संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १४१
उसने वरूथिनीको विरहिणीकी अवस्थामें देखा तो मन-ही-मन विचार किया—‘क्या कारण है, जो आज वरूथिनी इस पर्वतपर लंबी साँसें खींचती हुई म्लान-मुखसे विचर रही है?’ इसका रहस्य जाननेके लिये कलिने उत्कण्ठापूर्वक बहुत देरतक ध्यान किया और समाधिके प्रभावसे उसने सब बातोंको भलीभाँति जान लिया। इसके बाद सोचा, ‘अब समय बितानेकी आवश्यकता नहीं। यह वरूथिनी एक मनुष्यपर आसक्त हुई है। उसका रूप धारण कर लेनेपर यह निश्चय ही मेरे साथ रमण करेगी, अतः इसी उपायको कार्यमें लाऊँगा।’
ऐसा निश्चय करके गन्धर्वने अपने प्रभावसे ब्राह्मणका रूप धारण किया और जहाँ वरूथिनी बैठी थी, उधर ही विचरण करने लगा। उसे देखकर उस सुन्दरीके नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वह पास आकर बारंबार कहने लगी—‘ब्रह्मन्! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये। आपके त्याग देनेपर मैं अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। यदि ऐसा हुआ तो आपको अत्यन्त कष्टदायक पाप लगेगा और आपकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भी नष्ट हो जायेंगी। यदि आपने मुझे अपनाया तो मेरी जीवनरक्षासे होनेवाला धर्म आपको अवश्य प्राप्त होगा।’
कलि बोला—सुन्दरी! क्या करूँ, एक ओर तो मेरी धार्मिक क्रिया नष्ट हो रही है और दूसरी ओर तुम प्राण देनेकी बात कहती हो। इससे मैं संकटमें पड़ गया हूँ। अच्छा, इस समय मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करनेके लिये तुम तैयार रहो तो तुम्हारे साथ मेरा समागम हो सकता है, अन्यथा नहीं।
वरूथिनीने कहा—ब्रह्मन्! प्रसन्न होइये; आप जो कहेंगे, वही करूँगी। इस समय आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करना मेरा कर्तव्य है।
कलि बोला—सुन्दरी! सम्भोगके समय तुम आँखें बंद किये रहो, मेरी ओर दृष्टि न डालो तो मेरे साथ तुम्हारा संसर्ग हो सकता है।
वरूथिनीने कहा—ऐसा ही होगा। आपका कल्याण हो। आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही हो। मुझे इस समय सब प्रकारसे आपकी आज्ञाके अधीन रहना है।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर वह गन्धर्व वरूथिनीके साथ पुष्पित काननोंसे सुशोभित पर्वतके मनोरम शिखरोंपर, सुन्दर सरोवरोंमें, रमणीय कन्दराओंमें, नदियोंके किनारे तथा अन्य मनोरम प्रदेशोंमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगा। सम्भोगके समय वरूथिनी अपनी आँखें बंद कर लेती और ब्राह्मणके तेजस्वी स्वरूपका चिन्तन किया करती थी। तत्पश्चात् समयानुसार ब्राह्मणके स्वरूपका ध्यान करते-करते उस अप्सराने गन्धर्वके वीर्यसे गर्भ धारण किया। वरूथिनीको गर्भिणी जानकर ब्राह्मणरूपधारी गन्धर्वने उसे आश्वासन दिया और प्रेमपूर्वक उससे विदा ले वह अपने घर चला गया। गर्भकी अवधि पूर्ण होनेपर प्रज्वलित अग्निकी भाँति तेजस्वी बालकका जन्म हुआ, मानो सूर्य अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको