संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भद्राश्व आदि वर्षोंका संक्षिप्त वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुने! इस प्रकार मैंने भारतवर्षका यथावत् वर्णन किया। इस देशमें ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चार युगों तथा चार वर्णोंकी व्यवस्था है। अब शैलराज देवकूटके पूर्व जो भद्राश्ववर्ष है, उसका वर्णन सुनो। वहाँ श्वेतपर्ण, नील, पर्वतश्रेष्ठ शैवाल, कौरङ्ग तथा पर्णशालाग्र—ये पाँच कुलपर्वत हैं। इनसे उत्पन्न हुए और भी बहुततेरे छोटे-छोटे पर्वत हैं। उनसे लगे हुए अनेक प्रकारके हजारों जनपद हैं, जिनके नाम कुमुदसंकाश, शुद्धसानु और सुमङ्गल आदि हैं। सीता, शङ्खावती, भद्रा तथा चक्रावर्ता आदि वहाँकी नदियाँ हैं, जिनके पाट बहुत विस्तृत हैं। उनका जल बहुत ठंडा होता है। भद्राश्ववर्षके सभी मनुष्य शङ्ख तथा शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान् होते हैं। उन्हें दिव्य पुरुषोंका संग प्राप्त होता है। वे बड़े पुण्यात्मा होते हैं। उनमें उत्तम-मध्यमका भेद नहीं होता, सब समान ही देखे जाते हैं। वे स्वभावतः सहनशीलता आदि आठ गुणोंसे युक्त होते हैं। वहाँ चार भुजाधारी भगवान् विष्णु हयग्रीवरूपसे विराजमान रहते हैं। वे मस्तक, हृदय, लिङ्ग, चरण, हाथ और तीन नेत्रोंसे सुशोभित हैं। उन जगदीश्वरके अङ्गोंमें भी पूर्ववत् देशोंकी स्थिति जाननी चाहिये।
अब उससे पश्चिममें स्थित केतुमालवर्षका वर्णन सुनो। वहाँ विशाल, कम्बल, कृष्ण, जयन्त, हरिपर्वत, विशोक और वर्धमान—ये सात कुलपर्वत हैं। इनके सिवा और भी बहुत-से पर्वत हैं जहाँ लोग निवास करते हैं। उस देशमें मौलि, महाकाय, शाकपोत, करन्धक तथा अङ्गुल आदि सैकड़ों जनपद हैं। वहाँके लोग वङ्कुरूपाणा, रत्नकम्बला, अमोघा, कामिनी श्यामा तथा अन्यान्य सहस्रों नदियोंके जल पीते हैं। उस देशमें भगवान् श्रीहरि वराहरूपसे विराजमान हैं। वे अपने हाथ, पैर, मुख, हृदय, पीठ, पँसली आदि अङ्गोंमें बहुत-से देश एवं तीन-तीन नक्षत्र पूर्ववत् धारण करते हैं। वे नक्षत्र भी पहलेकी ही भाँति उन-उन देशोंके लिये शुभाशुभसूचक होते हैं।
मुनिश्रेष्ठ! यह मैंने केतुमालवर्षके विषयमें कुछ बातें बतायी हैं, अब मुझसे उत्तरकुरुवर्षका वर्णन सुनो। वहाँकी भूमि मणिमयी और वायु सुगन्धित तथा सर्वदा सुख देनेवाली होती है। जो लोग देवलोकसे च्युत होते हैं, वे ही उस देशमें जन्म लेते हैं। उस देशमें गिरिराज चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त—ये दो कुलपर्वत हैं। वहाँ भद्रसोमा नामवाली महानदी पवित्र एवं स्वच्छ जलकी धारा बहाती हुई निरन्तर बहती रहती है। इसके सिवा और भी हजारों नदियाँ बहती हैं। कुलपर्वतोंके अतिरिक्त और भी अनेक पर्वत हैं तथा सैकड़ों एवं सहस्रों वन हैं, जहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट नाना प्रकारके फल उपलब्ध होते हैं। उत्तरकुरुवर्षमें भी भगवान् श्रीकृष्ण पूर्वकी ओर सिर करके मत्स्यरूपमें विराजमान रहते हैं। उनके भिन्न भिन्न नौ अवयवोंमें तीन तीनके क्रमसे सभी नक्षत्र नौ भागोंमें विभक्त होकर स्थित हैं; इसी प्रकार वहाँके देश भी नौ भागोंमें विभक्त हैं। उस देशमें चन्द्रद्वीप और भद्रद्वीप नामक दो द्वीप हैं, जो समुद्रके भीतर स्थित हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने उत्तरकुरुवर्षका वर्णन किया; अब किम्पुरुष आदिका वर्णन सुनो।
वहाँके स्त्री-पुरुष रोग और शोकसे रहित होते हैं। उस वर्षमें प्लक्षखण्ड नामक एक मनोहर वन है, जो नन्दनवनके समान रमणीय जान पड़ता है। वहाँके पुरुष सदा उस वनके फलोंका रस पीते हैं। इससे उनकी जवानी सदा स्थिर रहती है और वहाँकी स्त्रियोंके शरीरसे कमलकी सुगन्ध आती है। किम्पुरुषवर्षके बाद अब हरिवर्षका