई वस्तु भोगते देखे पर खरीदते न देखा हो तो दूसरे का खरीद का लेख आदि प्रमाण होगा। भोग प्रमाण न होगा। यह व्यवहार की मर्यादा है। जो ज़ाहिर तौर से विकती
आठवां अध्याय । २८१
आठवां अध्याय । २८१ चीज़ को कुछ खरीद करे और पीछे कोई बखेड़ा उठे तो खरीदार निर्दोष है और उसको वह वस्तु पानी चाहिए। माल का मालिक न होकर बेंचनेवाले को यदि खरीदनेवाला न ला सके पर बहुतों के सामने खरीदना साबित करदे तो दण्ड योग्य नहीं है। और उस खोई वस्तु का मालिक वापस ले सकता है। एक वस्तु दूसरी के रूप में मिलती हो तो उसको दूसरे के धोखे बेंचना ठीक नहीं है और सड़ी, तौल में कम, बिना दिखलाये, अच्छी वस्तु के नीचे खराब ढककर बेंचना अनुचित है ॥ २००-२०३ ॥ अन्यां चेद्दर्शयित्वान्यां वोढुः कन्या प्रदीयते । उभे ते एकशुल्केन वहेदित्यब्रवीन्मनुः ॥ २०४ ॥ नोन्मत्ताया न कुष्ठिन्या न च या स्पृष्टमैथुना । पूर्वं दोषानभिख्याप्य प्रदाता दण्डमर्हति ॥ २०५ ॥ ऋत्विग् यदि वृतो यज्ञे स्वकर्म परिहापयेत् । तस्य कर्मानुरूपेण देयोऽंशः सहकर्तृभिः ॥ २०६ ॥ दक्षिणासु च दत्तासु स्वकर्म परिहापयन् । कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत् ॥ २०७ ॥ एक कन्या दिखाकर दूसरी किसी का विवाह करदे तो दोनों का एकही मूल्य में विवाह कर लिया जाय, मनु की आज्ञा है। पागल, कोढ़िन, किसी से भुक्त हो तो न बतलाने से कन्यादान वाला दण्ड योग्य होता है। यज्ञ में वरण किया हुआ ऋत्विक् किसी कारण से अपना कर्म न पूरा करसके तो दूसरों के साथ में उसको भी कर्मानुसार दक्षिणा देवे। सब दक्षिणा दी गई हों और रोगादिवश कर्म छोड़ दे तो दूसरे से पूरा कराले ॥ २०४-२०७॥ यस्मिन्कर्मणि यास्तु स्युरुक्ताः प्रत्यङ्गदक्षिणाः । स एव ता आददीत भजेरन् सर्व एव वा ॥ २०८ ॥ ३६
तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ॥ २१० ॥
३८२ मनुस्मृति । रथं हरेत वाध्वर्युर्ब्रह्माधाने च वाजिनम् । होता वापि हरेदश्वमुद्गाता चाप्यनःक्रये ॥ २०६ ॥ सर्वेषामर्थिनो मुख्यास्तदर्धेनार्थिनोऽपरे । तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ॥ २१० ॥ संभूय स्वानि कर्माणि कुर्वद्भिरिह मानवैः । अनेन विधियोगेन कर्तव्यांशप्रकल्पना ॥ २११ ॥ आधान आदि कर्मों के जिन अङ्गों की जो दक्षिणा हों उनको कर्म करानेवाले अलग अलग लें अथवा बाँट लेवें। आधान में रथ अध्वर्यु, घोड़ा ब्रह्मा या होता लेवे और सोम खरीदकर गाड़ी में आया हो तो गाड़ी उद्गाता पावे । यज्ञ के सोलह ऋत्विजों में होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा ये चार मुख्य ऋत्विज् पूर्ण दक्षिणा में आधी के अधिकारी हैं-४८ गौ देवे। दूसरे, मैत्रावरुण आदि चार को उसका आधा-२४ गौ, तीसरे अच्छावाक् आदि चार को तृतीयांश-१६ गौ और चौथे ग्रावस्तुत आदि को चतु- र्थांश-१२ गौ देय । इस प्रकार सोलह ऋत्विज् मिलकर कर्म करें तो अपना अपना भाग बाँट लेवें ॥ २०८-२११ ॥ धर्मार्थं येन दत्तं स्यात्कस्मैचिद्याचते धनम् । पश्चाच्च न तथा तत्स्यान्न देयं तस्य तद्भवेत् ॥ २१२ ॥ यदि संसाधयेत्तत्तु दर्पाल्लोभेन वा पुनः । राज्ञा दाप्यः सुवर्णं स्यात्तस्य स्तेयस्य निष्कृतिः॥२१३॥ दत्तस्यैषोदिता धर्म्या यथावदनपकिया । अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वेतनस्यानपक्रियाम् ॥ २१४ ॥ . किसी याचक को धर्मार्थ किसी ने कुछ देना कहा हो पर वह कर्म न करे तो उसको प्रतिज्ञात धन न देवे । जो याचक गर्व या
आठवां अध्याय । २८३
आठवां अध्याय । २८३ लोभ से उस धन का दावा करे तो राजा, चोर मान कर एक सुवर्ण उस पर जुर्माना करे। इस प्रकार दिये धन को लौटाने का निर्णय धर्मानुसार किया है। अब नौकर को वेतन न देने का निर्णय कहा जायगा ॥ २१२-२१४ ॥ भृतोऽनार्त्तो न कुर्याद्यो दर्पात्कर्म यथोदितम् । स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौ न देयं चास्य वेतनम्॥२१५॥ नौकर का वेतन-तनख्वाह । जो नौकर बिना बीमारी के घमंड से ठहराव के अनुसार काम न करे तो उसपर आठ कृष्णल जुर्माना करे और वेतन न देय ॥ २१५ ॥ आर्त्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः सन् यथाभाषितमादितः । स दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम् ॥ २१६ ॥ यथोक्तमार्त्तः सुस्थो वा यस्तत्कर्म न कारयेत् । न तस्य वेतनं देयमल्पोनस्यापि कर्मणः ॥ २१७ ॥ एष धर्मोऽखिलेनोक्तो वेतनादानकर्मणः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धर्मं समयभेदिनाम् ॥ २१८ ॥ परन्तु जो बीमार हो और नीरोग होकर ठहराव के अनुसार काम करे तो अधिक दिन बीमार रहा हो तो भी वेतन पावेगा । रोगी हो या नीरोग हो ठहरें हुए काम को न करे या दूसरे से न करा दे अथवा कुछ कम काम करे तो उसको वेतन न देये । यह धर्मानुसार वेतन न देने का निर्णय कहा है । अब प्रतिज्ञाभङ्ग करनेवालों का निर्णय किया जायगा ॥ २१६-२१८ ॥ यो ग्रामदेशसङ्घानां कृत्वा सत्येन संविदम् । विसंवदेन्नरो लोभात्तं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् ॥ २१९ ॥
३८४ मनुस्मृति । निगृह्य दापयेच्चैनं समयव्यभिचारिणम् । चतुःसुवर्णान् षण्णिष्काञ्छतमानं च राजतम् ॥२२०॥ एतद्दण्डविधिं कुर्याद्धार्मिकः पृथिवीपतिः । ग्रामजातिसमूहेषु समयव्यभिचारिणाम् ॥ २२१ ॥ प्रतिज्ञाभङ्ग-इकरार तोड़ना । जो मनुष्य गाँव या देश के लोगों से किसी काम के लिए सत्य- प्रतिज्ञा करके लोभ से उसको छोड़ देवे तो राजा उसको राज्य से निकाल दे और उस नियमभङ्ग करनेवाले को पकड़कर चार निष्क वा छः सुवर्ण या एक चांदी का शतमान दण्ड करे । धार्मिक राजा गाँव या जातिमण्डल में प्रतिज्ञाभङ्ग करनेवाले को इस भांति दण्ड करे ॥ २१६-२२१ ॥ क्रीत्वा विक्रीय वा किञ्चिद्यस्येहानुशयो भवेत् । सोऽन्तर्दशाहात्तद्द्रव्यं दद्याच्चैवाददीत च ॥ २२२ ॥ परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नापि दापयेत् । आददानो ददच्चैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥ २२३ ॥ किसी वस्तु को खरीद वा बेंचकर जिसको पसंद न हो वह दश दिन के भीतर उसको वापस कर दे या लेवे । परन्तु दश दिन के बाद न वापस करे न करावे । क्योंकि समय-भङ्ग करने से ६०० पण दण्ड उस पर किया जायगा ॥ २२२-२२३ ॥ यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति । तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान् ॥२२४॥ अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः । स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन् ॥ २२५ ॥
· आठवां अध्याय । २८५
· आठवां अध्याय । २८५ पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाकन्यासु कचित्नॄणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः॥२२६॥ पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् । तेषां निष्ठा त विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ॥ २२७ ॥ यस्मिन् यस्मिन् कृते कार्ये यस्येहानुशयो भवेत् । तमनेन विधानेन धर्म्ये पथि निवेशयेत् ॥ २२८ ॥ जो पुरुष दोषवाली कन्या के दोष बिना बतलाए विवाह करदे उसपर राजा ९६ पण दण्ड करे। किसी ईर्षा से कन्या में दोष लगावे, पर उसको न दिखलावे तो उस पर सौ १०० पण दण्ड करे। विवाहसम्बन्धी वैदिक मन्त्र कन्याओं के लिए ही कहे हैं जो कन्या नहीं हैं उनके लिए नहीं क्योंकि उनका कन्यापन लोप होगया। विवाह के मन्त्र कन्या में स्त्रीत्व लाते हैं और उन मन्त्रों की समाप्ति सप्तपदी हो जाने पर होती है-ऐसा धर्मशास्त्रियों का निर्णय है। इस जगत् में जिस जिस काम के करने पर जिसको अफ़सोस पैदा होउसका निर्णयकही रीति से राजा करे॥२२४-२२८॥ पशुषु स्वामिनां चैव पालानां च व्यतिक्रमे । विवादं संप्रवक्ष्यामि यथावद्धर्मतत्त्वतः ॥ २२६ ॥ दिवा वक्तव्यता पाले रात्रौ स्वामिनि तद्गृहे । योगक्षेमेऽन्यथा चेत्तु पालो वक्तव्यतामियात्॥ २३०॥ गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद्दशतोऽवराम् । गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात्पालेऽभृते भृतिः॥२३१॥ पशु के मालिक और चरवाह में प्रतिज्ञाभङ्ग होने पर इस प्रकार निर्णय करे-पशुओं की रक्षा का भार दिन में चरवाह और रात में उनके मालिक पर है और चारे की कमी पर चरवाह उत्तर-
२८६ मनुस्मृति । दाता है। जो चरवाह दूध मात्र का वेतन पाता हो वह स्वामी की आज्ञा से दश गौओं में जो उत्तम हो उसको दुह लेय। यह बिना तनख्वाह के चरवाह की तनख्वाह है ॥ २२६-२३१ ॥ नष्टं विनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमे मृतम् । हीनं पुरुषकारेण प्रदद्यात्पाल एव तु ॥ २३२ ॥ विघुष्य तु हृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति । यदि देशे च काले च स्वामिनः स्वस्य शंसति ॥२३३॥ कर्णौ चर्म च बालांश्च बस्तिं स्नायुं च रोचनाम् । पशुषु स्वामिनां दद्यान्मृतेष्वङ्गानि दर्शयेत् ॥ २३४ ॥ अजाविके तु संरुद्धे वृकैः पाले त्वनायति । यां प्रसह्य वृको हन्यात्पाले तत्किल्बिषं भवेत् ॥२३५॥ तासां चेदवरुद्धानां चरन्तीनां मिथो वने । यामुत्प्लुत्य वृको हन्यान्न पालस्तत्र किल्बिषी ॥२३६॥ जो पशु खो जाय, कीड़े पड़कर मरजाय, कुत्तों से मारा जाय, गढ़े में गिरकर मरजाय, चरवाह की असावधानी से चोर लेजायँ तो उसको चरवाह मालिक को देवे । जो चोर हमला करके कोई पशु लेजायँ तो चरवाह ठीक समय पर मालिक से इत्तिला करे तो चरवाह दण्ड न देय । यदि पशु खुद मरजाय तो उसके कान, चमड़ा, बाल, वस्ति, स्नायु और रोचना वगैरह से कोई अङ्ग मालिक को दे देय और कोई अङ्ग दिखला दे । बकरों और भेड़ को भेंडिया घेर ले और चरवाह उनको छोड़कर भग जावे तो जिसको मारेगा उसका पातक चरवाह को लगेगा और यदि बकरी, भेड़ को चरवाहने घेर रक्खा हो और अचानक भेंडिया आकर मारडाले तो चरवाह पातकी न होगा ॥ २३२-२३६ ॥ धनुःशतं परीहारो ग्रामस्य स्यात्समन्ततः ।
आठवां अध्याय । २८७
आठवां अध्याय । २८७ शम्यापातास्त्रयो वापि त्रिगुणो नगरस्य तु ॥ २३७ ॥ तत्रापरीवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि । न तत्र प्रणयेद्दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणाम् ॥ २३८ ॥ गाँव के चारों तरफ़ चार सौ हाथ या तीन लकड़ी फेंकने पर जितनी दूर गिरें वहां तक और नगर के आसपास उसकी तिगुनी भूमि पशुओं के लिए छोड़ रखना उचित है, इस भूमि को 'परिहार' कहते हैं । उस भूमि में बाड़ न होने से अन्न कोई पशु खालें तो राजा चरवाह को दण्ड न देय ॥ २३७-२३८॥ वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो न विलोकयेत् । छिद्रं च वारयेत्सर्वं श्वसूकरमुखानुगम् ॥ २३६ ॥ पथि क्षेत्रे परिवृते ग्रामान्तीयेऽथवा पुनः । स पालः शतदण्डार्हो विपालांश्चारयेत्पशून् ॥ २४० ॥ क्षेत्रेष्वन्येषु तु पशुः सपादं पणमर्हति । सर्वत्र तु सदो देयः क्षेत्रिकस्येति धारणा ॥ २४१ ॥ अनिर्दशाहां गां सूतां वृषान् देवपशूंस्तथा । स पालांवाविपालान्वानदण्ड्यान्मनुरब्रवीत्॥२४२। क्षेत्रियस्यात्यये दण्डो भागाद्दशगुणो भवेत् । ततोऽर्धदण्डो भृत्यानामज्ञानात्क्षेत्रियस्य तु ॥ २४३ ॥ एतद्विधानमातिष्ठेद्धार्मिकः पृथिवीपतिः । स्वामिनां च पशूनां च पालानां च व्यतिक्रमे ॥ २४४ ॥ उस भूमि के बचाने को इतनी ऊंची वाड़ करे जिसमें ऊंट न देख सकें और छोटे छेदों को बंद करदें जिसमें सुअर, कुत्ता का मुँह न जासके। गाँव के या रास्ते के पास बाड़ से घिरे खेतों का
२८८ मनुस्मृति । अन्न पशु खालें तो चरवाह को सौ पण दण्ड करे और विना चर- वाह के पशुओं को हाँक देवे। दूसरे खेतों में पशु हानि करे तो चरवाह पर सवां पण दण्ड करे। और खेत के स्वामी की हानि तो सब हालत में देनो ही चाहिए। दश दिन के भीतर की वियाई गो, सांड़ और देवार्पण करके छोड़े हुए पशु खेत खालें तो चर- वाह साथ हो या न हो, दण्ड नहीं होसकता-मनुजी फ़रमाते हैं। यदि खेतवालेही के पशु खेत चरें तो राजा हानि से दश- गुणा दण्ड करे और हलवाहों की भूल से हो तो उसका आधा दण्ड करे। इसभांति पशुओं के स्वामी, पशु और चरवाह के अपराध होनेपर धार्मिक राजा न्याय करे ॥ २३६-२४४ ॥ सीमां प्रति समुत्पन्ने विवादे ग्रामयोर्द्वयोः । ज्येष्ठे मासि नयेत्सीमां सुप्रकाशेषु सेतुषु ॥ २४५ ॥ सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकान् । शाल्मलीन्सालतालांश्च क्षीरिणश्चैव पादपान्॥२४६॥ सीमा-सरहद् का निर्णय । यदि दो गाँवों के हद का झगड़ा उठे तो जेठ मास में जब ज़मीन साफ़ हो तब उसका निश्चय करना। हद जानने के लिए बड़, पीपल, ढाक, सैमर, साल, ताल और दूधवाले कोई वृक्ष स्थापित करे ॥ २४५-२४६ ॥ गुल्मान्वेणूंश्च विविधाञ्छमीवल्लीस्थलानि च । शरान् कुब्जक गुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति॥२४७॥ तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्रवणानि च । सीमासंधिषु कार्याणि देवतायतनानि च ॥ २४८ ॥ उपच्छन्नानि चान्यानि सीमलिङ्गानि कारयेत् । सीमाज्ञाने नृणां वीक्ष्य नित्यं लोके विपर्ययम् ॥ २४६॥
आठवां अध्याय । २८६
आठवां अध्याय । २८६ अश्मनोऽस्थीनि गोवालांस्तुषान्भस्मकपालिकाः । करीषमिष्टकाङ्गारान्छर्करा बालुकास्तथा ॥ २५० ॥ यानि चैवंप्रकाराणि कालान्भूमिर्न भक्षयेत् । तानि संधिषु सीमायामप्रकाशानि कारयेत् ॥ २५१ ॥ एतैर्लिङ्गैर्नयेत्सीमां राजा विवदमानयोः । पूर्वभुक्त्या च सततमुदकस्यागमेन च ॥ २५२ ॥ गुल्म, बांस, शमी, लता, रामशर, कुब्जक की वेल वगैरह लगावे तो सीमा नहीं बिगड़ती । तालाब, कुआं, बावली, झरना, देवम- न्दिर सीमा के मेल पर बनवावे । सीमा के लिए लोक में प्रायः झगड़ा हुआ करता है इसलिए उसके जानने के लिए छिपा चिह्न भी कर रक्खे । पत्थर, हड्डी, गौके बाल, भूसी, राख, ठीकरा, सूखा गोबर, ईंट, कोयला, रोड़ा, रेता आदि वस्तुओंको जो बहुत दिनों तक ज़मीन में छिपजाने लायक न हों उनको सीमाके नीचे रखदेवे। राजा इन चिह्नों से पुराने भोग से, नदी आदि जल मार्ग से, सीमा निर्णय करे ॥ २४७-२५२ ॥ यदि संशय एव स्याल्लिङ्गानामपि दर्शने । साक्षिप्रत्यय एव स्यात्सीमावादविनिर्णयः ॥ २५३ ॥ ग्रामीणककुलानां च समक्षं सीम्नि साक्षिणः । प्रष्टव्याः सीमलिङ्गानि तयोश्चैव विवादिनोः ॥ २५४ ॥ चिह्नों के देखने पर भी अगर कोई संदेह हो तो साक्षी-गवाहों के विश्वास पर निर्णय होगा । वादी, प्रतिवादी, गांवके कुलीन पंचों के सामने सब बातें पूंछे और फ़ैसला करे ॥ २५३-२५४ ॥ ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः समस्ताः सीम्नि निश्चयम् । निबध्नीयात्तथा सीमां सर्वांस्तांश्चैव नामतः ॥ २५५ ॥ ३७