भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

१९६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


चिद्वृत्तिका भी त्याग कर दे। यों करनेसे वह उस इन्द्रियातीत परम निर्वाणस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, जो न तो बुद्धिका विषय है और न वाणी ही जिसका वर्णन कर सकती है। अलर्क! इन सब बातोंका मैंने तुमसे यथार्थ वर्णन किया है; अब तुम जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त हो सकोगे, वह संक्षेपमें सुनो।

जैसे चन्द्रमाका संयोग पाकर ही चन्द्रकान्तमणि जलकी सृष्टि करती है, उनका संयोग पाये बिना नहीं, यही उपमा योगीके लिये भी है। योगी भी योगयुक्त होकर ही सिद्धि लाभ कर सकता है, अन्यथा नहीं। जैसे सूर्यकी किरणोंका संयोग पाकर ही सूर्यकान्तमणि आग पैदा करती है, अकेली रहकर नहीं, यही उपमा योगोंके लिये भी है। उसे योगका आश्रय कभी नहीं छोड़ना चाहिये। जैसे चींटी, चूहा, नेवला, छिपकली और गौरैया—ये सब घरमें गृहस्वामीकी ही भाँति रहते हैं और घर गिर जानेपर अन्यत्र चल देते हैं, किन्तु घरके गिरनेका दुःख केवल स्वामीको ही होता है, उन सबोंको उसके लिये कुछ भी कष्ट नहीं होता, योगकी सिद्धिके लिये भी यही उपमा है। अर्थात् योगीको अपने गृह, वैभव और शरीर आदिके प्रति तनिक भी ममता नहीं रखनी चाहिये। हरिनके बच्चेके मस्तकपर जब सींग उगने लगता है, तब पहले उसका अग्रभाग तिलके समान दिखायी देता है। फिर वह उस हरिनके साथ ही साथ बढ़ता है। इस दृष्टान्तपर विचार करनेसे योगी सिद्धिको प्राप्त होता है। अर्थात् उसे भी धीरे-धीरे अपनी योगसाधना बढ़ानी चाहिये। जैसे मनुष्य रोगसे पीड़ित होनेपर भी अपनी इन्द्रियोंसे काम लेता ही है, उसी प्रकार योगी बुद्धि आदि परकीय साधनोंसे, जो आत्मासे सर्वथा भिन्न हैं, परम पुरुषार्थका साधन करे।


अलर्ककी मुक्ति एवं पिता-पुत्रके संवादका उपसंहार

**सुमति कहते हैं—**तदनन्तर राजा अलर्कने अत्रिनन्दन दत्तात्रेयजीके चरणोंमें प्रणाम करके अत्यन्त प्रसन्नताके साथ विनीतभावसे कहा—‘ब्रह्मन्! देवताओंने मुझे शत्रुद्वारा पराजित कराकर जो मेरे समक्ष प्राणोंको संशयमें डालनेवाला अत्यन्त उग्र भय उपस्थित कर दिया, इसे मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूँ। काशिराजका महान् बल-वैभवसे सम्पन्न पराक्रम मेरा विनाश करनेके लिये यहाँ प्रकट हुआ था; किन्तु उसने मुझे आपके सत्सङ्गका शुभ अवसर प्रदान किया, यह कितने आनन्दकी बात है। सौभाग्यसे ही मेरा सैनिक-बल घट गया, सौभाग्यसे ही मेरे सेवक मारे गये, सौभाग्यसे ही मेरा खजाना खाली हुआ, सौभाग्यसे ही मैं भयको प्राप्त हुआ, सौभाग्यने ही मुझे आपके युगल चरणोंकी स्मृति करायी और सौभाग्यसे ही आपका सारा उपदेश मेरे चित्तमें बैठ गया। ब्रह्मन्! सौभाग्यवश आपके सङ्गसे मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ और सौभाग्यसे ही आपने मुझपर कृपा की। जब पुरुषके शुभ दिन आते हैं तब अनर्थ भी अर्थका साधक बन जाता है, जैसे इस समय यह शत्रुजनित आपत्ति भी आपके समागमसे उपकार करनेवाली सिद्ध हुई। भगवन्! भाई सुबाहु तथा काशिराज दोनों ही मेरे उपकारी हैं, जिनके कारण मुझे आपके समीप आनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। आपके प्रसादरूपी अग्निसे मेरा अज्ञान और पाप जल गया। अब मैं ऐसा यत्न करूँगा, जिससे फिर इस प्रकार दुःखका भागी न बनूँ। आप मेरे ज्ञानदाता महात्मा हैं; अतः आपसे आज्ञा लेकर मैं गार्हस्थ्य-आश्रमका परित्याग करूँगा, जो विपत्तिरूपी वृक्षोंका वन है।’