भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२६* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

प्रजाकी सृष्टि, निवास-स्थान, जीविकाके उपाय और वर्णाश्रम-धर्मके पालनका माहात्म्य

क्रौष्टुकिने कहा—ब्रह्मन्! आपने अवाक्स्रोत नामक सर्गका, जो मानवसर्ग ही है, वर्णन किया; अब विस्तारपूर्वक यह बतलानेकी कृपा करें कि ब्रह्माजीने सृष्टिका विस्तार कैसे किया। महामते! उन्होंने वर्णोंकी सृष्टि कैसे की? उनके गुण क्या हैं तथा ब्राह्मण आदि वर्णोंका कर्म कौन-सा माना गया है?

मार्कण्डेयजी बोले—मुने! सत्यका चिन्तन करनेवाले ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जब सृष्टि-रचना आरम्भ की, तब उनके मुखसे एक हजार स्त्री-पुरुष उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब सात्त्विक तथा सहृदय थे। तदनन्तर ब्रह्माजीने अपने वक्षःस्थलसे एक सहस्र अन्य स्त्री-पुरुषोंको उत्पन्न किया। वे सभी रजोगुणकी अधिकतासे युक्त, शूरवीर और क्रोधी थे। उसके बाद उन्होंने अपनी दोनों जाँघोंसे दूसरे एक सहस्र स्त्री-पुरुषोंको प्रकट किया। वे सब तमोगुणी, श्रीहीन तथा मन्दबुद्धि थे। वे सब जोड़ेके रूपमें उत्पन्न हुए जीव अत्यन्त प्रसन्न होकर एक दूसरेके साथ मैथुनकी क्रियामें प्रवृत्त हो गये। तभीसे इस कल्पमें मैथुनका प्रसार हुआ। फिर ब्रह्माजीने पिशाच, सर्प, राक्षस, द्रोह करनेवाले मनुष्य, पशु-पक्षी, मगर, मछली, बिच्छू तथा अण्डज आदिको उत्पन्न किया।

पहलेकी प्रजा सात्त्विक और धर्मपरायण थी, अतः यहाँ सब ओर सुख-शान्ति थी। इसके बाद कालान्तरमें उनके भीतर लोभका उदय हुआ। फिर तो शीत, उष्ण, क्षुधा आदि द्वन्द्व प्रकट हुए। प्रजाओंने उस द्वन्द्वको दूर करनेके लिये पहले पुरोंका निर्माण किया। कुछ लोग मरुभूमि अथवा धन्वदेशको शत्रुओंके लिये दुर्गम समझकर उसमें रहने लगे। कुछ लोगोंने पर्वतों और गुफाओंका आश्रय लिया। कुछ मनुष्योंने वृक्षों, पर्वतों और जलके दुर्गोंको अपना निवास-स्थान बनाया। कुछ लोग कृत्रिम दुर्ग बनाकर उसमें रहने लगे। उन्होंने वस्तुओंकी लंबाई-चौड़ाई नापनेके लिये अँगुलियोंसे नाप-नापकर पहले कुछ माप तैयार किये। उनका पैमाना इस प्रकार बना। सबसे सूक्ष्म वस्तु है परमाणु। उससे बड़ा त्रसरेणु होता है, जो पृथ्वीकी धूलिका एक कण है। उससे उत्तरोत्तर बड़े प्रमाण हैं—बालाग्र, लिक्षा, यूका और यवोदर। ये एक-दूसरेकी अपेक्षा आठ-आठ गुने बड़े हैं। आठ यवका एक अङ्गुल, छः अङ्गुलका एक पद, दो पदका एक बित्ता और दो बित्तेका एक हाथ होता है। चार हाथका एक धनुर्दण्ड होता है। इसीको नाड़िकायुग भी कहते हैं। दो हजार धनुषको एक गव्यूति और चार गव्यूतिका एक योजन होता है।

तदनन्तर प्रजावर्गने अपने रहनेके लिये पुर, खेट, द्रोणीमुख, शाखा-नगर, खर्वट, द्रमी आदिका निर्माण किया। उन सबमें ग्राम, गोशाला आदिकी व्यवस्था करके वहाँ पृथक्-पृथक् निवास-स्थान बनाये। जिसके चारों ओर ऊँची चहारदीवारी हो, जो खाइयोंसे घिरा हो, जिसकी लंबाई दो कोस और चौड़ाई उसका आठवाँ भाग हो, वह पुर कहलाता है। उसके पूर्व और उत्तरमें जलप्रवाहका होना उत्तम माना गया है। वहाँसे बाहर निकलनेके लिये शुद्ध बाँसका पुल बना होना चाहिये। जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरकी अपेक्षा आधी हो, वह खेट कहलाता है और जो पुरके चौथाई हिस्सेके बराबर हो, उसे खर्वट कहते हैं। जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरके आठवें हिस्सेके बराबर हो, वह द्रोणीमुख कहलाता है। जहाँ चहारदीवारी और खाई नहीं है, उस पुरको खर्वट कहते हैं। जहाँ मन्त्री, सामन्त तथा भोगके बहुत-से सामान हों, वह शाखानगर कहलाता है। जहाँ अधिकांश शूद्र

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