भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

१३२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


पुत्रोंके विषयमें सुनो। दन्ताकृष्ट छोटे बच्चोंके दाँतोंमें स्थित होकर उनमें रगड़ पैदा करता है। इस प्रकार वह दुःसह नामक अलक्ष्मी-पुत्रको वहाँ बुलाना चाहता है। उसकी शान्तिके लिये सोये हुए बालककी शय्या और दाँतोंपर सफेद सरसों छींटना चाहिये तथा सुवर्चला (ब्राह्मी) नामक ओषधिसे स्नान कराने और उत्तम शास्त्रोंका पाठ करानेसे भी यह दोष दूर होता है। दुःसहका दूसरा पुत्र तथोक्ति जब आता है, तब वह बारंबार 'यही हो, यही हो' ऐसा कहता हुआ मनुष्योंको शुभाशुभमें लगा देता है। यदि अकस्मात् शुभाशुभकी प्रवृत्ति हो तो उसे तथोक्तिकी ही प्रेरणा समझनी चाहिये। यदि शुभका कथन या श्रवण हो तो विद्वान् पुरुष उसे मङ्गलमय बतावे और यदि अशुभका श्रवण या कथन हो तो उसकी शान्तिके लिये भगवान् विष्णु, चराचरगुरु ब्रह्मा तथा अपने-अपने कुलदेवताके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। जो अन्यके गर्भमें दूसरे गर्भोंको रखने और बदलनेमें प्रसन्नताका अनुभव करता है तथा कोई बात कहनेके लिये उत्सुक मनुष्यके मुखसे किसी और ही बातको कहला देता है, वह दुःसहका तीसरा पुत्र परिवर्त है। उसकी शान्तिके लिये भी तत्त्ववेत्ता पुरुष पीली सरसों छिड़के और रक्षोघ्न-मन्त्रोंका पाठ करे।

अङ्गध्रुक् नामक चौथा कुमार वायुके समान मनुष्योंके अङ्गोंमें प्रवेश करके स्फुरण (फड़कने) आदिके द्वारा शुभाशुभ फलकी सूचना देता है। उसकी शान्तिके लिये कुशोंसे शरीरको झाड़े। दुःसहका पाँचवाँ कुमार शकुनि कौवे आदि पक्षियोंके अथवा कुत्ते-सियार आदि पशुओंके शरीरमें स्थित होकर अपनी बोलीसे शुभाशुभ फलको सूचित करता है। उसमें भी अशुभसूचक शब्द होनेपर कार्यारम्भका परित्याग करना चाहिये और शुभसूचक शब्द होनेपर अत्यन्त शीघ्रताके साथ कार्यारम्भ कर देना चाहिये। ऐसा प्रजापतिका कथन है। द्विजश्रेष्ठ! गण्डप्रान्तरति नामक छठा कुमार गण्डप्रान्तोंमें आधे मुहूर्ततक स्थित हो सब प्रकारके कार्यारम्भका नाश और माङ्गलिक कर्म तथा अनिन्दनीयता (प्रतिष्ठा)-का अपहरण करता है। ब्राह्मणोंके आशीर्वाद, देवताओंकी स्तुति, मूलशान्ति, गोमूत्र और सरसों मिले हुए जलसे स्नान, जन्मकालिक नक्षत्र और ग्रहोंके पूजन, धर्ममय उपनिषदोंके पाठ, शास्त्रोंके दर्शन तथा गण्डान्तमें पैदा हुए बालककी अवज्ञा (कुछ कालतक उसका मुँह न देखने)-से उसके दोषकी शान्ति होती है। सातवाँ कुमार 'गर्भहा' बड़ा भयंकर है, जो स्त्रियोंके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ पिण्डको अपना ग्रास बना लेता है। प्रतिदिन पवित्रतापूर्वक रहने, प्रसिद्ध मन्त्र (कवच आदि) लिखकर बाँधने, उत्तम फूलों आदिकी माला धारण करने, पवित्र गृहमें रहने तथा अधिक परिश्रम न करनेसे गर्भवती स्त्रीकी उसके भयसे रक्षा होती है। अतः इसके लिये सदा चेष्टा करनी चाहिये। इसी प्रकार आठवाँ कुमार सस्यहा है, वह खेतीकी उपजको नष्ट करता है। उसकी भी शान्ति करनी चाहिये; इसके लिये उपाय है—खेतमें पुराना जूता रखना, अपसव्य होकर वहाँ जाना, चाण्डालका उसमें प्रवेश कराना, खेतके बाहर पूजा चढ़ाना और चन्द्रमा एवं जल (वरुण)-के नामों या मन्त्रोंका कीर्तन करना।

दुःसहकी पहली कन्या नियोजिका है। वह मनुष्योंको परायी स्त्री और पराये धनके अपहरण आदिमें लगा देती है। पवित्र ग्रन्थों, मन्त्रों अथवा स्तुतियोंके पाठसे तथा क्रोध-लोभ आदि दुर्गुणोंका त्याग करनेसे उसकी शान्ति होती है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि 'नियोजिका मुझे इन दुष्कर्मोंमें लगा रही है' यों विचारकर उसका विरोध करते हुए उन कर्मोंका त्याग करे। जब कोई अपनेको गाली दे या मार बैठे तो भी यही सोचकर कि नियोजिकाने ही इसे इस बुराईमें लगाया है, क्रोध आदिके वशीभूत न हो। इसी प्रकार विद्वान् पुरुष सदा इस बातका स्मरण करता रहे कि नियोजिका