संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भारतवर्षमें भगवान् कूर्मकी स्थितिका वर्णन * १४७
अभ्युदयकी प्राप्ति कराते हैं। जिस नक्षत्रराशिका जो ग्रह स्वामी है, उसीके अशुभ भावमें रहनेपर उस देशके लोगोंको कष्ट होता है और वही ग्रह जब उच्च स्थानमें होता है तो शुभ फलोंकी प्राप्ति होती है। नक्षत्रों और ग्रहोंमें होनेवाला शुभाशुभ फल साधारणतया सब देशोंमें सभी मनुष्योंको प्राप्त होता है। यदि अपने नक्षत्र खराब हों अथवा जन्मके समय ग्रह अशुभ स्थानोंमें पड़े हों तो मनुष्यको कष्ट भोगना पड़ता है। यह बात प्रत्येकके लिये सामान्य रूपसे लागू होती है। इसी प्रकार यदि नक्षत्र और ग्रह अच्छे पड़े हों तो उसका फल शुभ होता है। पुण्यात्मा मनुष्यके ग्रह यदि अशुभ स्थानोंमें हों तो उन्हें द्रव्य, गोष्ठ, भृत्य, सुहृद्, पुत्र एवं भार्याकी भी हानि उठानी पड़ती है। यदि पुण्य थोड़ा है तो अपने शरीरपर भी भय आ सकता है और जिन्होंने अधिक मात्रामें पाप ही-पाप किये हैं, उन्हें तो सर्वत्र ही द्रव्य आदि तथा शरीर—सभीकी हानि उठानी पड़ती है। जो सर्वथा निष्पाप हैं, उन्हें ग्रह आदिसे कभी कहीं भी भय नहीं है। नक्षत्र और ग्रहसे प्राप्त शुभाशुभ फलको मनुष्य कभी तो अकेले भोगता है और कभी-कभी साधारणतया सम्पूर्ण दिशा, देश, जन-समुदाय, राजा अथवा पुत्रके साथ भोगता है। जब ग्रह दूषित नहीं होते तो मनुष्य परस्पर अपनी रक्षा करते हैं और ग्रहोंके दूषित हो जानेपर उन्हें शुभ फलोंसे वञ्चित होना पड़ता है। यहाँ कूर्मभगवान्के विग्रहमें जो नक्षत्रोंकी स्थिति बतायी गयी है, वे नक्षत्र उन-उन देशोंके लिये सामान्य रूपसे शुभ या अशुभ होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अपने देश-नक्षत्र तथा ग्रहजनित पीड़ाको उपस्थित देख उसको विधिपूर्वक शान्ति करे। साथ ही लोकवादोंका भी शमन करे। आकाशसे देवताओं तथा दैत्य आदिके जो शस्त्र पृथ्वीपर गिरते हैं, उन्हें लोकमें 'लोकवाद' कहा गया है। विद्वान् पुरुष उन सबकी शान्ति करे, लोकवादोंकी कभी भी उपेक्षा न करे; क्योंकि उनकी शान्ति करनेसे ही उनके द्वारा प्राप्त होनेवाले भयका निवारण होता है। लोकवादों और ग्रहोंके अनुकूल होनेपर शुभ फलका उदय एवं पापका नाश होता है तथा प्रतिकूल होनेपर वे बुद्धि एवं धन आदिका भी नाश कर डालते हैं। अतः उनकी शान्तिके लिये द्रोहका त्याग तथा उपवास करे। देवस्थानों तथा देववृक्षोंको प्रणाम करना भी उत्तम माना गया है। जप, होम, दान और स्नान करे तथा क्रोधको त्याग दे। विद्वान् पुरुष किसीसे भी द्रोह न करे। सब प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखे। दुर्वचन न कहे और बढ़-बढ़कर बातें न बनाये।
इस प्रकार मैंने भारतवर्षमें स्थित भगवान् कूर्मके स्वरूपका वर्णन किया। वे अचिन्त्यात्मा नारायण हैं, उन्हींमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिति है। उन्हींमें सम्पूर्ण देवता और नक्षत्र-मण्डल हैं। उन्हींके भीतर अग्नि, पृथ्वी और सोम हैं। मेष आदि तीन राशियाँ भगवान् कूर्मके मध्यभाग (कटिप्रदेश) में हैं। मिथुन और कर्क मुखमें स्थित हैं। पूर्व और दक्षिणवाले चरणमें कर्क तथा सिंह हैं। सिंह, कन्या और तुला—ये तीन राशियाँ उनकी कुक्षिमें हैं। तुला और वृश्चिक दक्षिण-पश्चिमवाले चरणमें हैं। पृष्ठभागमें वृश्चिक और धन स्थित हैं, वायव्यकोणवाले चरणमें धन, मकर और कुम्भ हैं। उत्तर कुक्षिमें कुम्भ और मीनकी स्थिति है तथा ईशानकोणवाले चरणमें मीन और मेष राशि हैं। ब्रह्मन्! भगवान् कूर्मके श्रीविग्रहमें सम्पूर्ण देश स्थित हैं, उन देशोंमें नक्षत्र हैं, नक्षत्रोंमें राशियाँ हैं और राशियोंमें ग्रहोंकी स्थिति है। अतः यह नक्षत्रोंमें पीड़ा होनेपर देशोंमें भी पीड़ा होती है, ऐसा जानना चाहिये और इसकी शान्तिके लिये विधिवत् स्नान करके दान-होम आदिका अनुष्ठान करना चाहिये।