भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 296 में से

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पृष्ठ 115
  • योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना * ११५

सम्मुख और बायें-दायें गीदड़ी रोती हुई जाय, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। भोजन कर लेनेपर भी जिसके हृदयमें भूखका कष्ट होता हो तथा जो दाँतोंसे दाँत घिसता रहे, उसकी आयु भी निश्चय ही समाप्त हो चुकी है। जिसको दीपककी गन्धका अनुभव न होता हो, जो रात और दिनमें भी डरता हो तथा दूसरेके नेत्रमें अपनी परछाईं न देखता हो, वह जीवित नहीं रहता। जो आधी रातके समय इन्द्रधनुष और दिनमें तारोंको देख ले, वह आत्मवेत्ता पुरुष अपनी आयु क्षीण हुई समझे। जिसकी नाक टेढ़ी और कान ऊँचे-नीचे हो जाते हैं तथा जिसके बायें नेत्रसे सदा पानी गिरता रहता है, उसकी आयु समाप्त हो चुकी है। यदि मुँह सब ओरसे लाल और जीभ काली पड़ जाय तो बुद्धिमान् पुरुषको अपनी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। जो स्वप्नमें ऊँट या गदहेपर बैठकर दक्षिण दिशाकी ओर जाय, उसको तत्काल मृत्यु होनेवाली है—ऐसा जानना चाहिये। जो अपने दोनों कान बंद कर लेनेपर अपनी ही आवाज न सुने तथा जिसके नेत्रोंकी ज्योति नष्ट हो जाय, वह भी जीवित नहीं रह सकता। जो स्वप्नमें किसी गढ्ढेके भीतर गिरे और उससे निकलनेका द्वार बंद हो जाय तथा फिर वह उस गढ्ढेसे न निकल सके तो वहींतक उसका जीवन समझना चाहिये। जिसकी दृष्टि ऊपरकी ओर उठे किन्तु वहाँ ठहर न सके, बार-बार लाल होकर घूमती रहे, मुँह गरम हो और नाभि शीतल हो जाय तो ये लक्षण मनुष्यके शरीर-परिवर्तनकी सूचना देते हैं। जो स्वप्नमें अग्नि या जलके भीतर प्रवेश करके फिर न निकले, उसके जीवनका वही अन्त है। जिसको दुष्ट जीव रातमें और दिनमें भी मारें, वह सात रातके भीतर निश्चय ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जो अपने निर्मल श्वेतवस्त्रको भी लाल या काले रंगका देखे, उसकी भी मृत्यु निकट समझनी चाहिये। स्वभावका विपरीत होना और प्रकृतिका बिल्कुल बदल जाना भी मृत्युके निकट होनेकी सूचना देते हैं।<br><br>जिसका काल निकट आ गया है, वह मनुष्य जिनके सामने सदा विनीत रहता था, जो लोग उसके परम पूजनीय थे, उन्हींकी अवहेलना और निन्दा करता है। वह देवताओंकी पूजा नहीं करता। बड़े-बूढ़ों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, माता-पिता तथा दामादका सत्कार नहीं करता। इतना ही नहीं, वह योगियों, ज्ञानी विद्वानों तथा अन्य महात्मा पुरुषोंके आदर-सत्कारसे भी मुँह मोड़ लेता है। बुद्धिमान् पुरुषोंको मृत्युके इन लक्षणोंकी जानकारी रखनी चाहिये। राजन्! योगी पुरुषोंको उचित है कि वे सदा यत्नपूर्वक इन अरिष्टोंपर दृष्टि रखें; क्योंकि ये वर्षके अन्तमें तथा दिन-रातके भीतर भी फल देनेवाले होते हैं। राजन्! इनके विशद फलोंको भलीभाँति देखना चाहिये और मन-ही-मन विचार करके उस समयके अनुसार कार्य करना चाहिये। मृत्युकालको जान लेनेपर योगी किसी निर्भय स्थानमें बैठकर योगाभ्यासमें प्रवृत्त हो जाय, जिससे उसका वह समय निष्फल न जाने पावे। अरिष्ट देखकर योगी मृत्युका भय छोड़ दे और उसके स्वभावका विचार करके जितने समयमें वह आनेवाली हो, उतने समयके प्रत्येक भागमें योगी योग-साधनमें लगा रहे। दिनके पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्नमें अथवा रात्रिके जिस भागमें अरिष्टका दर्शन हो, तभीसे लेकर जबतक मृत्यु न आवे तबतक योगमें लगा रहे। तदनन्तर सारा भय छोड़कर जितात्मा पुरुष उस कालपर विजय प्राप्त करके उसी स्थानपर या और कहीं—जहाँ भी अपना चित्त स्थिर हो सके, योगमें संलग्न हो जाय और तीनों गुणोंको जीतकर परमात्मामें तन्मय हो
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