संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें- अलर्ककी मुक्ति एवं पिता-पुत्रके संवादका उपसंहार * १२७
दत्तात्रेयजी बोले—राजेन्द्र! जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। मैंने जैसा तुम्हें बताया है, उसीके अनुसार ममता और अहङ्कारसे रहित हो मोक्षके लिये विचरते रहो।
सुमति कहते हैं—दत्तात्रेयजीके यों कहनेपर राजा अलर्कने उन्हें प्रणाम किया और बड़ी उतावलीके साथ वे उस स्थानपर आये, जहाँ उनके बड़े भाई सुबाहु और काशिराज मौजूद थे। महाबाहु वीरवर काशिराजके निकट पहुँचकर अलर्कने सुबाहुके सामने ही हँसते हुए कहा—
'राज्यकी इच्छा रखनेवाले काशिराज! अब तुम इस बढ़े हुए राज्यको भोगो। अथवा यदि तुम्हारी इच्छा हो तो भाई सुबाहुको ही दे डालो।'
काशिराजने कहा—अलर्क! तुमने युद्धके बिना ही राज्य क्यों छोड़ दिया? यह तो क्षत्रियका धर्म नहीं है और तुम क्षत्रियधर्मके ज्ञाता हो। जब अमात्यवर्ग पराजित हो जाय, तब राजा स्वयं ही मृत्युका भय छोड़कर अपने शत्रुको लक्ष्य करके बाणका संधान करे और उसे जीतकर इच्छानुसार श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करे। साथ ही परम सिद्धिके लिये बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान भी करता रहे।
अलर्क बोले—वीर! तुम्हारा कथन ठीक है, पहले मेरे मनमें भी ऐसे ही विचार उठते थे; किन्तु अब मेरी विपरीत धारणा हो गयी है। इसका कारण सुनो। नरेश्वर! तुम्हारे भयसे अत्यन्त दुःख पाकर मैंने योगीश्वर दत्तात्रेयजीकी शरण ली और उनकी कृपासे अब मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। समस्त इन्द्रियोंको जीतकर तथा सब ओरसे आसक्ति हटाकर मनको ब्रह्ममें लगाना और इस प्रकार मनको जीतना ही सबसे बड़ी विजय है; अतः अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूँ, तुम भी मेरे शत्रु नहीं हो तथा ये सुबाहु भी मेरे अपकारी नहीं हैं। मैंने इन सब बातोंको अच्छी तरह समझ लिया है। अतः राजन्! अब अपने लिये तुम कोई दूसरा शत्रु ढूँढ़ो।
अलर्कके यों कहनेपर राजा सुबाहु अत्यन्त प्रसन्न होकर उठे और 'धन्य! धन्य!' कहकर अपने भाईका अभिनन्दन करनेके पश्चात् वे काशिराजसे इस प्रकार बोले—'नृपश्रेष्ठ! मैं जिस कार्यके लिये तुम्हारी शरणमें आया था, वह सब पूरा हो गया। अब मैं जाता हूँ। तुम सुखी रहो।'
काशिराजने कहा—सुबाहो! तुम किसलिये आये थे? और तुम्हारा कौन सा कार्य सिद्ध हुआ? यह बताओ। मुझे तुम्हारी बातोंसे बड़ा कौतूहल हो रहा है। तुमने मेरे पास आकर कहा था कि 'मेरे बाप-दादोंका बहुत बड़ा राज्य अलर्कने हड़प लिया है। वह उनसे जीतकर मुझे दे दो।' तब मैंने तुम्हारे भाईपर आक्रमण करके यह राज्य अपने वशमें किया। यह तुम्हें कुलपरम्परासे प्राप्त है, अतः इसका उपभोग करो।
सुबाहु बोले—काशिराज! मैंने जिस उद्देश्यसे यह प्रयत्न किया था और जिसके लिये तुमसे भी महान् उद्योग कराया, वह बतलाता हूँ; सुनो। मेरा यह छोटा भाई तत्त्वज्ञ होकर भी सांसारिक भोगोंमें फँसा हुआ था। मेरे दो बड़े भाई परम