संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- दक्ष प्रजापतिकी संतति तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन * १३३
ही मुझको और मेरे चित्तको परस्त्री-संसर्गमें लगाती है। दूसरी कन्याका नाम विरोधिनी है। वह परस्पर प्रेम रखनेवाले स्त्री-पुरुषोंमें, भाई-बन्धुओंमें, मित्रोंमें, पिता-मातामें, पिता-पुत्रमें तथा सजातीय पुरुषोंमें विरोध डाला करती है। अतः बलिकर्म (पूजोपहारसमर्पण) करने, कठोर बातोंको सहने तथा शास्त्रीय आचार-विचारका पालन करनेके द्वारा उसके भयसे अपनी रक्षा करे। तीसरी कन्याका नाम स्वयंहारिका है। वह खलिहानसे अनाज, घर और गोशालैसे दूध-घी तथा बढ़नेवाले द्रव्यसे उसकी वृद्धि नष्ट कर देती है और सदा अन्तर्धान रहती है। इतना ही नहीं, रसोईघरसे अधपका अन्न तथा अन्नभंडारसे अनाज चुरा लेती है और परोसी हुई रसोईको भोजन करनेवाले मनुष्यके साथ स्वयं भी भोजन करती है। मनुष्योंके जूठे अन्नतक चुरा लेती है। जोते हुए खेत, घर और शालासे ऋद्धि-सिद्धिको हड़प लेती है। गायों और स्त्रियोंके थनोंसे दूध गायब कर देती है। दहीसे घी, तिलसे तेल, कुसुम्भ आदिका रंग तथा रूईसे सूत हर लेती है। इस प्रकार स्वयंहारिका निरन्तर अपहरणमें ही लगी रहती है। उससे रक्षा होनेके लिये अपने घरमें मोरके जोड़े रखे। स्त्रीकी कृत्रिम मूर्ति बनाकर स्थापित करे, घरकी दीवारपर रक्षाके मन्त्र और वाक्य लिखे, घरके भीतर जूठन न रहने दे, हवनकी अग्निसे तथा देवताको धूप देनेसे जो भस्म हो, उसे लेकर दूध आदिके बर्तनोंमें लगा दे [गाय और स्त्रीके स्तनोंमें तथा अन्नभंडार आदिमें भी उस भस्मका स्पर्श करा दे]। इससे रक्षा होती है। जो एक स्थानपर निवास करनेवाले पुरुषके मनमें उद्वेग पैदा करती है, वह भ्रामणी नामकी कन्या है। उसकी शान्तिके लिये आसन, शय्या तथा उस भूमिपर, जहाँ मनुष्य रहता हो, पीली सरसों छींट दे। साथ ही एकाग्रचित्त होकर पृथ्वी-सूक्तका जप करे।
दुःसहकी पाँचवीं कन्या स्त्रियोंके मासिक धर्म नष्ट करती है। इसलिये उसे ऋतुहारिका जानना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये स्त्रीको तीर्थोंमें, देवालयके समीप, चैत्य वृक्षके नीचे, पर्वतके शिखरपर तथा नदीके संगम एवं सरोवरोंमें नहलाना चाहिये। साथ ही चिकित्साशास्त्रके ज्ञाता अच्छे वैद्यको बुलाकर उसकी दी हुई उत्तम ओषधियोंका सेवन भी कराना चाहिये। छठी कन्याका नाम स्मृतिहरा है। यह स्त्रियोंकी स्मरणशक्तिको हर लेती है। पवित्र एवं एकान्त स्थानमें रहनेसे उसकी शान्ति होती है। सातवीं कन्या बीजहरा कहलाती है। यह अत्यन्त भयानक है। स्त्री-पुरुषोंके रज-वीर्यका अपहरण किया करती है। पवित्र अन्नके भोजन तथा नित्य स्नान करनेसे उसकी शान्ति होती है। आठवीं कन्या विद्वेषिणी है, जो सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली है। यह स्त्री अथवा पुरुषको लोगोंका द्वेषपात्र बना देती है। उसकी शान्तिके लिये मधु, घृत, क्षीरमिश्रित तिलोंका हवन एवं मित्रविन्दा नामक यज्ञ करे।
दक्ष प्रजापतिकी संतति तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भृगुसे उनकी पत्नी ख्यातिने धाता और विधाता नामक दो देवताओंको उत्पन्न किया। देवाधिदेव भगवान् नारायणकी धर्मपत्नी श्रीलक्ष्मीदेवी भी ख्यातिके ही गर्भसे प्रकट हुईं। महात्मा मेरुकी दो कन्याएँ थीं—आयति और नियति। ये ही धाता और विधाताकी पत्नियाँ हुईं। इन दोनोंसे दो पुत्र हुए—प्राण तथा मेरे महायशस्वी पिता मृकण्डु। श्रीमृकण्डुसे मेरा जन्म हुआ, मेरी माता मनस्विनी देवी थीं। मेरी पत्नी धूम्रवतीके गर्भसे मेरे पुत्र वेदशिराका जन्म हुआ। अब प्राणकी सन्तानका वर्णन सुनो। प्राणका पुत्र द्युतिमान् और द्युतिमान्का अजरा हुआ। उन