भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 135
  • दक्ष प्रजापतिकी संतान तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन * १३५

वृत्तान्तोंका स्मरण था। अतएव इन महाभाग्यशाली पुरुषोंने राज्य-भोगमें मन नहीं लगाया। राजा प्रियव्रतने शेष सातों पुत्रोंको सातों द्वीपोंके राजपदपर धर्मपूर्वक अभिषिक्त कर दिया। अब द्वीपोंका वर्णन सुनो।

प्रियव्रतने जम्बूद्वीपमें आग्नीध्रको राजा बनाया। प्लक्षद्वीपका राज्य मेधातिथिको सौंपा। शाल्मलद्वीपमें वपुष्मान्‌को और कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्‌को राजा बनाया। द्युतिमान् क्रौञ्चद्वीपके, भव्य शाकद्वीपके तथा सवन पुष्करद्वीपके स्वामी बनाये गये। पुष्करराज सवनके दो पुत्र हुए—महावीर और धातकि। उन्होंने पुष्करद्वीपको दो भागोंमें बाँटकर बसाया। भव्यके सात पुत्र थे, उनके नाम ये हैं—जलद, कुमार, सुकुमार, वनीयक, कुशोत्तर, मेधावी और महाद्रुम। उन्होंने अपने-अपने नामसे शाकद्वीपके सात खण्ड किये। द्युतिमान्‌के भी कुशल, मनुग, उष्ण, प्राकार, अंधकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये सात ही पुत्र थे। उनके नामसे क्रौञ्चद्वीपके सात खण्ड हुए। राजा ज्योतिष्मान्‌के कुशद्वीपमें भी उनके पुत्रोंके नामपर सात खण्ड बने, उनके नाम इस प्रकार हैं—उद्भिद, वेष्णव, सुरथ, लम्बन, धृतिमान्, प्रभाकर तथा कपिल। शाल्मलद्वीपके स्वामी वपुष्मान्‌के भी सात पुत्र हुए—श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और केतुमान्। इनके नामपर भी पूर्ववत् उक्त द्वीपके सात खण्ड बनाये गये। प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके भी सात ही पुत्र हुए और उनके नामसे प्लक्षद्वीपके भी सात खण्ड बन गये। उन खण्डोंके नाम इस प्रकार हैं—शाकभव, शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव। प्लक्षद्वीपसे लेकर शाकद्वीपतकके पाँच द्वीपोंमें वर्णाश्रम-धर्म विभागपूर्वक स्थित है। वहाँ धर्मका सदा स्वाभाविक रूपसे पालन होता है। कभी किसी जीवकी हिंसा नहीं की जाती। उन पाँचों द्वीपों और उनके वर्षोंमें सब धर्म सामान्य रूपसे सर्वत्र प्रचलित हैं।

ब्रह्मन्! राजा प्रियव्रतने आग्नीध्रको जम्बूद्वीपका राज्य दिया था। उनके नौ पुत्र हुए, जो प्रजापतिके समान शक्तिशाली थे। उनमें सबसे बड़ेका नाम नाभि था, उससे छोटा किम्पुरुष था। तीसरेका नाम हरि, चौथेका इलावृत, पाँचवेंका रम्य, छठेका हिरण्वक, सातवेंका कुरु, आठवेंका भद्राश्व और नवेंका केतुमाल था। इन पुत्रोंके नामपर ही जम्बूद्वीपके नौ खण्ड हुए। हिमवर्षको छोड़कर शेष जो किम्पुरुष आदि वर्ष हैं, उनमें सुखकी अधिकता है और बिना यत्न किये स्वभावसे ही वहाँ सब कामनाओंकी सिद्धि होती है। उनमें किसी प्रकारके विपर्यय (असुख, अकाल मृत्यु आदि) तथा जरा-मृत्युका कोई भय नहीं है और न वहाँ धर्म-अधर्म अथवा उत्तम, मध्यम, अधम आदिका ही कोई भेद है। उन आठ वर्षोंमें न चार युगोंकी व्यवस्था है, न छः ऋतुओंकी। वहाँ किसी विशेष ऋतुके कोई चिह्न नहीं दीख पड़ते। आग्नीध्रकुमार नाभिके पुत्र ऋषभ और ऋषभके भरत हुए, जो अपने सौ भाइयोंमें सबसे बड़े थे। ऋषभ अपने पुत्रको राज्य दे महाप्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण करके तपस्या करने लगे। वे महर्षि पुलहके आश्रममें ही रहते थे। उन्होंने हिम नामक वर्षको, जो सबसे दक्षिण है, अपने पुत्र भरतको दिया था; इसलिये महात्मा भरतके नामपर इसका नाम भारतवर्ष हो गया।

भरतके पुत्र सुमति हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। भरतने उनको राज्य देकर वनका आश्रय लिया। राजा प्रियव्रतके पुत्रों तथा उनके भी पुत्र-पौत्रोंने स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका उपभोग किया। द्विजश्रेष्ठ! यह मैंने तुम्हें स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि बतलायी अब और क्या सुनाऊँ?