संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भारतवर्षमें भगवान् कूर्मकी स्थितिका वर्णन * १४१
अनीकट, पुलिन्द, सुमीन, रूपप, श्वापद, कुरुमिन, कठाक्षर, कारसमर, लोहजङ्घ, वाजेय, राजभद्रक, नासिक्याव, नर्मदाके उत्तरके देश, भीरुकच्छ माहेय, सारस्वत, काश्मीर, सुराष्ट्र, आवन्त्य और अर्बुद—ये अपरान्त-प्रदेश हैं। अब विन्ध्यनिवासियोंके देश बतलाये जाते हैं। सरज, करूष, केरल, उत्कल, उत्तमर्ण, दशार्ण, भोज्य, किष्किन्ध्यक, तोशल, कोसल, त्रैपुर, वैदिश, तुम्बूर, तुम्बुल, पटु, नैषध, अन्नज, तुष्टिकार, वीरहोत्र और अवन्ति—ये सभी जनपद विन्ध्याचलकी घाटियोंमें बसे हैं।
अब पर्वतीय देशोंका वर्णन किया जाता है—नीहार, हंसमार्ग, कुरु, गुर्गण, खस, कुन्तप्रावरण, ऊर्ण, दार्ब, कृत्रक, त्रिगर्त, मालव, किरात और तामस। ये पर्वतोंके आश्रयमें बसे हैं। इतने देशोंसे परिपूर्ण यह भारतवर्ष है। इसमें चारों दिशाओंके देशोंकी स्थिति है। इसमें सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि—इन चारों युगोंकी व्यवस्था है। भारतवर्षके दक्षिण, पश्चिम तथा पूर्वमें महासागर है और उत्तरकी ओर धनुषकी प्रत्यङ्गाके समान हिमालय पर्वतकी स्थिति है। यह भारतवर्ष सब प्रकारकी उन्नतिका बीज है। यहाँ शुभकर्म करनेसे ब्रह्मपद, इन्द्रपद, देवलोक और मरुद्गणोंका स्थान भी मिलता है। इसी प्रकार यहाँ निन्दित कर्म करनेसे मनुष्यको मृग, पशु, सर्प तथा स्थावरोंकी योनि भी मिल सकती है। ब्रह्मन्! इस जगत्में भारतवर्षके सिवा दूसरा कोई देश कर्मभूमि नहीं है। ब्रह्मर्षे! देवताओंके मनमें भी सदा यह अभिलाषा रहा करती है कि 'हम देवयोनिसे भ्रष्ट होनेपर भारतवर्षमें मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हों।' उनका कहना है कि 'भारतवर्षके मनुष्य वह कार्य कर सकते हैं, जो देवता और असुरोंके लिये भी असम्भव है; किन्तु खेदकी बात है कि ये मनुष्य कर्मबन्धनमें बँधकर अपने कर्मोंकी ख्याति—अपनी कीर्ति फैलानेको उत्सुक रहते हैं और लेशमात्र सांसारिक सुखके प्रलोभनमें पड़कर नित्य अक्षय सुखकी प्राप्तिके लिये कोई भी कर्म नहीं करते।'
भारतवर्षमें भगवान् कूर्मकी स्थितिका वर्णन
क्रौष्टुकिने कहा— भगवन्! आपने मुझसे भारतवर्षका भलीभाँति वर्णन किया तथा वहाँकी नदियों, पर्वतों और जनपदोंको भी बतलाया। इसके पहले आपने यह कहा था कि भारतवर्षमें भगवान् श्रीहरि कूर्मरूपसे निवास करते हैं, सो उनकी स्थिति कहाँ और किस प्रकार है, यह सब सुननेको मेरी इच्छा हो रही है। कूर्मरूपी भगवान् जनार्दन किस रूपमें स्थित हैं, उनसे मनुष्योंके शुभ-अशुभकी सूचना कैसे मिलती है? भगवान् कूर्मका मुख कैसा है? और उनके चरण कौन हैं? ये सारी बातें बताइये।
मार्कण्डेयजी बोले— ब्रह्मन्! कूर्मरूपधारी भगवान् श्रीहरि नौ भेदोंसे युक्त इस भारतवर्षको आक्रान्त करके स्थित हैं। उनका मुख पूर्व दिशाकी ओर है। उनके चारों ओर नौ भागोंमें विभक्त होकर सम्पूर्ण नक्षत्र और देश स्थित हैं। उन्हें बतलाता हूँ, सुनो। वेदि, मद्र, अरिमण्डव्य, शाल्व, नीप, शक्र, उज्जिहान, घोषसंख्य, खस, सारस्वत, मत्स्य, शूरसेन, माथुर, धर्मारण्य, ज्योतिषिक, गौरग्रीव, गुडाश्मक, उदेहक, पाञ्चाल, सङ्केत, कंक, मारुत, कालकोटि, पाखण्ड, पारियात्रनिवासी, कापिञ्जल, कुरुबाह्य, उदुम्बर तथा गजाह्वय (हस्तिनापुर आदि)—के मनुष्य भगवान् कूर्मके मध्यभाग (कटिप्रदेश)-में स्थित हैं। कृत्तिका, रोहिणी और मृगशिरा—ये तीन नक्षत्र उक्त स्थानके निवासियोंके लिये शुभाशुभके सूचक होते हैं। वृषभध्वज, अञ्जन, जम्बू, मानवाचल, शूर्पकर्ण, व्याघ्रमुख, खर्भक, कर्बटाशन, चन्द्रेश्वर, खश,