भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

दुःसहकी सन्तानोंद्वारा होनेवाले विघ्न और उनकी शान्तिके उपाय १३१


जो सदा यज्ञ, अध्ययन, वेदाभ्यास और दानमें मन लगाता है, यज्ञ कराने, शास्त्र पढ़ाने तथा उत्तम दान ग्रहण करनेसे ही जिसकी जीविका चलती हो, ऐसे ब्राह्मणको भी तुम त्याग देना। दुःसह! जो सदा दान, अध्ययन और यज्ञके लिये उद्यत रहता और अपने लिये उत्तम एवं विशुद्ध शस्त्रग्रहणकी वृत्तिसे जीविका चलाता हो, उस क्षत्रियके पास भी तुम न जाना। जो दान, अध्ययन और यज्ञ—इन तीन पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त हो और पशु-पालन, व्यापार एवं कृषिसे जीविका चलाता हो, ऐसे पापरहित वैश्यको भी त्याग देना। यक्ष्मन्! जो दान, यज्ञ और द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहता और ब्राह्मण आदिकी सेवासे ही जीवन निर्वाह करता हो—ऐसे शूद्रका भी त्याग कर देना।

जहाँ गृहस्थ पुरुष श्रुति-स्मृतिके अनुकूल उपायसे जीविका चलाता हो, उसकी पत्नी उसीकी अनुगामिनी हो, पुत्र गुरु, देवता और पिताका पूजन करता हो तथा पत्नी भी पतिकी पूजामें संलग्न रहती हो, वहाँ अलक्ष्मीका भय कैसे हो सकता है। यक्ष्मन्! जो प्रतिदिन संध्याके समय पानीसे धोया जाता और स्थान-स्थानपर फूलोंसे पूजित होता है, उस घरकी ओर तुम आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। जिस घरमें बिछी हुई शय्याको सूर्य न देखते हों अर्थात् जहाँ लोग सूर्योदयसे पहले ही सोकर उठ जाते हों, जहाँ प्रतिदिन अग्नि और जल प्रस्तुत रहता हो, सूर्योदय होनेतक दीप जलता एवं सूर्यका पूर्ण प्रकाश पहुँचता हो, वह घर लक्ष्मीका निवास-स्थान है। जहाँ साँड़, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घृत, ब्राह्मण तथा ताँबेके पात्र हों, उस घरमें तुम्हारे लिये स्थान नहीं है।

दुःसह! जहाँ पके या कच्चे अन्नोंका अनादर और शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन होता हो, उस घरमें तुम इच्छानुसार विचरण करो। जिस घरमें मनुष्यकी हड्डी हो और एक दिन तथा एक रात मुर्दा पड़ा रहा हो, उसमें तुम्हारा तथा अन्य राक्षसोंका भी निवास रहे। जो अपने भाई-बन्धुको तथा सपिण्ड एवं समानोदक मनुष्योंको अन्न और जल दिये बिना ही भोजन करते हैं, उस समय उन लोगोंपर तुम आक्रमण करो। जहाँ पुरवासी पहलेसे ही बड़े-बड़े उत्सव मनानेमें प्रसिद्ध हो चुके हों और पहलेकी ही भाँति अब अपने घरपर उत्सव मनाते हों, ऐसे घरोंमें न जाना। जो सूपकी हवासे, भीगे कपड़ेके जलकी बूँदोंसे तथा नखके अग्रभागके जलसे स्नान करते हों, उन कुलक्षणी पुरुषोंके पास अवश्य जाओ। जो पुरुष देशाचार, प्रतिज्ञा, कुलधर्म, जप, होम, मङ्गल, देवयज्ञ, उत्तम शौच तथा लोक-प्रचलित धर्मोंका भलीभाँति पालन करता हो, उसके संसर्गमें तुम्हें नहीं जाना चाहिये।

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**दुःसहसे ऐसी बात कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। फिर उसने भी ब्रह्माजीकी आज्ञाका उसी प्रकार पालन किया।


दुःसहकी सन्तानोंद्वारा होनेवाले विघ्न और उनकी शान्तिके उपाय

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**दुःसहकी पत्नी निर्माष्टि हुई। यह कलिकी कन्या थी। कलिकी पत्नीने रजस्वला होनेपर चाण्डालका दर्शन किया था, उसीसे इस कन्याका जन्म हुआ था। दुःसह और निर्माष्टिकी सोलह सन्तानें हुईं जो समस्त संसारमें व्याप्त हैं। इनमें आठ पुत्र थे और आठ कन्याएँ। ये सब-के-सब अत्यन्त भयंकर थे। दन्ताकृष्टि, तथोक्ति, परिवर्त्त, अङ्गधुक्, शकुनि, गण्डप्रान्तरति, गर्भहा तथा सस्यहा—ये आठ पुत्र थे। नियोजिका, विरोधिनी, स्वयंहारिका, भ्रामणी, ऋतुहारिका, स्मृतिहरा, बीजहरा तथा विद्वेषिणी—ये आठ कन्याएँ थीं, जो सम्पूर्ण जगत्‌को भय देनेवाली हुईं। अब मैं इनके कर्म तथा इनसे होनेवाले दोषोंकी शान्तिके उपाय बतलाऊँगा। पहले आठ