संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 137, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें- जम्बूद्वीप और उसके पर्वतोंका वर्णन * १३७
नापक पर्वत हैं। ये भी दक्षिण भागवाले पर्वतोंकी भाँति समुद्रके भीतरतक फैले हुए हैं। द्विजश्रेष्ठ! ये मर्यादा-पर्वत कहलाते हैं।
हिमवान् और हेमकूट आदि पर्वतोंका पारस्परिक अन्तर नौ-नौ हजार योजन है। ये इलावृतवर्षके मध्यभागमें मेरुकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो जामुनके फल गिरते हैं, वे हाथीके शरीरके बराबर होते हैं। उनमेंसे जो रस निकलता है, उससे जम्बू नामकी नदी प्रकट होती है, जहाँसे जाम्बूनद नामक सुवर्ण उत्पन्न होता है। वह नदी जम्बूवृक्षके मूलभूत मेरुपर्वतकी परिक्रमा करती हुई बहती है और वहाँके निवासी उसका जल पीते हैं। भद्राश्ववर्षमें भगवान् विष्णु हयग्रीवरूपसे, भारतवर्षमें कच्छपरूपसे, केतुमालवर्षमें वाराहरूपसे तथा उत्तरकुरुमें मत्स्यरूपसे विराजते हैं।
द्विजश्रेष्ठ! मन्दर आदि चार पर्वतोंपर जो चार वन और सरोवर हैं, उनके नाम सुनो। मेरुसे पूर्वके पर्वतपर चैत्ररथ नामक वन है, दक्षिण शैलपर नन्दन वन है, पश्चिमके पर्वतपर वैभ्राज वन है और उत्तरवाले पर्वतपर सावित्र नामक वन है। पूर्वमें अरुणोद, दक्षिणमें मानस, पश्चिममें शीतोद और उत्तरमें महाभद्रनामक सरोवर है। शीतार्त्त, चक्रमुञ्ज, कुलीर, सुकङ्कवान्, मणिशैल, वृषवान्, महानील, भवाचल, सुबिन्दु, मन्दर, वेणु, तामस, निषध तथा देवशैल—ये महान् पर्वत मन्दराचलसे पूर्व दिशामें स्थित हैं। त्रिकूट, शिखराद्रि, कलिङ्ग, पतङ्गक, रुचक, सानुमान्, ताम्रक, विशाखवान्, श्वेतोदर, समूल, वसुधार, रत्नवान्, एकशृङ्ग, महाशैल, राजशैल, पिपाठक, पञ्चशैल, कैलास और हिमालय—ये मेरुके दक्षिणभागमें स्थित हैं। सुरक्ष, शिशिराक्ष, वैदूर्य, पिङ्गल, पिञ्जर, महाभद्र, सुरस, कपिल, मधु, अञ्जन, कुक्कुट, कृष्ण, पाण्डुर, सहस्रशिखर, पारियात्र और शृङ्गवान्—ये मेरुके पश्चिम विष्कम्भ विपुल गिरिसे पश्चिममें स्थित हैं। शङ्खकूट, वृषभ, हंसनाभ, कपिलेन्द्र, सानुमान्, नील, स्वर्णशृङ्ग, शतशृङ्ग, पुष्पक, मेघ, विरजाक्ष, वराहाद्रि, मयूर तथा जारुधि—ये सभी पर्वत मेरुके उत्तरभागमें स्थित हैं। इन पर्वतोंकी कन्दराएँ बड़ी मनोहर हैं। हरे-भरे वन और स्वच्छ जलवाले सरोवर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ पुण्यात्मा मनुष्योंका जन्म होता है। द्विजश्रेष्ठ! वे स्थान इस पृथ्वीके स्वर्ग हैं। इनमें स्वर्गसे भी अधिक गुण हैं। यहाँ नूतन पाप-पुण्यका उपार्जन नहीं होता। ये देवताओंके लिये भी पुण्यभोगके ही स्थान हैं। इन पर्वतोंपर विद्याधर, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता तथा गन्धर्वोंके सुन्दर एवं विशाल वासस्थान हैं। वे परम पवित्र तथा देवताओंके मनोहर उपवनोंसे सुशोभित हैं। वहाँके सरोवर भी बड़े सुन्दर हैं। वहाँ सब ऋतुओंमें सुख देनेवाली वायु चलती है। इन पर्वतोंपर मनुष्योंमें कहीं वैमनस्य नहीं होता।
इस प्रकार मैंने चार पत्रोंसे सुशोभित पार्थिव कमलका वर्णन किया है। भद्राश्व और भारत आदि वर्ष चारों दिशाओंमें इस कमलके पत्र हैं। मेरुके दक्षिणभागमें जिस भारत नामक वर्षकी चर्चा की गयी है, वही कर्मभूमि है। अन्य स्थानोंमें पाप-पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती। अतः भारतवर्षको ही सबसे प्रधान समझना चाहिये। क्योंकि वहाँ सब कुछ प्रतिष्ठित है। भारतवर्षसे मनुष्य स्वर्गलोक, मोक्ष, मनुष्यलोक, नरक, तिर्यग्योनि अथवा और कोई गति—जो चाहे प्राप्त कर सकता है।