संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मगध, मैथिल, पौण्ड्र, वदन्वन्तुर, प्राग्ज्योतिष, लौहित्य, सामुद्र, पुरुषादक, पूर्णोत्कट, भद्रगौर, उदयगिरि, काशी, मेखल, मुष्ट, ताम्रलिप्त, एकपादप, वर्धमान और कोसल—ये देश कूर्मभगवान्के मुखभागमें स्थित हैं। आर्द्रा, पुनर्वसु और पुष्य—ये तीन नक्षत्र भी उनके मुखमें हैं।
अब कूर्मभगवान्के दक्षिण चरणमें जो देश हैं, उनके नाम सुनो—कलिङ्ग (उड़ीसा), बङ्ग (बंगाल), जठर, कोसल, मूषिक, चेदि, ऊर्ध्वकर्ण, मत्स्य, अन्ध्र, विन्ध्यवासी, विदर्भ (बरार), नारिकेल, धर्मद्वीप, ऐलिक, व्याघ्रग्रीव, महाग्रीव, त्रैपुर, श्मश्रुधारी, कैष्किन्ध्य, हेमकूट, निषध, कटकस्थल, दशार्ण, हारिक, नग्न, निषाद, काकलालक, पर्ण तथा शबर। ये देश भगवान् कूर्मके पूर्व-दक्षिण दिशावाले चरणमें स्थित हैं। आश्लेषा, मघा और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र भी वहीं हैं। लङ्का, कालाजिन, शैट्टिक, निकटर महेन्द्र, गलव और दर्दुर पर्वतोंके पास बसे हुए जनपद, कर्कोटक वनमें रहनेवाले लोग तथा भृगुकच्छ, कोङ्कण, सम्पूर्ण आभीर-प्रदेश, वेण्या नदीके तटपर बसे हुए देश, अवन्ति, दासपुर, आकारी, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोनर्द, चित्रकूट, चोल, कोलगिरि, क्रौञ्चद्वीप, जटाधर, कावेरीके तटवर्ती देश, ऋष्यमूक पर्वतपर बसे हुए प्रदेश, नासिक, शङ्ख, शुक्ति आदि तथा वैदूर्य पर्वतके समीपवर्ती देश, वारिचर कोल, चर्मपट्ट, गवद्वाह्य, कृष्णद्वीपवासी, सूर्याद्रि और कुमुदाद्रिके निवासी, औखा का, दिशिक, कर्णप्रावरक, दक्षिण, कौरुष, ऋषिक, तापनाश्रम, ऋषभ, सिंहल, काञ्चीनिवासी, त्रिलिङ्ग, कुञ्जरदरी तथा कच्छमें रहनेवाले लोग और ताम्रपर्णी नदीके तटवर्ती देश—ये भगवान् कूर्मकी दायीं कुक्षिमें स्थित हैं। उत्तरा-फाल्गुनी, हस्त तथा चित्रा—ये तीन नक्षत्र भी वहीं हैं।
काम्बोज, पह्लव, वडवामुख, सिन्धु, सौवीर, आनर्त, वनितामुख, द्रावण, शूद्र, कर्ण, प्राधेय, बर्बर, किरात, पारद, पाण्ड्य, पारशव, कल, धूर्तक, हैमगिरिक, सिन्धु, कालक, वैरत, सौराष्ट्र, दरद, द्राविड़, महार्णव—ये देश कूर्मभगवान्के दक्षिण चरणमें स्थित हैं। स्वाती, विशाखा और अनुराधा नक्षत्र भी वहीं हैं। मणिमेघ, क्षुरार्द्रि, खञ्जन, अस्तगिरि, अपरान्तिक, हैहय, शान्तिक, विप्रशस्तक, कोङ्कण, पञ्चनद, वमन, अवर, तारक्षुर, अङ्गतक, शर्कर, शाल्मवेश्मक, गुरुस्वर, फाल्गुनकद वेणुमतीनिवासी, फाल्गुलुक, घोर, गुरुह, चकल, एकेक्षण, वाजिकेश, दीर्घग्रीव, सुचूलिक तथा अश्वकेश—ये देश भगवान् कच्छपके पुच्छभागमें स्थित हैं। वहीं ज्येष्ठा, मूल और पूर्वाषाढा नक्षत्र भी हैं। माण्डव्य, चण्डखार, अश्मक, ललन, कुशात्त, लडह, स्त्रीवाह्य, बालिक, नृसिंह, वेणुमतीवासी, बालावस्थ, धर्मबद्ध, उलूक तथा ऊरुर्भनिवासी मनुष्य भगवान् कूर्मके बायें चरणमें स्थित हैं। उत्तराषाढा, श्रवण और धनिष्ठाकी भी वहीं स्थिति है। कैलास, हिमवान्, धनुष्मान्, वसुमान्, क्रौञ्च, कुरुवक, क्षुद्रवीणा, रसालय, भोगप्रस्थ, यामुन, अन्तर्द्धीप, त्रिगर्त, अग्नीज्य, अर्दन, अधमुख, चिञ्चिड, केशधारी, दासेरक, वाटधान, शवधान, पुष्कल, अधम, कैरात, तक्षशिलाश्रय, अम्वाल, मालव, मद्र, वेणुक, बर्दन्तिक, पिङ्गल, मानकलह, हूण, कोहलक, माण्डव्य, भूतिसुवक, शातक, हेमतारक, यशोमत्य, गान्धार, स्वर, सागराणि, यौधेय, दासमेय, राजन्य, श्यामक तथा शेनधूर्त—ये कूर्मभगवान्की बायीं कुक्षिमें हैं। शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा और उत्तराभाद्रपदा—ये तीन नक्षत्र भी वहीं हैं। किन्नरराज्य, पशुपाल, कीचक, काश्मीरक, अभिसारजन, दरद, अङ्गण, कुरट, अन्नदारक, एकपाद, खश, घोष, स्वर्ग, भौम, अनवद्य, यवन, हिङ्ग, चोरप्रापरण, त्रिनेत्र, पौरव तथा गन्धर्व—ये कच्छपभगवान्के पूर्व-उत्तरवाले चरणके आश्रित हैं। रेवती, अश्विनी और भरणी भी वहीं हैं।
विप्रवर! उक्त देशोंमें क्रमश: ये ही नक्षत्र ऐसे हैं, जिनके कारण मनुष्योंको पीड़ा होती है अर्थात् जब इनके साथ दुष्ट ग्रहोंका योग होता है तो ये उनसे प्रभावित होकर प्रजाको कष्ट देते हैं और उत्तम ग्रहोंके योग होनेपर वे वहाँके मनुष्योंको