संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, किम्पुरुष आदि वर्षोंकी विशेषता तथा भारतवर्षके विभाग * १३९
गिरे हुए गङ्गाकी धारा सोमाके नामसे विख्यात हुई और सावित्र वनको पवित्र करती हुई महाभद्र सरोवरमें जा पहुँची। वहाँसे शङ्खकूट पर्वतपर जा क्रमशः वृषभ आदि शैलमालाओंको लाँघती हुई उत्तरकुरु नामक वर्षमें बहने लगी। अन्ततोगत्वा महासागरमें जा मिली।
द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें गङ्गाजीकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कह सुनाया। साथ ही जम्बूद्वीपका निवेश और उसके वर्ष-विभाग भी बतला दिये। किम्पुरुष आदि समस्त वर्षोंमें प्रजा बड़े सुखसे रहती है। उसे किसी प्रकारका भय नहीं सताता। उनमें कोई छोटा-बड़ा या ऊँच-नीच नहीं होता। जम्बूद्वीपके नवों वर्षोंमें सात-सात कुल पर्वत हैं और प्रत्येक देशमें पर्वतोंसे निकली हुई अनेकानेक नदियाँ हैं। विप्रवर! किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, वहाँ पृथ्वीसे ही प्रचुर जल निकलता है; किन्तु भारतवर्षमें वर्षाके जलसे विशेष कार्य चलता है। उक्त आठ वर्षोंमें वार्क्षी, स्वाभाविकी, देश्या, तोयोत्था, मानसी तथा कर्मजा सिद्धियाँ मनुष्योंको प्राप्त होती हैं। कामना पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष आदि वृक्षोंसे जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसे वार्क्षी-सिद्धि कहते हैं। स्वभावसे ही प्राप्त होनेवाली सिद्धि स्वाभाविकी कहलाती है। देशसे या स्थानविशेषसे जो कार्यसिद्धि होती है, उसका नाम देश्या है। जलकी सूक्ष्मतासे होनेवाली सिद्धि तोयोत्था कही गयी है। ध्यानसे ही प्राप्त होनेवाली सिद्धिको मानसी कहते हैं तथा उपासना आदि कर्मसे जो सिद्धि प्राप्त होती है; वह कर्मजा कहलाती है। किम्पुरुष आदि वर्षोंमें युगकी व्यवस्था और आधि-व्याधि नहीं हैं। वहाँ पाप पुण्यका अनुष्ठान भी नहीं देखा जाता।
**क्रौष्टुकिने कहा—**भगवन्! आपने जम्बूद्वीपका संक्षेपसे वर्णन किया; किन्तु महाभाग! अभी-अभी आपने जो यह कहा कि भारतवर्षको छोड़कर और कहीं किया हुआ कर्म पुण्य और पापका जनक नहीं होता, केवल भारतवर्षसे ही मोक्ष तथा स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पाताल आदि लोकोंकी प्राप्ति हो सकती है। मनुष्योंके लिये और किसी भूमिपर कर्मका विधान नहीं है, केवल यह भारत ही कर्मभूमि है। अतः भारतवर्षका वृत्तान्त विस्तारके साथ बतलाइये। जितने इसके भेद हों, जैसी इस देशकी स्थिति हो और जो-जो यहाँ पर्वत हों, उन सबका भलीभाँति वर्णन कीजिये।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**ब्रह्मन्! सुनो, भारतवर्षके नौ विभाग हैं, उन सबके बीचमें समुद्रका अन्तर है; अतः एक विभागके मनुष्यका दूसरे विभागमें जाना असम्भव है। उक्त नौ विभागोंके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्यद्वीप, गान्धर्वद्वीप, वारुणद्वीप और नवाँ यह भारतवर्ष। भारत भी समुद्रसे घिरा है। यह उत्तरसे दक्षिणतक एक हजार योजन बड़ा है। इसके पूर्वमें किरात और पश्चिममें यवन रहते हैं। बीचमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंका निवास है। ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग यहाँ यज्ञ, शस्त्र-ग्रहण और व्यवसाय आदि कर्मोंसे अपनेको पवित्र करते हैं; तथा इन्हींसे इनका जीवन-निर्वाह भी होता है। इतना ही नहीं, इन्हीं कर्मोंसे ये स्वर्ग, मोक्ष और पुण्य प्राप्त करते हैं तथा इन्हींको ठीक-ठीक न करनेसे इन्हें पाप भोगना पड़ता है।
महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात ही यहाँ कुल-पर्वत हैं। इनके निकट और भी हजारों पर्वत हैं। ये सभी अत्यन्त विस्तृत, ऊँचे तथा रमणीय हैं। इनके शिखर भी बहुत से हैं। इनके सिवा कोलाहल, वैभ्राज, मन्दर, दर्दुराचल, वातस्वन, वैद्युत, मैनाक, स्वरस, तुङ्गप्रस्थ, नागगिरि, रोचन, पाण्डुराचल, पुष्पागिरि, दुर्जयन्त, रैवत, अर्बुद, ऋष्यमूक, गोमन्त, कूटशैल, कृतस्मर, श्रीपर्वत और चकोर आदि सैकड़ों पर्वत और हैं, जिनसे मिले हुए म्लेच्छ और आर्य जनपद विभागपूर्वक स्थित हैं। वे लोग