भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

१४६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

आगन्तुक ब्राह्मण बड़े विद्वान् थे; अतः गृहस्थ ब्राह्मणको उनकी बातोंपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे बड़े आदरके साथ बोले—'भगवन्! मुझपर भी कृपा कीजिये और अपने मन्त्रका प्रभाव दिखलाइये। इस पृथ्वीको देखनेकी मेरी बड़ी इच्छा है।' यह सुनकर उदारचित्त आगन्तुक ब्राह्मणने उन्हें पैरमें लगानेके लिये एक लेप दिया और वे जिस दिशाको जाना चाहते थे, उसे अपने मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया। वह लेप अपने पैरोंमें लगाकर ब्राह्मण देवता अनेकों झरनोंसे सुशोभित हिमालय पर्वतको देखनेके लिये गये। उन्होंने सोचा था कि 'मैं आधे दिनमें एक हजार योजन दूर जाऊँगा और शेष आधे दिनमें पुनः घर लौट आऊँगा।' वे हिमालयके शिखरपर पहुँच गये; किंतु शरीरमें अधिक थकावट नहीं हुई। उन्होंने वहाँकी पर्वतीय भूमिपर पैदल ही विचरना आरम्भ किया। बर्फपर चलनेके कारण उनके पैरोंमें लगा हुआ दिव्य औषधिका लेप धुल गया। इससे उनकी तीव्र-गति कुण्ठित हो गयी। अब वे इधर-उधर घूमकर हिमालयके अत्यन्त मनोहर शिखरोंका अवलोकन करने लगे। वहाँ सिद्ध और गन्धर्व रहते थे। किन्नरगण विहार करते थे तथा इधर-उधर देवता आदिके क्रीड़ा-विहारसे वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। सैकड़ों दिव्य अप्सराओंसे भरे हुए बर्फके मनोहर शिखरोंका दर्शन करनेसे ब्राह्मणदेवताको तृप्ति नहीं हुई। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया।

फिर दूसरे दिन आनेका विचार करके जब वे घर जानेको उद्यत हुए तो उन्हें अपने पैरोंकी गति कुण्ठित जान पड़ी। वे सोचने लगे—'अहो! यहाँ बर्फके पानीसे मेरे पैरका लेप घुल गया। इधर यह पर्वत अत्यन्त दुर्गम है और मैं अपने घरसे बहुत दूर चला आया हूँ। अब तो घरपर न पहुँच सकनेके कारण मेरे अग्निहोत्र आदि नित्यकर्मकी हानि होना चाहती है। यहाँ रहकर वह सब कैसे करूँगा। यह तो मेरे ऊपर बहुत बड़ा संकट आ रहा है। इस अवस्थामें यदि मुझे किन्हीं तपस्वी महात्माका दर्शन हो जाता तो वे घर पहुँचनेके लिये मुझे कोई उपाय बतलाते।'

इस प्रकार विचार करते हुए ब्राह्मण देवता हिमालयपर विचरने लगे। चरणोंकी औषधिजनित शक्ति नष्ट हो जानेके कारण उन्हें बड़ी चिन्ता हो रही थी। इस प्रकार वहाँ घूमते हुए ब्राह्मणपर एक श्रेष्ठ अप्सराकी दृष्टि पड़ी, जो अपने मनोहर रूपके कारण बड़ी शोभा पा रही थी। उसका नाम वरुथिनी था। उन्हें देखते ही वरुथिनी कामदेवके वशीभूत हो गयी। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके प्रति तत्काल उसका प्रेम हो गया। वह सोचने लगी, 'ये कौन हैं? इनका रूप तो बड़ा ही मनोहर है। यदि ये मुझे ठुकरा न दें तो मेरा जन्म सफल हो जाय। मैंने बहुत-से देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्धर्व और पन्नगोंको देखा है; किन्तु एक भी इन महात्माके समान रूपवान् नहीं है। जिस प्रकार इनमें मेरा अनुराग हो गया है, उसी प्रकार यदि ये भी मुझमें अनुरक्त हो जायँ तो मेरा काम बन जाय। फिर तो मैं यह समझूँगी कि मैंने बहुत बड़े पुण्यका उपार्जन किया है।'