संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- प्रजाकी सृष्टि, निवास-स्थान, जीविकाके उपाय और वर्णाश्रम-धर्मके पालनका माहात्म्य * १२७
हों, अपनी समृद्धिसे युक्त किसान रहते हों, जो खेतों और उपभोगयोग्य भूमि (बाग-बगीचों) के बीचमें बसा हो, उसका नाम गाँव है। जहाँ किसी कार्यके लिये मनुष्य अन्य नगर आदिसे आकर बसते हों, उसको बस्ती कहते हैं। जहाँ अधिकांश दुष्टोंका निवास हो, जहाँके रहनेवाले अपने पास खेत न होनेपर भी दूसरेकी भूमिपर अधिकार जमाते और भोगते हैं, वह गाँव द्रमीके नामसे पुकारा जाता है। जहाँ प्रायः वे ही लोग निवास करते हैं, जो राजाके प्रिय हों। जहाँ ग्वाले अपने बर्तन-भाँड़े गाड़ियोंपर लादकर रखते हों, बिना बाजारके ही गोरस मिलता हो, गायोंका समूह रहता हो, जहाँ इच्छानुसार भूमि रहनेके लिये सुलभ हो, उस स्थानका नाम घोष है।
इस प्रकार नगर आदिका निर्माण करके प्रजाने अपने रहनेके लिये घर बनाये। वे घर इस उद्देश्यसे बनाये गये थे कि वहाँ शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रक्षा हो सके। जैसे पहले उनके घरके आकारके वृक्ष होते थे और वहाँ उन्हें जैसी सुविधाएँ प्राप्त होती थीं, उन सबका स्मरण करके उन्होंने घर बनाये। जैसे वृक्षकी शाखाएँ एकके बाद दूसरी तथा छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची होती हैं, उसी प्रकार उन्होंने अनेक प्रकारकी शालाएँ बनायीं। द्विजश्रेष्ठ! पूर्वकालमें जो कल्पवृक्षकी शाखाएँ थीं, वे ही उस समय प्रजावर्गके घरोंमें शाला बनानेके काममें आयीं। इस प्रकार गृह-निर्माणके द्वारा शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंको दूर करके सब लोग जीविकाका उपाय सोचने लगे; क्योंकि उस समय समस्त कल्पवृक्ष मधुसहित नष्ट हो चुके थे। जब प्रजा भूख और प्याससे व्याकुल एवं शोकसे आतुर हो उठी तब त्रेताके आरम्भमें उनके अभीष्टकी सिद्धि हुई। उनकी इच्छाके अनुसार वर्षा हुई और वह वर्षाका जल नीची भूमिमें बहकर एकत्र होने लगा। उससे स्रोत, पोखरे और नदियाँ बन गयीं। उस जलका पृथ्वीके साथ संयोग होनेसे बिना जोते-बोये ही ग्राम्य और आरण्य—सब मिलकर चौदह प्रकारके अन्न पैदा हुए। वृक्षों और लताओंमें ऋतुके अनुसार फल और फूल लगने लगे। त्रेतायुगमें पहले-पहल अन्नका प्रादुर्भाव हुआ। उसीसे उस युगमें सब प्रजाका जीवन-निर्वाह होने लगा।
फिर अकस्मात् सब लोगोंके मनमें राग और लोभका प्राकट्य हुआ। इससे वे एक-दूसरेके प्रति ईर्ष्या रखने लगे और अपनी शक्तिके अनुसार नदी, खेत, पर्वत, वृक्ष और झाड़ियोंपर अधिकार जमाने लगे। उनके इस दोषसे सबके देखते-देखते सब अनाज नष्ट हो गये। पृथ्वीने एक साथ ही सब ओषधियोंको अपना ग्रास बना लिया। अनाजके नष्ट होनेसे प्रजा भूखसे व्याकुल होकर फिर इधर-उधर भटकने लगी और अन्तमें ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। ब्रह्माजीने भी प्रजाका सारा समाचार ठीक-ठीक जानकर पृथ्वीको गायके रूपमें बाँधा और मेरु पर्वतको बछड़ा बनाकर उसका दूध दुहा। ब्रह्माजीने दूधके रूपमें सब प्रकारके अन्न दुह लिये थे, वे ही बीजरूपमें प्रकट हुए और उनसे ग्राम्य तथा आरण्य—सब प्रकारके अन्न पैदा हुए, जो फलके पक जानेपर काट लिये जाते हैं। धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, कँगनी, ज्वार, कोदो, चीना, उड़द, मूँग, मसूर, मटर, कुलथी, अरहर, चना और सण—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। यज्ञके काममें आनेवाली केवल चौदह ओषधियाँ हैं, जिनमें सात ग्राम्य और सात आरण्य हैं। उनके नाम ये हैं—धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, कँगनी, कुलथी, माथी, साँवा, वनतिल, गवेधुक, कुरूविन्द, मर्कट और वेणुयव।
जब बोनेपर भी वे ओषधियाँ फिर न जम सकीं, तब भगवान् ब्रह्माजीने अन्नकी वृद्धिके लिये हाथसे काम करनेकी प्रणालीको ही जीविकाका उपाय बनाया; तबसे जोतने-बोनेपर अन्नकी उपज होने लगी। इस प्रकार जीविकाका प्रबन्ध हो