संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १४७
इस प्रकार चिन्ता करती हुई वह दिव्यलोककी सुन्दरी युवती कामदेवसे व्याकुल हो अत्यन्त मनोहर रूप धारण किये उनके सामने उपस्थित हुई। सुन्दर रूपवाली वरूथिनीको देखकर ब्राह्मणकुमार स्वागतपूर्वक उसके पास गये और इस प्रकार बोले—'नूतन कमलके समान कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो ? किसकी कन्या हो ? और यहाँ क्या करती हो ? मैं ब्राह्मण हूँ और अरुणास्पद नगरसे यहाँ आया हूँ। मेरे पैरोंमें दिव्य लेप लगा हुआ था, जो बर्फके जलसे धुल गया है। इसीलिये मैं दूर-गमनकी शक्तिसे रहित होनेके कारण यहाँ आ गया हूँ।'
वरूथिनी बोली—ब्रह्मन् ! मैं अप्सरा हूँ। मेरा नाम वरूथिनी है। मैं इस रमणीय पर्वतपर ही सदा विचरण करती हूँ। आज आपके दर्शनसे कामदेवके वशीभूत हो गयी हूँ। बताइये, मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ। इस समय सर्वथा आपके अधीन हूँ।
हानि न हो, वही मुझे बतलाओ। भद्रे ! नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका छूटना ब्राह्मणके लिये बहुत बड़ी हानि है; अतः इससे बचनेके लिये तुम हिमालयसे मेरा उद्धार करो। ब्राह्मणोंका परदेशमें रहना कदापि उचित नहीं है। देश देखनेकी उत्कण्ठाने ही मुझसे यह अपराध कराया है। श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने घरमें मौजूद रहे, तभी उसके समस्त कर्मोंकी सिद्धि होती है और जो इस प्रकार प्रवास करता है, उसके नित्य-नैमित्तिक कर्मोंकी हानि ही होती है; अतः यशस्विनि! अब अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे मैं सूर्यास्तके पहले ही अपने घरपर पहुँच जाऊँ।
वरूथिनी बोली—महाभाग ! ऐसा न कहिये। ऐसा दिन कभी न आये, जब कि आप मुझे छोड़कर अपने घर चले जायें। ब्राह्मणकुमार ! यहाँसे अधिक रमणीय स्वर्ग भी नहीं है। इसलिये हमलोग स्वर्गलोक छोड़कर यहाँ रहा करते हैं। आपने मेरे मनको हर लिया है। मैं कामदेवके वशमें हूँ; आपको सुन्दर हार, वस्त्र, आभूषण, भक्ष्य-भोज्य तथा अङ्गराग आदि सभी भोग-सामग्री दूँगी। आप यहाँ रहिये। यहाँ रहनेसे आपके शरीरमें कभी बुढ़ापा नहीं आयेगा; क्योंकि यह देवताओंकी भूमि है। यह यौवनकी पुष्टि करनेवाली है।
यों कहकर वह कमलनयनी अप्सरा बावली-सी हो गयी और 'मुझपर कृपा कीजिये' ऐसा मधुर वाणीमें कहती हुई सहसा अनुरागपूर्वक उनका आलिङ्गन करने लगी।
तब ब्राह्मणने कहा—अरी ओ दुष्टे! मेरे शरीरका स्पर्श न कर। जो तेरे ही जैसा हो, वैसे किसी अन्य पुरुषके पास चली जा। मैं तो किसी और भावसे प्रार्थना करता हूँ और तू और ही भावसे मेरे पास आती है। गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियों ही मेरे आराध्य देव हैं। अग्निशाला ही मेरे लिये रमणीय स्थान है तथा कुशासनसे सुशोभित
ब्राह्मणने कहा—कल्याणी ! मैं जिस उपायसे अपने घरपर जा सकूँ और मेरे समस्त नित्यकर्मोंकी