संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रवेश करनेपर वे एक-दूसरेको धारण करते हैं।
ये महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी भूत एक दूसरेसे मिलकर और परस्पर आश्रित हो एक संघातको ही अपना लक्ष्य बना जब पूर्णरूपसे एक हो जाते हैं, तब पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण प्रधान तत्त्वके सम्बन्धसे अण्डकी उत्पत्ति करते हैं। वह महान् अण्ड जलके बुलबुलेके समान क्रमशः बढ़ता है और जलपर स्थित रहता है। उस प्राकृत अण्डमें ब्रह्मा नामसे प्रसिद्ध क्षेत्रज्ञ पुरुष भी वृद्धिको प्राप्त होता है। वे ब्रह्मा ही सबसे प्रथम शरीरधारी होनेके कारण पुरुष कहलाते हैं। भूतोंके आदिकर्ता ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए; उन्होंने चर-अचरसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। अण्डके गर्भमें स्थित उन महात्मा ब्रह्माजीके लिये मेरु पर्वत ही गर्भको ढकनेवाली झिल्ली हुआ। अन्य पर्वत जरायु (जेर) हुए तथा समुद्र ही उस गर्भाशयका जल था। उस अण्डमें ही देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ तथा पर्वत, द्वीप, समुद्र और नक्षत्र मण्डलके साथ त्रिभुवनका आविर्भाव हुआ। वह अण्ड क्रमशः जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा तामस अहङ्कारके द्वारा बाहरसे आवृत्त है। ये आवरण एककी अपेक्षा दूसरे दसगुने बड़े हैं। तामस-अहंकार उससे दसगुने बड़े महत्तत्त्वके द्वारा आवृत है और महत्तत्त्व भी उन सबके साथ अव्यक्त प्रकृतिके द्वारा घिरा हुआ है। इस प्रकार इन सात प्राकृत आवरणोंसे यह अण्ड आवृत्त है। इस तरह ये आठ प्रकृतियाँ एक-दूसरेको आवृत्त करके स्थित हैं। वह प्रकृति नित्य है और उसके भीतर वे ही पुरुष हैं, जो तुम्हें ब्रह्माके नामसे बताये गये हैं। अब संक्षेपसे पुनः इस विषयका वर्णन सुनो—जैसे कोई पुरुष जलमें डूबकर फिर निकलते समय जलको फेंकता है, उसी प्रकार भगवान् ब्रह्माजी भी प्रकृतिको हटाते हुए उससे प्रकट होते हैं। अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र बताया गया है और ब्रह्माजी क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञरूप ही है—ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार यह प्राकृत सर्गका वर्णन हुआ। इसके भीतर अधिष्ठातारूपसे क्षेत्रज्ञ विराजमान रहता है। प्राकृत सर्ग ही प्रथम सृष्टि है।
एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन
क्रौष्टुकिने कहा— भगवन्! आपने ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन किया तथा महात्मा ब्रह्माजीके प्रादुर्भावकी बात भी बतलायी। भृगुकुलनन्दन! अब मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि प्रलयके अन्तमें, जब कि सबका उपसंहार हो जाता है और प्राणियोंकी सृष्टि नहीं हुई होती, क्या शेष रहता है? अथवा कुछ रहता ही नहीं?
मार्कण्डेयजी बोले— मुने! जब यह सम्पूर्ण जगत् प्रकृतिमें लीन होता है, उस समयकी स्थितिको विद्वान् पुरुष प्राकृत प्रलय कहते हैं। जब अव्यक्त प्रकृति अपने स्वरूप (गुणोंकी साम्यावस्था)-में स्थित होती है तथा महत्तत्त्वादि सम्पूर्ण विकारोंका उपसंहार हो जाता है, उस समय प्रकृति और पुरुष समानधर्मा (निष्क्रिय, निर्विकार) होकर रहते हैं। उस समय सत्त्व और तम समानरूपमें और परस्पर ओत-प्रोत रहते हैं तथा जैसे तिलमें तेल और दूधमें घी रहता है, उसी प्रकार तमोगुण और सत्त्वगुणमें रजोगुण घुला-मिला होता है। जब परमेश्वरकी योगदृष्टिसे प्रकृतिमें क्षोभ होता है, तब महान् अण्डके