संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
पर्वत, नदी, वन, भूलोक आदि, खलोकसमुदाय और पातालकी जिस प्रकारकी स्थिति है, वह सब मुझे बताइये। सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र और तारोंकी गति तथा प्रलयकालतककी सारी बातें मैं सुनना चाहता हूँ। जब इस जगत्का संहार हो जायगा, तब उसके बाद क्या शेष रहेगा? इस प्रश्नपर भी प्रकाश डालिये।
पक्षियोंने कहा—मुनिश्रेष्ठ! आपने हमलोगोंपर प्रश्नोंका ऐसा भार रख दिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। अब हम आपके पूछे हुए विषयोंका वर्णन करते हैं, सुनिये। पूर्वकालमें मार्कण्डेयजीने ब्राह्मणकुमार क्रौष्टुकिसे, जो परम बुद्धिमान्, व्रतस्नात तथा शान्त स्वभाववाले थे, जो कुछ कहा था, वही हम आपसे कहते हैं। एक समय महात्मा मार्कण्डेय मुनि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे घिरे बैठे थे। वहीं क्रौष्टुकिने यही बात पूछी थी, जिसे आपने हमसे पूछा है। भृगुनन्दन मार्कण्डेयजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ क्रौष्टुकि के प्रश्नोंका उत्तर दिया। उसीका हम आपसे वर्णन करते हैं। आप ध्यान देकर सुनें। जो सृष्टिके समय ब्रह्मा, पालन-कालमें विष्णु तथा संहारके समय जगत्का अन्त करनेवाले अनन्त भयङ्कर रुद्र हैं, उन सम्पूर्ण जगत्के स्वामी पद्मयोनि पितामह ब्रह्माजीको मैं प्रणाम करता हूँ।
मार्कण्डेयजीने कहा—पूर्वकालमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके प्रकट होते ही उनके मुखोंसे क्रमशः पुराण और वेद प्रकट हुए, फिर महर्षियोंने पुराणकी बहुत-सी संहिताएँ रचीं और वेदोंके भी सैकड़ों विभाग किये। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—ये चारों महात्मा ब्रह्माजीके उपदेश बिना नहीं सिद्ध हो सकते थे। ब्रह्माजीके मानस पुत्र सप्तर्षियोंने उनसे वेदोंको ग्रहण किया और ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए भृगु आदि ऋषियोंने पुराणको अपनाया। भृगुसे च्यवनने और च्यवनसे ब्रह्मर्षियोंने उसे प्राप्त किया। फिर उन्होंने दक्षको उपदेश दिया और दक्षने मुझे इस पुराणको सुनाया था। वही आज मैं तुमसे कहता हूँ। यह पुराण कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
जो सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिका स्थान, अजन्मा, अविनाशी, आश्रयस्वरूप, चराचर जगत्को धारण करनेवाले तथा परमपदस्वरूप हैं, जिन्हें आदिपुरुष ब्रह्मा कहा जाता है, जो उत्पत्ति, पालन और संहारके कारण हैं, किसीके औरस पुत्र न होकर स्वयम्भू हैं, जिनमें सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है, जो हिरण्यगर्भ, लोकसृष्टिमें लगे रहनेवाले और परम बुद्धिमान् हैं, उन भगवान् ब्रह्माजीको नमस्कार करके मैं परम उत्तम भूतसर्गका वर्णन आरम्भ करता हूँ! यह भूतसमुदाय^१ पाँचोंकी संख्यामें जाननेके योग्य तथा त्रिविध^२ स्रोतोंसे युक्त है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त उसकी स्थिति है। उसमें किसका कैसा लक्षण है और किसके रूपमें कितनी विभिन्नता है, इन सब बातोंका ज्ञान कराते हुए भूतसमुदायका वर्णन करता हूँ। इस भौतिक जगत्का जो कारण है, उसे 'प्रधान' कहते हैं। उसीको महर्षियोंने अव्यक्त कहा है और वही सूक्ष्म, नित्य एवं सदसत्स्वरूप प्रकृति है। सृष्टिके आदिकालमें केवल ब्रह्म था, जो नित्य, अविनाशी, अजर और अप्रमेय है। उसका दूसरा कोई आधार नहीं है। वह गन्ध, रूप, रस, शब्द और स्पर्शसे रहित है। उसका आदि और अन्त नहीं है। वह सम्पूर्ण जगत्की योनि, तीनों गुणोंका कारण एवं अविनाशी है। उसे आधुनिक नहीं, पुरातन एवं सनातन कहा गया है। वह ज्ञान-विज्ञानका विषय नहीं है। प्रलयके पश्चात् उस ब्रह्मसे ही यह सब कुछ व्याप्त था।
१. पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच भूत हैं।
२. पशु-पक्षी आदिकी सृष्टिको 'तिर्यक्स्रोत', मानवसर्गको 'अर्वाक्स्रोत' और देवसर्गको 'ऊर्ध्वस्रोत' कहते हैं।