संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, किम्पुरुष आदि वर्षोंकी विशेषता तथा भारतवर्षके विभाग, नदी, पर्वत और जनपदोंका वर्णन
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**द्विजश्रेष्ठ! विश्वयोनि भगवान् नारायणका जो ध्रुवाधार* नामक पद है, उसीसे त्रिपथगामिनी भगवती गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है। वहाँसे चलकर वे सुधाकी उत्पत्तिके स्थान और जलके आधारभूत चन्द्रमण्डलमें प्रविष्ट हुईं और सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कसे अत्यन्त पवित्र हो मेरुपर्वतके शिखरपर गिरीं। वहाँ उनकी चार धाराएँ हो गयीं। मेरुके शिखरों और तटोंसे नीचे गिरती-बहती गङ्गाका जल चारों ओर बिखर गया और आधार न होनेके कारण नीचे गिरने लगा। इस प्रकार वह जल मन्दर आदि चारों पर्वतोंपर बराबर-बराबर बँट गया। अपने वेगसे बड़े-बड़े पर्वतोंको विदीर्ण करती हुई गङ्गाकी जो धारा पूर्व दिशाकी ओर गयी, वह सीताके नामसे विख्यात हुई। सीता नैत्ररथ नामक वनको जलसे आप्लावित करती हुई अरुणोद सरोवरमें गयी और वहाँसे शीतान्त पर्वत तथा अन्य पहाड़ोंको लाँघती हुई पृथ्वीपर पहुँची। वहाँसे भद्राश्ववर्षमें होती हुई समुद्रमें मिल गयी। इसी प्रकार मेरुके दक्षिण गन्धमादनपर्वतपर जो गङ्गाकी दूसरी धारा गिरी, वह अलकनन्दाके नामसे विख्यात हुई। अलकनन्दा मेरुकी घाटियोंपर फैले हुए नन्दन वनमें, जो देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला है, बहती हुई बड़े वेगसे चलकर मानसरोवरमें पहुँची। उस सरोवरको अपने जलसे परिपूर्ण करके गङ्गा शैलराजके रमणीय शिखरपर आयी। वहाँसे क्रमशः दक्षिणमें स्थित समस्त पर्वतोंको अपने जलसे आप्लावित करती हुई महागिरि हिमवान्पर जा पहुँची। वहीं भगवान् शङ्करने गङ्गाजीको अपने शीशपर धारण कर लिया और फिर नहीं छोड़ा। तब राजा भगीरथने आकर उपवास और स्तुतिके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की। उससे प्रसन्न होकर महादेवजीने गङ्गाको छोड़ दिया। फिर वे सात धाराओंमें विभक्त होकर दक्षिण समुद्रमें जा मिलीं। उनकी तीन धाराएँ तो पूर्व दिशाकी ओर गयीं। एक धारा भगीरथके पीछे-पीछे दक्षिण दिशाकी ओर बहने लगी।
मेरुगिरिके पश्चिममें जो विपुल नामक पर्वत है, उसपर गिरी हुई महानदी गङ्गाकी धारा स्वचक्षुके नामसे विख्यात हुई। वहाँसे वैराज पर्वतपर होती हुई स्वचक्षु शीतोद सरोवरमें गयी और उसे आप्लावित करके त्रिशिख पर्वतपर पहुँच गयी। फिर वहाँसे अन्य पर्वतोंके शिखरोंपर होती हुई केतुमालवर्षमें पहुँचकर खारे पानीके समुद्रमें मिल गयी। मेरुके उत्तरीय पाद सुपार्श्वपर्वतपर
* इसको शिशुमार चक्र भी कहते हैं