संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दोनोंके बहुत-से पुत्र-पौत्र हुए।
मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमासको उत्पन्न किया। महात्मा पौर्णमासके दो पुत्र हुए—विरजा और पर्वत। अङ्गिराकी पत्नी स्मृतिने चार कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम ये हैं—सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति। इसी प्रकार महर्षि अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा तथा योगी दत्तात्रेय—इन तीन पापरहित पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुलस्त्यकी पत्नी प्रीतिसे दत्तोत्ति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो अपने पूर्वजन्ममें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'अगस्त्य' के नामसे प्रसिद्ध था। क्षमा प्रजापति पुलहकी पत्नी थी। उसने कर्दम, अर्वर्रीवत् और सहिष्णु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये। क्रतुकी पत्नी सन्नतिने साठ हजार बालखिल्य नामक ऊर्ध्वरेता महर्षियोंको उत्पन्न किया। वसिष्ठकी पत्नी ऊर्जाके गर्भसे सात पुत्र उत्पन्न हुए—रज, गात्र, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनघ, सुतपा और शुक्र। ये सभी सप्तर्षि हुए।
ब्रह्मन्! अग्नितत्त्वके अभिमानी देवता अग्नि ब्रह्माजीके प्रथम पुत्र थे। उनकी पत्नी स्वाहाने तीन पुत्र उत्पन्न किये, जो बड़े ही उदार और तेजस्वी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—पावक, पवमान और शुचि। इनमें शुचि जलको सोखनेवाला है। इन तीनोंके वंशमें प्रत्येकके पंद्रह-पंद्रहके क्रमसे पैंतालीस पुत्र हुए। इनके साथ पिता अग्नि और उनके तीन पुत्रोंकी संख्या जोड़नेसे कुल उनचास अग्नि होते हैं। ये सब-के-सब दुर्जय माने जाते हैं। ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न जो अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, अनग्निक और साग्निक पितर बतलाये गये हैं, उनसे स्वधाने दो कन्याओंको जन्म दिया, जिनके नाम थे—मेना और धारिणी। वे दोनों ही उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न तथा सभी गुणोंसे सुशोभित, ब्रह्मवादिनी एवं योगिनी थीं। इस प्रकार यह दक्ष कन्याओंकी वंश-परम्पराका वर्णन हुआ। जो श्रद्धापूर्वक इसका चिन्तन करता है, वह निःसन्तान नहीं रहता।
क्रौष्टुकि बोले—भगवन्! आपने जो अभी स्वायम्भुव मन्वन्तरकी चर्चा की है, उसका वर्णन मैं अच्छी तरह सुनना चाहता हूँ। मन्वन्तरके कालमान, देवता, देवर्षि, राजा और इन्द्र—इन सबका वर्णन कीजिये।
मार्कण्डेयजीने कहा—ब्रह्मन्! मन्वन्तरकी अवधि इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालकी होती है, यह बात बतायी जा चुकी है। अब मानव-वर्षसे मन्वन्तरका कालमान सुनो। तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षोंका एक मन्वन्तर होता है। देवताओंके मानसे आठ लाख बावन हजार वर्षोंका यह काल है। सबसे पहले मनु स्वायम्भुव हैं। इसके बाद स्वारोचिष, औत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष हैं। ये छः मनु बीत चुके हैं। इस समय वैवस्वत मनुका राज्य है। भविष्यमें सावर्णि नामवाले पाँच मनु, रौच्य मनु तथा भौम मनु—ये सात और होनेवाले हैं। इनका विस्तृत वर्णन मन्वन्तरोंके प्रकरणमें करेंगे। ब्रह्मन्! इस समय मन्वन्तरोंके देवता, ऋषि, इन्द्र और पितरोंका परिचय देता हूँ तथा उनकी उत्पत्ति, संग्रह एवं संतानोंका भी वर्णन करता हूँ। साथ ही यह भी बतलाता हूँ कि मनु और उनके पुत्रोंके राज्यका क्षेत्र कितना था।
पहले स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रथम त्रेतायुगमें प्रियव्रतके पुत्रों अर्थात् स्वायम्भुव मनुके पौत्रोंने पृथ्वीके वर्ष-विभाग किये थे। प्रजापति कर्दमजीकी पुत्री प्रजावती राजा प्रियव्रतको ब्याही गयी थी, उसके गर्भसे दो कन्याएँ और दस पुत्र हुए। कन्याओंके नाम थे—सम्राट् और कुक्षि। उन दोनोंके दसों भाई प्रजापतिके समान तेजस्वी और बड़े शूरवीर थे। उनमें सातके नाम इस प्रकार हैं—आग्नीध्र, मेधातिथि, वपुष्मान्, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, भव्य और सवन। इनके सिवा मेधा, अग्निबाहु और मित्र—ये तीन और थे, जो तपस्या और योगमें तत्पर रहते थे। इन्हें अपने पूर्वजन्मके