संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें- स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १४५
परिचय दिया जाता है। वहाँके मनुष्य चाँदीके समान गौरवर्णके होते हैं। देवलोकसे च्युत होनेके कारण उन सबका स्वरूप देवताओंके ही समान होता है। हरिवर्षके सभी मनुष्य उत्तम इक्षुरसका पान करते हैं। वहाँ किसीको वृद्धावस्थाका कष्ट नहीं भोगना पड़ता। वे सब-के-सब अजर होते हैं। जबतक जीते हैं, नीरोग रहते हैं। अब जम्बूद्वीपके बीचमें स्थित इलावृतवर्षका वर्णन सुनो—इसे मेरुवर्ष भी कहा गया है। वहाँ सूर्य नहीं तपता और मनुष्योंको वृद्धावस्था नहीं सताती। चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र और ग्रहोंकी किरणें वहाँ प्रकाशमें नहीं आतीं, क्योंकि स्वयं मेरुपर्वतकी प्रभा उन सबकी अपेक्षा बढ़कर होती है। वहाँके मनुष्य जामुनके फलका रस पीते और कमलों-सी कान्ति धारण करनेवाले, कमलके समान सुगन्धित एवं कमलदलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले होते हैं। इलावृतवर्षके मध्यमें मेरुपर्वतकी स्थिति है। वह शराव (पुरवे)-के समान नीचे पतला और ऊपर चौड़ा होता गया है। उस वर्षमें महागिरि मेरु ही एक पर्वत है और उसीसे इलावृतवर्षकी प्रसिद्धि हुई है। इसके बाद रम्यकवर्षका वर्णन करता हूँ, सुनो। वहाँ हरे पत्तोंसे सुशोभित एक ऊँचा बरगदका वृक्ष है। उसीके फलका रस पीकर वहाँके निवासी जीवन निर्वाह करते हैं। वे जरा और दुर्गन्धसे रहित तथा अत्यन्त निर्मल होते हैं। एक-दूसरेके प्रति प्रगाढ़ प्रेम ही उनका प्रधान गुण है। उसके उत्तरमें हिरण्मय नामक वर्ष है, जहाँ प्रचुर कमल-वनोंसे सुशोभित हिरण्यवती नामकी नदी बहती है। वहाँके मनुष्य बहुत बड़े बलवान्, तेजस्वी, यक्षके समान सुन्दर, महान् पराक्रमी, धनवान् तथा नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले होते हैं।
स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन
क्रौष्टुकि बोले— महामुने! आपने मेरे प्रश्नके अनुसार पृथ्वी, समुद्र आदिकी स्थिति तथा प्रमाण आदिका भलीभाँति वर्णन किया। अब मैं मन्वन्तरों, उनके स्वामियों, देवताओं, ऋषियों तथा मनुपुत्रोंका परिचय सुनना चाहता हूँ।
मार्कण्डेयजीने कहा— मुने! मैंने तुम्हें स्वायम्भुव मन्वन्तरकी बातें तो बता दीं अब स्वारोचिष नामक दूसरे मन्वन्तरका वर्णन सुनो। वरुणा नदीके तटपर अरुणास्पद नामक नगरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनका रूप अश्विनीकुमारोंके समान मनोहर था। वे स्वभावसे मृदु, सदाचारी तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी थे। अतिथियोंके प्रति उनका सदा ही प्रेम बना रहता था। रातको घरपर आये हुए अभ्यागतोंको वे ठहरनेके लिये स्थान देते और उनके भोजन आदिकी भी व्यवस्था करते थे। उनके मनमें प्रायः यह विचार उठा करता था कि 'मैं रमणीय वन, उद्यान तथा भाँति-भाँतिके नगरोंसे सुशोभित सम्पूर्ण भूमण्डलको घूम-घूमकर देखूँ।' एक दिन उनके घरपर कोई अतिथि पधारे, जो नाना प्रकारकी ओषधियोंके प्रभावको जाननेवाले तथा मन्त्रविद्यामें प्रवीण थे। ब्राह्मणने श्रद्धापूर्ण हृदयसे अतिथिका स्वागत-सत्कार किया। बातचीतके प्रसङ्गमें अभ्यागतने ब्राह्मणसे अनेकों देशों, रमणीय नगरों, वनों, नदियों, पर्वतों और पुण्यतीर्थोंकी बातें बतायीं। यह सब सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले—'विप्रवर! आपने अनेक देश देखनेके कारण बहुत परिश्रम उठाया है तो भी न तो आप अत्यन्त बूढ़े हुए और न जवानीने ही आपका साथ छोड़ा। थोड़े ही समयमें आप सारी पृथ्वीपर कैसे भ्रमण कर लेते हैं?'
आगन्तुक ब्राह्मणने कहा— 'ब्रह्मन्! मन्त्र और ओषधियोंके प्रभावसे मेरी गति कहीं भी नहीं रुकती। मैं आधे दिनमें एक हजार योजन चलता हूँ।