संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें- मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि संवादका आरम्भ, प्राकृत सर्गका वर्णन * १२१
मुने! फिर सृष्टिकाल आनेपर गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृति जब ब्रह्मके क्षेत्रज्ञरूपसे अधिष्ठित हुई, तब उससे महत्तत्त्वका आविर्भाव हुआ। उत्पन्न हुए उस महत्तत्त्वको प्रधान (प्रकृति) ने आवृत्त कर रखा है। जैसे बीज त्वचासे घिरा हुआ होता है, उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आच्छादित है। वह सात्त्विक, राजस और तामसभेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। तत्पश्चात् उस महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) तथा भूतादिरूप तामस—इन तीन भेदोंवाला अहङ्कार उत्पन्न हुआ। जैसे अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आवृत्त है, उसी प्रकार अहङ्कार भी महत्तत्त्वसे आवृत्त है। भूतादि नामक तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस शब्द-तन्मात्रासे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ; फिर भूतादि तामस अहङ्कारने शब्द-तन्मात्रारूप आकाशको आच्छादित किया। इससे स्पर्श-तन्मात्राकी सृष्टि हुई, जिससे बलवान् वायुका प्राकट्य हुआ। वायुका गुण स्पर्श माना गया है। शब्द-तन्मात्रारूप आकाशने जब स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया, तब वायुने भी विकृत होकर रूप-तन्मात्राकी रचना की। इस प्रकार वायुसे अग्नितत्त्व प्रकट हुआ, जिसका गुण रूप बतलाया जाता है। तदनन्तर स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुने रूप-तन्मात्रावाले तेजको आवृत्त किया, जिससे विकृत होकर उस तेजने रस-तन्मात्राकी सृष्टि की। उस रस-तन्मात्रासे जल प्रकट हुआ, जो रस नामक गुणसे युक्त है। फिर रूप-तन्मात्रावाले अग्नितत्त्वने रस-तन्मात्रायुक्त जलको आवृत्त किया। इससे जलमें भी विकार आया और उसमें गन्ध-तन्मात्राकी सृष्टि हुई। उसीसे यह स्थूलरूपा पृथ्वी उत्पन्न हुई, जिसका गुण गन्ध है। उन-उन भूतोंमें कारणरूपसे तन्मात्राएँ हैं, इसलिये वे भूततन्मात्रारूप माने गये हैं। तन्मात्राएँ किसी विशेष भावका बोध नहीं करातीं। इसलिये वे अविशेष हैं। इस प्रकार तामस अहङ्कारसे यह भूततन्मात्रारूप सर्ग प्रकट हुआ।
वैकारिक अहङ्कारमें सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे वह सात्त्विक भी कहलाता है। उससे एक ही साथ वैकारिक सर्गकी उत्पत्ति होती है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ तैजस (राजस) अहङ्कारसे उत्पन्न बतलायी जाती हैं और उनके अधिष्ठाता दस देवता वैकारिक (सात्त्विक) अहङ्कारसे प्रकट हुए हैं। ग्यारहवें मनको भी वैकारिक सर्गमें ही जानना चाहिये। इस प्रकार मन तथा इन्द्रियाधिष्ठाता देवता वैकारिक माने गये हैं। श्रवण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंका ज्ञान करानेके लिये हैं, इसलिये इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं। दोनों पैर, गुदा, उपस्थ, दोनों हाथ और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। क्रमशः चलना, मलत्याग, रतिके आनन्दका अनुभव, शिल्परचना और बोलना—ये पाँच इनके कर्म हैं। शब्द-तन्मात्रायुक्त आकाश स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुमें प्रविष्ट है, इसलिये वायु दो गुणोंसे युक्त होता है। उसका अपना गुण स्पर्श है। उसके साथ आकाशका शब्द भी रहता है। इसी प्रकार शब्द और स्पर्श—ये दो गुण रूपमें प्रवेश करते हैं; इसलिये अग्नि शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीन गुणोंसे युक्त होता है। फिर शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीनोंका रसमें प्रवेश होता है। इसलिये रसात्मक जलको चार गुणोंसे युक्त समझना चाहिये। इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चारों गन्धमें प्रवेश करते हैं और उससे मिलकर सब ओरसे पृथ्वीको आवृत्त कर लेते हैं। इसलिये पृथ्वी पाँच गुणोंसे युक्त है और सब भूतोंमें स्थूल दिखायी देती है। ये पाँचों भूत शान्त, घोर और मूढ़ हैं। अर्थात् सुख, दुःख एवं मोहसे युक्त हैं। इसलिये ये विशेष कहलाते हैं।* परस्पर
* परस्पर मिलनेसे सभी भूत शान्त, घोर और मूढ़ प्रतीत होते हैं; किन्तु पृथक्-पृथक् विचार करनेपर पृथ्वी और जल शान्त हैं, तेज और वायु घोर हैं तथा आकाश मूढ़ है।
[ 539 ] सं० मा० पु०—५