भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148

१४८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


वेदों ही मेरी प्रिया है। वरूथिनी! यदि ब्राह्मण भोगके लिये चेष्टा करे तो उसको वह चेष्टा अच्छी नहीं मानी जाती। परन्तु यदि वह नित्य-नैमित्तिक कर्मोंके पालनके लिये चेष्टा करता है तो वह इहलोकमें क्लेशयुक्त जान पड़नेपर भी परलोकमें उत्तम फल देनेवाली होती है।

वरूथिनी बोली—ब्रह्मन्! मैं वेदनासे मर रही हूँ। मेरी रक्षा करनेसे आपको परलोकमें पुण्यका ही फल मिलेगा और दूसरे जन्ममें भी अनेकानेक भोग प्राप्त होंगे। इस प्रकार मेरा मनोरथ पूर्ण करनेसे लोक-परलोक दोनों ही सधते हैं, दोनों ही आपको लाभ पहुँचानेमें सहायक होते हैं। यदि आप मेरी प्रार्थना ठुकरा देंगे तो मेरी मृत्यु होगी और आपको भी पाप लगेगा।

ब्राह्मणने कहा—वरूथिनी! मेरे गुरुजनोंने उपदेश दिया है कि परायी स्त्रीकी अभिलाषा कदापि न करे; अतः मैं तुझे नहीं चाहता। भले ही तू बिलखाया करे अथवा सूखकर दुबली हो जाय।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—यों कहकर उन महाभाग ब्राह्मणने पवित्र हो जलका आचमन किया और गार्हपत्य-अग्निको प्रणाम करके मन-ही-मन कहा—‘भगवन् अग्निदेव! आप ही सब कर्मोंकी सिद्धिके कारण हैं। आपसे ही आहवनीय और दक्षिणाग्निका प्रादुर्भाव हुआ है। आपको तृप्त करनेसे देवता वृष्टि करते और अन्न आदिकी वृद्धिमें कारण बनते हैं। अन्नसे ही सम्पूर्ण जगत्‌का जीवन-निर्वाह होता है और किससे नहीं। इस प्रकार आपसे ही जगत्‌की रक्षा होती है। इस सत्यके प्रभावसे मैं सूर्यास्त होनेके पहले ही अपने घर पहुँच जाऊँ। यदि कभी ठीक समयपर मैंने वैदिक कर्मोंका परित्याग न किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे मैं आज घर पहुँचकर डूबनेसे पहले ही सूर्यको देखूँ। यदि कभी मेरे मनमें पराये धन तथा परायी स्त्रीकी अभिलाषा न हुई हो तो मेरा यह मनोरथ सिद्ध हो जाय।’

ब्राह्मणकुमारके ऐसा कहनेपर उनके शरीरमें गार्हपत्य-अग्निने प्रवेश किया; फिर तो वे ज्वालाओंके बीचमें प्रकट हुए मूर्तिमान् अग्निदेवकी भाँति उस प्रदेशको प्रकाशित करने लगे। उधर उन तेजस्वी ब्राह्मणके प्रति उनकी ओर देखती हुई देवाङ्गनाका अनुराग और भी बढ़ गया। अग्निदेवके प्रवेश करनेपर वे ब्राह्मणकुमार जैसे आये थे, उसी प्रकार तुरंत वहाँसे चल दिये और एक ही क्षणमें घर पहुँचकर उन्होंने शास्त्रोक्त विधिसे सब कर्मोंका अनुष्ठान पूरा किया। उनके चले जानेके बाद उस सर्वाङ्गसुन्दरी अप्सराने लंबी-लंबी साँसें लेकर शेष दिन और रात्रि व्यतीत की। उसका हृदय ब्राह्मणके प्रति पूर्णरूपसे आसक्त हो गया था। वह बारंबार आहें भरती, हाहाकार करती, रोती और अपनेको मन्दभागिनी मानकर धिक्कारती थी। उस समय उसका मन आहार, विहार, सुरम्य वन तथा रमणीय कन्दराओंमें भी सुख नहीं पाता था।

मुने! कलि नामका एक गन्धर्व था, जो पहलेसे ही वरूथिनीमें आसक्त हो रहा था; किन्तु उस अप्सराने उसको फटकार दिया था। उस दिन