भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ
  • स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १४१

उसने वरूथिनीको विरहिणीकी अवस्थामें देखा तो मन-ही-मन विचार किया—‘क्या कारण है, जो आज वरूथिनी इस पर्वतपर लंबी साँसें खींचती हुई म्लान-मुखसे विचर रही है?’ इसका रहस्य जाननेके लिये कलिने उत्कण्ठापूर्वक बहुत देरतक ध्यान किया और समाधिके प्रभावसे उसने सब बातोंको भलीभाँति जान लिया। इसके बाद सोचा, ‘अब समय बितानेकी आवश्यकता नहीं। यह वरूथिनी एक मनुष्यपर आसक्त हुई है। उसका रूप धारण कर लेनेपर यह निश्चय ही मेरे साथ रमण करेगी, अतः इसी उपायको कार्यमें लाऊँगा।’

ऐसा निश्चय करके गन्धर्वने अपने प्रभावसे ब्राह्मणका रूप धारण किया और जहाँ वरूथिनी बैठी थी, उधर ही विचरण करने लगा। उसे देखकर उस सुन्दरीके नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वह पास आकर बारंबार कहने लगी—‘ब्रह्मन्! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये। आपके त्याग देनेपर मैं अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। यदि ऐसा हुआ तो आपको अत्यन्त कष्टदायक पाप लगेगा और आपकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भी नष्ट हो जायेंगी। यदि आपने मुझे अपनाया तो मेरी जीवनरक्षासे होनेवाला धर्म आपको अवश्य प्राप्त होगा।’

कलि बोला—सुन्दरी! क्या करूँ, एक ओर तो मेरी धार्मिक क्रिया नष्ट हो रही है और दूसरी ओर तुम प्राण देनेकी बात कहती हो। इससे मैं संकटमें पड़ गया हूँ। अच्छा, इस समय मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करनेके लिये तुम तैयार रहो तो तुम्हारे साथ मेरा समागम हो सकता है, अन्यथा नहीं।

वरूथिनीने कहा—ब्रह्मन्! प्रसन्न होइये; आप जो कहेंगे, वही करूँगी। इस समय आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करना मेरा कर्तव्य है।

कलि बोला—सुन्दरी! सम्भोगके समय तुम आँखें बंद किये रहो, मेरी ओर दृष्टि न डालो तो मेरे साथ तुम्हारा संसर्ग हो सकता है।

वरूथिनीने कहा—ऐसा ही होगा। आपका कल्याण हो। आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही हो। मुझे इस समय सब प्रकारसे आपकी आज्ञाके अधीन रहना है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर वह गन्धर्व वरूथिनीके साथ पुष्पित काननोंसे सुशोभित पर्वतके मनोरम शिखरोंपर, सुन्दर सरोवरोंमें, रमणीय कन्दराओंमें, नदियोंके किनारे तथा अन्य मनोरम प्रदेशोंमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगा। सम्भोगके समय वरूथिनी अपनी आँखें बंद कर लेती और ब्राह्मणके तेजस्वी स्वरूपका चिन्तन किया करती थी। तत्पश्चात् समयानुसार ब्राह्मणके स्वरूपका ध्यान करते-करते उस अप्सराने गन्धर्वके वीर्यसे गर्भ धारण किया। वरूथिनीको गर्भिणी जानकर ब्राह्मणरूपधारी गन्धर्वने उसे आश्वासन दिया और प्रेमपूर्वक उससे विदा ले वह अपने घर चला गया। गर्भकी अवधि पूर्ण होनेपर प्रज्वलित अग्निकी भाँति तेजस्वी बालकका जन्म हुआ, मानो सूर्य अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको

१५० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


प्रकाशित कर रहा हो। वह बालक भगवान् भास्करकी भाँति स्वरोचिष् (अपनी किरणों)-से सुशोभित हो रहा था; इसलिये वह स्वरोचिष् नामसे ही विख्यात हुआ। वह महान् भाग्यशाली शिशु अपनी अवस्था और सद्गुणोंके साथ-ही-साथ प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे चन्द्रमा अपनी कलाओंके साथ शुक्ल पक्षमें दिनोंदिन बढ़ता रहता है। महाभाग स्वरोचिष्ने क्रमशः वेद, धनुर्वेद तथा अन्यान्य विद्याओंको ग्रहण किया। धीरे-धीरे उसकी तरुण अवस्था आ गयी। एक दिन वह मन्दराचल पर्वतपर विचर रहा था। इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सुन्दरी कन्यापर पड़ी, जो भयसे व्याकुल हो रही थी। कन्याने भी उसे देखा और घबराकर कहा—'मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।' उसके नेत्र भयसे कातर हो रहे थे। स्वरोचिष्ने आश्वासन देते हुए कहा—'डरो मत; बताओ, क्या बात है?' स्वरोचित वाणीमें उसके इस प्रकार पूछनेपर उस कन्याने बारंबार लंबी साँसें खींचते हुए अपना सारा हाल कह सुनाया।

कन्या बोली—वीरवर! मैं इन्दीवराक्ष नामक विद्याधरकी पुत्री हूँ। मेरा नाम मनोरमा है। मरुधन्वाकी पुत्री मेरी माता हैं। मन्दार विद्याधरकी कन्या विभावरी मेरी एक सखी है और पार मुनिकी पुत्री कलावती मेरी दूसरी सखी है। एक दिन मैं उन दोनोंके साथ परम उत्तम कैलास पर्वतके तटपर गयी। वहाँ मुझे एक मुनि दिखायी दिये, जिनका शरीर तपस्याके कारण अत्यन्त दुर्बल हो रहा था। भूखसे उनका कण्ठ सूख गया था। शरीरमें कान्तिका अभाव था और आँखोंकी पुतली भीतर धँसी हुई थी। यह देखकर मैंने उनका उपहास किया। इससे कुपित होकर उन्होंने मुझे शाप देते हुए कहा—'ओ नीच! अरी दुष्ट तपस्विनी! तूने मेरी हँसी उड़ायी है, इसलिये शीघ्र ही एक राक्षस तुझपर आक्रमण करेगा।' इस प्रकार शाप देनेपर मेरी सखियोंने मुनिको बहुत फटकारा और कहा—'तुम्हारी ब्राह्मणताको धिक्कार है। तुममें क्षमा न होनेके कारण तुम्हारी की हुई सारी तपस्या व्यर्थ है। जान पड़ता है, तुम क्रोधसे ही अत्यन्त दुर्बल हो रहे हो, तपस्यासे नहीं। ब्राह्मणका स्वभाव तो क्षमाशील होता है। क्रोधको काबूमें रखना ही तपस्या है।'

सखियोंकी ये बातें सुनकर उन अमिततेजस्वी साधुने उन दोनोंको भी शाप दे दिया—'एकके सब अङ्गोंमें कोढ़ हो जायगी और दूसरी क्षयरोगसे ग्रस्त होगी।' मुनिकी बात सच हुई, मेरी सखियोंको तत्काल वैसा ही रोग हो गया। इसी प्रकार मेरे पीछे-पीछे एक महान् राक्षस दौड़ा चला आ रहा है। वह पास ही तो गरज रहा है, क्या आपको उसकी भयंकर आवाज नहीं सुनायी देती। आज तीसरा दिन बीत रहा है, किन्तु वह मेरा पीछा नहीं छोड़ता। महामते! मैं सम्पूर्ण अस्त्र शस्त्रोंका हृदय (रहस्य) जानती हूँ और वह सब आपको

  • स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १८५

दिये देती हूँ। आप इस राक्षससे मेरी रक्षा कीजिये। पिनाकधारी भगवान् रुद्रने पहले यह रहस्य स्वायम्भुव मनुको दिया था। मनुने वसिष्ठजीको, वसिष्ठजीने मेरे नानाको और नानाने दहेजके रूपमें मेरे पिताको दिया था। मैंने बाल्यावस्थामें अपने पितासे ही इसकी शिक्षा पायी थी। यह सम्पूर्ण अस्त्रोंका हृदय है, जो समस्त शत्रुओंका संहार करनेवाला है। आप इसे शीघ्र ही ग्रहण करें और ब्राह्मणके शापसे प्रेरित होकर आये हुए इस दुरात्माको मार डालें।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— स्वरोचिष्ने 'बहुत अच्छा' कहकर मनोरमाकी प्रार्थना स्वीकार की। फिर मनोरमाने आचमन करके रहस्य एवं उपसंहार-विधिके सहित वह सम्पूर्ण अस्त्रोंका हृदय उन्हें दे दिया। इसी बीचमें भयानक आकारवाला वह राक्षस जोर-जोरसे गर्जना करता हुआ शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँचा। आते ही उसने मनोरमाको पकड़ लिया। वह बेचारी 'बचाओ, बचाओ' कहती हुई करुणाभरी वाणीमें विलाप करने लगी। तब स्वरोचिष्को बड़ा क्रोध हुआ और उसने अत्यन्त भयंकर प्रचण्ड अस्त्र हाथमें ले उसे धनुषपर चढ़ाकर एकटक नेत्रोंसे राक्षसकी ओर देखा। यह देख वह निशाचर भयसे व्याकुल हो उठा और मनोरमाको छोड़कर विनीत भावसे बोला—'वीरवर! मुझपर प्रसन्न होइये, इस अस्त्रको शान्त कीजिये और मेरी बात सुनिये। आज आपने परम बुद्धिमान् ब्रह्ममित्रके दिये हुए अत्यन्त भयंकर शापसे मेरा उद्धार कर दिया। महाभाग! आपसे बढ़कर दूसरा कोई मेरा उपकारी नहीं है।'

**स्वरोचिष्ने पूछा—**महात्मा ब्रह्ममित्र मुनिने तुम्हें किस कारणसे और कैसा शाप दिया था?

**राक्षस बोला—**ब्रह्ममित्र मुनि आठों अङ्गोंसे युक्त आयुर्वेदके ज्ञाता हैं। उन्होंने अथर्ववेदके तेरहवें अधिकारतकका ज्ञान प्राप्त किया है। मैं इस मनोरमाका पिता और खड्गधारी विद्याधरराज नलनाभका पुत्र इन्दीवराक्ष हूँ। पूर्वकालमें एक दिन मैंने ब्रह्ममित्र मुनिके पास जाकर प्रार्थना की—'भगवन्! मुझे सम्पूर्ण आयुर्वेद शास्त्रका ज्ञान प्रदान कीजिये।' अनेकों बार विनीत भावसे प्रार्थना करनेपर भी जब उन्होंने मुझे आयुर्वेदकी शिक्षा नहीं दी, तब मैंने दूसरे उपायका अवलम्बन किया। जिस समय वे दूसरे विद्यार्थियोंको आयुर्वेद पढ़ाते, उस समय मैं भी अदृश्य रहकर वह विद्या सीखा करता। जब शिक्षा पूरी हो गयी, तब मुझे बड़ा हर्ष हुआ और मैं बार-बार हँसने लगा। हँसनेकी आवाज सुनकर मुनि मुझे पहचान गये और क्रोधसे गर्दन हिलाते हुए कठोर वचनोंमें बोले—'खोटी बुद्धिवाले विद्याधर! तूने राक्षसकी भाँति अदृश्य होकर मुझसे विद्याका अपहरण किया है और मेरी अवहेलना करके हँसी उड़ायी है, इसलिये मेरे शापसे तू राक्षस हो जा।' उनके

१५२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


यों कहनेपर मैंने प्रणाम आदिके द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। तब वे कोमल हृदयवाले ब्राह्मण मुझसे इस प्रकार बोले—'विद्याधर! मैंने जो बात कही है, वह अवश्य होगी, टल नहीं सकती। किन्तु तुम राक्षस होकर पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त कर लोगे। निशान्तरावस्थामें स्मरण शक्तिके नष्ट हो जानेपर क्रोधके वशीभूत हो जब तुम अपनी ही संतानको खा डालनेकी इच्छा करोगे, उस समय प्रचण्ड अस्त्रके तेजसे संतप्त होनेपर तुम्हें फिरसे चेत हो जायगा और पूर्ववत् अपने शरीरको धारण करके गन्धर्वलोकमें निवास करोगे।' महाभाग! मैं वही हूँ, आपने महान् भयदायी राक्षस-देहसे मेरा उद्धार किया है, अतः मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये। मैं अपनी पुत्री मनोरमाको आपकी सेवामें दे रहा हूँ। इसे पत्नीरूपमें ग्रहण करें। महामते! ब्रह्मर्षिपुत्र मुनिसे सम्पूर्ण अष्टाङ्ग आयुर्वेदका जो मैंने अध्ययन किया है, वह सब आपको देता हूँ, स्वीकार करें।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— यों कहकर विद्याधरने अपने पूर्व रूपको धारण कर लिया। दिव्य वस्त्र, दिव्य माला और दिव्य आभूषण उसकी शोभा बढ़ाने लगे। फिर उसने स्वरोचिष्को आयुर्वेद-विद्या प्रदान की और उसकी सेवामें अपनी कन्या सौंप दी। तदनन्तर स्वरोचिष्ने पिताद्वारा दी हुई मनोरमाके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। इसके बाद इन्दीवराक्ष पुत्रोंको सान्त्वना दे दिव्य गतिसे अपने लोकको चला गया। फिर स्वरोचिष् अपनी सुन्दरी पत्नीके साथ उस उद्यानमें गया, जहाँ उसकी दोनों सखियाँ मुनिके शापवश रोगसे व्याकुल थीं। अब वह आयुर्वेदके तत्त्वोंका ज्ञाता हो चुका था; अतः रोगनाशक औषधों और रसोंका प्रयोग करके उसने उन दोनोंको रोगमुक्त कर दिया। व्याधिसे छुटकारा पानेपर वे दोनों सुन्दरी कन्याएँ अपने शरीरकी दिव्य कान्तिसे हिमालय पर्वतके उस रम्य प्रदेशको प्रकाशित करने लगीं।

इस प्रकार रोग-मुक्त हुई कन्याओंमेंसे एकने स्वरोचिष्से प्रसन्नतापूर्वक कहा—'प्रभो! मेरी बात सुनिये। मैं मन्दार विद्याधरकी पुत्री हूँ। मेरा नाम विभावरी है। उपकारी पुरुष! मैं अपनेको आपकी सेवामें दे रही हूँ, स्वीकार कीजिये। साथ ही आपको एक ऐसी विद्या दूँगी, जिससे सब जीवोंकी बोली आपकी समझमें आने लगेगी; अतः आप मुझपर कृपा करें।' धर्मज्ञ स्वरोचिष्ने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब दूसरी कन्या इस प्रकार बोली—'आर्य! वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् ब्रह्मर्षि पार मेरे पिता हैं। कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन करनेके कारण उन्होंने विवाह नहीं किया था। एक बार पुञ्जिकस्थला नामक अप्सरासे उनका सम्पर्क हो गया। इससे मेरा जन्म हुआ। मेरी माता इस निर्जन वनमें मुझे धरतीपर सुला अकेली

स्वरोचिष् तथा स्वरोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन • १५३

छोड़कर चली गयी। फिर एक महात्मा गन्धर्वने मुझे ले लिया और स्नेहपूर्वक लालन-पालन किया। एक बार देव-शत्रु अलिने मेरे पालक पितासे मुझे माँगा, किन्तु उन्होंने देनेसे इन्कार कर दिया। तब उस राक्षसने सोये हुए मेरे पिताको मार डाला। इस दुर्घटनासे मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं आत्महत्या करनेको तैयार हो गयी। उस समय भगवान् शङ्करकी धर्मपत्नी सत्यवादिनी सतीदेवीने मुझे ऐसा करनेसे रोका और कहा—'सुन्दरी ! तू शोक मत कर। महाभाग स्वरोचिष् तेरे पति होंगे। उनका पुत्र मनु होगा। सब प्रकारकी निधियाँ आदरपूर्वक तेरी आज्ञाका पालन करेंगी और तुझे इच्छानुसार धन देंगी। वत्से ! जिस विद्याके प्रभावसे तुझे वे निधियाँ प्राप्त होंगी, उसे तू मुझसे ग्रहण कर। यह महापद्मपूजित पद्मिनी नामकी विद्या है।' सत्यपरायणा दक्षकन्या सतीने मुझसे ऐसा ही कहा था। निश्चय ही आप स्वरोचिष् हैं। आज मैं अपने प्राणदाताको वह विद्या और यह शरीर अर्पण करती हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे स्वीकार करें।'

कलावतीकी यह प्रार्थना सुनकर स्वरोचिष्ने 'एवमस्तु' कहा। विभावरी और कलावतीकी स्नेहपूर्ण दृष्टिसे विवाहका अनुमोदन पाकर उन्होंने उन दोनोंका पाणिग्रहण किया। फिर अपनी तीनों पत्नियोंके साथ वे रमणीय वनों तथा झरनोंसे सुशोभित गिरिराजके शिखरपर विहार करने लगे। स्वरोचिष्ने छः सौ वर्षोंतक उन स्त्रियोंके साथ रमण किया। वे धर्मका विरोध न करते हुए सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान करते और विषयोंको भी भोगते थे। तदनन्तर स्वरोचिष्के विजय, मेरुमन्द तथा महाबली प्रभाव—ये तीन पुत्र हुए। इन्दीवरकी पुत्री मनोरमाने विजयको जन्म दिया था, विभावरीके गर्भसे मेरुमन्द और कलावतीके गर्भसे प्रभाव उत्पन्न हुए थे। सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति करानेवाली जो पद्मिनी नामकी विद्या थी, उसके प्रभावसे स्वरोचिष्ने अपने तीनों पुत्रोंके लिये तीन नगर बनवाये। पूर्व दिशामें कामरूप नामक पर्वतके ऊपर विजय नामका नगर बसाया और उसे अपने पुत्र विजयके अधिकारमें दे दिया। उत्तर दिशामें मेरुमन्दके लिये नन्दवती नामकी पुरी बनवायी, जिसकी चहारदीवारी बहुत ऊँची थी। कलावतीके पुत्र प्रभावके लिये दक्षिण देशमें उन्होंने ताल नामक नगर बसाया। इस प्रकार तीन नगरोंमें तीनों पुत्रोंको रखकर पुरुषश्रेष्ठ स्वरोचिष् अपनी पत्नियोंके साथ अत्यन्त मनोहर प्रदेशोंमें विहार करने लगे। एक दिन वे हाथमें धनुष लिये वनमें घूम रहे थे। उस समय उन्हें बहुत दूरपर एक सूअर दिखायी दिया। उसे देखकर उन्होंने धनुष खींचा, इतनेमें ही एक हरिणी उनके पास आकर बोली—'वीरवर ! आप कृपा करके मुझपर ही बाण मारिये। इस सूअरको मारनेसे क्या लाभ। मुझको ही तुरंत मार गिराइये।

[ 539 ] सं० मा० पु०—६

१५४

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

आपका चलाया हुआ बाण मुझे समस्त दुःखोंसे मुक्त कर देगा।'

**स्वरोचिष्ने कहा—**मुझे तेरे शरीरमें कोई रोग नहीं दिखायी देता; फिर क्या कारण है कि तू अपने प्राणोंको त्याग देना चाहती है?

**मृगी बोली—**जिस पुरुषमें मेरा चित्त लगा हुआ है, उसका मन दूसरी स्त्रियोंमें आसक्त है, अतः उसके बिना मेरी मृत्यु निश्चित है। ऐसी दशामें बाणोंकी चोट सहनेके सिवा मेरे लिये यहाँ दूसरी कौन-सी दवा है।

**स्वरोचिष्ने कहा—**भीरु! वह कौन-सा पुरुष है, जो तुझे नहीं चाहता? अथवा किसके प्रति तेरा अनुराग है, जिसे न पानेके कारण तू अपने प्राण त्याग देनेको तैयार हो गयी है?

**मृगी बोली—**आर्य! आपका कल्याण हो। मैं आपको ही प्राप्त करना चाहती हूँ। आपने ही मेरा चित्त चुराया है। इसीलिये मैं स्वेच्छासे मृत्युका वरण करती हूँ। आप मुझको बाण मारिये।

**स्वरोचिष्ने कहा—**देवि! तू चञ्चल कटाक्षवाली मृगी है और मैं मनुष्यरूपधारी जीव हूँ; फिर मेरे-जैसे पुरुषका तेरे साथ किस प्रकार संयोग होगा?

**मृगी बोली—**यदि मुझमें आपका चित्त अनुरक्त हो तो मेरा आलिङ्गन कीजिये। यदि आपका हृदय शुद्ध होगा तो मैं आपकी इच्छाके अनुसार कार्य करूँगी और इतनेसे ही मैं यह समझूँगी कि आपने मेरा बड़ा आदर किया।

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**तब स्वरोचिष्ने उस हरिणीका आलिङ्गन किया। फिर तो वह तत्काल दिव्यरूपधारिणी देवीके रूपमें प्रकट हो गयी। यह देख स्वरोचिष्को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'तुम कौन हो?' वह प्रेम और लज्जासे कुण्ठित वाणीमें बोली—'महामते! मैं इस वनकी देवी हूँ। देवताओंके प्रार्थना करनेपर मैं आपकी सेवामें आयी हूँ, आप मेरे गर्भसे मनुको उत्पन्न कीजिये।'

वनदेवीके यों कहनेपर स्वरोचिष्ने उसके गर्भसे तत्काल ही अपने-जैसा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किया, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित था। उसके जन्म लेते ही देवताओंके यहाँ बाजे बजने लगे। गन्धर्वराज गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। नाग और तपस्वी ऋषि जलके छींटोंसे उस बालकका अभिषेक करने लगे। देवताओंने उसके ऊपर चारों ओरसे फूलोंकी वृष्टि की। उसके तेजको देखकर पिताने उसका नाम द्युतिमान् रखा, क्योंकि उसकी द्युतिसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं! वह महान् बलवान् और अत्यन्त पराक्रमी था। स्वरोचिषका पुत्र होनेके कारण स्वारोचिषके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई। तदनन्तर स्वरोचिष् अपनी स्त्रियोंको साथ ले तपस्या करनेके लिये दूसरे तपोवनमें चले गये।

  • पद्मिनी विद्याके अधीन रहनेवाली आठ निधियोंका वर्णन - | १५५

वहाँ उनके साथ घोर तपस्या करके समस्त पापोंसे रहित हो वे निर्मल लोकोंको प्राप्त हुए। तत्पश्चात् भगवान् प्रजापतिने स्वरोचिषके पुत्र द्युतिमान्‌को मनुके पदपर प्रतिष्ठित किया। अब उनके मन्वन्तरका वर्णन सुनो—स्वरोचिष मन्वन्तरमें पारावत और तुषित नामके देवता तथा विपश्चित् नामक इन्द्र हुए। ऊर्ज, स्तम्ब, प्राण, दत्तोत्ति, ऋषभ, निश्चर तथा अर्ववीर—ये ही उस समयके सप्तर्षि थे। महात्मा स्वरोचिषके चैत्र और किम्पुरुष आदि सात पुत्र हुए, जो महान् पराक्रमी और पृथ्वीके पालक थे। जबतक स्वरोचिष मन्वन्तर था, तबतक उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए राजाओंने सारी पृथ्वीका राज्य भोगा। उनका मन्वन्तर द्वितीय कहलाता है। स्वरोचिष् और स्वरोचिषके जन्म और चरित्रका श्रवण करके श्रद्धालु मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।


पद्मिनी विद्याके अधीन रहनेवाली आठ निधियोंका वर्णन

**क्रौष्टुकिने कहा—**भगवन्! आपने स्वरोचिष् तथा स्वरोचिषके जन्म एवं चरित्रका सब वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया। अब सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति करानेवाली पद्मिनी विद्याके अधीन जो-जो निधियाँ हैं, उनका विस्तारके साथ वर्णन कीजिये।

**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्मन्! पद्मिनी नामकी जो विद्या है, उसकी अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी हैं। वे सम्पूर्ण निधियोंकी आधार हैं। पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, नन्दक, नील तथा शङ्ख—ये आठ निधियाँ हैं। देवताओंकी कृपा तथा साधु-महात्माओंकी सेवासे प्रसन्न होकर जब ये निधियाँ कृपा-दृष्टि करती हैं तो मनुष्यको सदा धन प्राप्त होता है। अब इनके स्वरूपका वर्णन सुनो। पद्म नामक जो प्रथम निधि है, वह सत्त्वगुणका आधार है। उसके प्रभावसे मनुष्य सोने, चाँदी और ताँबे आदि धातुओंका अधिक मात्रामें संग्रह एवं क्रय-विक्रय करता है। इतना ही नहीं, वह यज्ञोंका अनुष्ठान करता, दक्षिणा देता तथा सभामण्डप एवं देवमन्दिर बनवाता है। महापद्म नामकी जो दूसरी निधि है, वह भी सात्त्विक है। उसके आश्रित हुए मनुष्यमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है। वह पद्मराग आदि मणि, मोती और मूँगा आदिका संग्रह एवं क्रय-विक्रय करता है। योगी पुरुषोंको दान देता और उनके लिये आश्रम बनवाता है तथा स्वयं भी उन्हींके स्वभावका हो जाता है। उसके पुत्र-पौत्र आदि भी उसी स्वभावके होते हैं। महापद्मनिधि मनुष्यकी सात पीढ़ियोंतक उसका त्याग नहीं करती। मकर नामकी तीसरी निधि तमोगुणी होती है। उसकी दृष्टि पड़नेपर सुशील मनुष्य भी प्रायः तमोगुणी बन जाता है। वह बाण, खड्ग, ऋष्टि, धनुष, ढाल तथा दंशन करनेवाली वस्तुओंका संग्रह करता, राजाओंके साथ मैत्री जोड़ता, शौर्यसे जीविका चलानेवाले क्षत्रियों तथा उनके प्रेषियोंको धन देता है। अस्त्र-शस्त्रोंके सिवा और किसी वस्तुके क्रय-विक्रयमें उसका मन नहीं लगता। यह निधि एक ही मनुष्यतक सीमित रहती है। उसके पुत्रोंका साथ नहीं देती। वह मनुष्य धनके कारण लुटेरोंके हाथसे अथवा संग्राममें मारा जाता है। कच्छप नामकी जो निधि है, उसकी दृष्टि पड़नेपर भी मनुष्यमें तमोगुणकी प्रधानता होती है। क्योंकि वह भी तामसी निधि है। वह मनुष्य सब व्यवहार पुण्यात्माओंके साथ

२५६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


ही करता है। किन्तु किसीपर विश्वास नहीं करता। जैसे कछुआ अपने सब अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार वह सब ओरसे रत्नोंका संग्रह करके उनकी रक्षाके लिये व्याकुल रहता है। धनके नष्ट हो जानेके भयसे न तो वह दान करता है और न उसे अपने उपभोगमें ही लाता है। अपितु उसे पृथ्वीमें गाड़कर रखता है। वह निधि भी एक ही पीढ़ींतक रहती है।

मुकुन्द नामकी जो पाँचवीं निधि है, वह रजोगुणमयी है। उसकी दृष्टि पड़नेपर मनुष्य रजोगुणी होता है और वीणा, वेणु एवं मृदङ्ग आदि वाद्योंका संग्रह करता है। वह गाने और नाचनेवालोंको ही धन देता तथा सूत, बन्दी, धूर्त एवं नट आदिको प्रतिदिन भोगकी वस्तुएँ अर्पित करता है। यह निधि भी एक ही मनुष्यतक रह जाती है। इससे भिन्न जो नन्द नामकी महानिधि है, वह रजोगुण और तमोगुण दोनोंसे संयुक्त है। उसकी दृष्टि पड़नेपर मनुष्य अधिक जड़ताको प्राप्त होता है। वह समस्त धातुओं, रत्नों और पवित्र धान्य आदिका संग्रह तथा क्रय-विक्रय करता है। महामुने ! वह मनुष्य स्वजनों तथा घरपर आये हुए अतिथियोंका आधार होता है, परन्तु अपमानकी थोड़ी-सी भी बात नहीं सहन करता। जब कोई उसकी स्तुति करता है, तब वह बहुत प्रसन्न होता है। स्तुति करनेवाला याचक जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे देता है। उसका स्वभाव कोमल बन जाता है। उसके बहुत-सी स्त्रियाँ होती हैं, जो संतानवती और अत्यन्त सुन्दरी होती हैं। नन्दनामक निधि आठ भागसे बढ़ते-बढ़ते सात पीढ़ींतक मनुष्यका साथ देती है। वह सब पुरुषोंको दीर्घायु बनाती और दूरसे आये हुए बन्धु-बान्धवोंका भरण-पोषण करती है। परलोकके प्रति उसके हृदयमें आदर नहीं होता। इस निधिको पाया हुआ पुरुष सहवासियोंपर स्नेह नहीं रखता। पहलेके मित्रोंसे उदासीन हो जाता और दूसरोंसे प्रेम करता है। इसी प्रकार जो महानिधि सत्त्वगुण और रजोगुण दोनोंको साथ-साथ धारण करती है, उसका नाम नील है। उसके सम्पर्कमें आनेवाला पुरुष भी सत्त्वगुण एवं रजोगुणसे युक्त होता है। वह वस्त्र, कपास, धान्य, फल, फूल, मोती, मूँगा, शङ्ख, सीपी, काष्ठ तथा जलसे पैदा होनेवाली अन्यान्य वस्तुओंका संग्रह एवं क्रय-विक्रय करता है। वह मनुष्य तालाब और बावली बनवाता, बगीचे लगाता, नदियोंपर पुल बँधवाता तथा अच्छे-अच्छे वृक्षोंको रोपता है। चन्दन और फूल आदि भोगोंका उपभोग करके ख्याति लाभ करता है। यह नीलनिधि तीन पीढ़ियोंतक चलती है। शङ्ख नामकी जो आठवीं निधि है, वह रजोगुण और तमोगुणसे युक्त होती है तथा अपने स्वामीको भी ऐसे ही गुणोंसे युक्त बना देती है। ब्रह्मन् ! यह निधि एक ही पुरुषतक सीमित रहती है, दूसरेको नहीं मिलती। क्रौष्टुके ! जिसके पास शङ्ख नामक निधि होती है, उसके स्वरूपका वर्णन सुनो। वह अपने कमाये हुए अन्न और वस्त्रका अकेला ही उपभोग करता है। उसके कुटुम्बी लोग खराब अन्न खाते हैं। उन्हें पहननेको अच्छे वस्त्र नहीं मिलते। शङ्खनिधिसे युक्त मनुष्य सदा अपना ही पेट पालनेमें लगा रहता है। मित्र, भार्या, भ्राता, पुत्र तथा वधू आदिको कुछ भी नहीं देता। इस प्रकार ये निधियाँ मनुष्योंके अर्थकी अधिष्ठात्री देवी कहलाती हैं। जिस निधिका जैसा स्वभाव बतलाया गया है, उसकी दृष्टि पड़नेपर मनुष्य वैसे ही स्वभावका हो जाता है। पद्मिनी नामकी विद्या इन सब निधियोंकी स्वामिनी है। यह साक्षात् लक्ष्मीजीका स्वरूप है।

  • राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन * १५७

राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन

क्रौष्टुकि बोले—ब्रह्मन्! आपने स्वारोचिष मन्वन्तरका वृत्तान्त मुझे विस्तारके साथ सुनाया, साथ ही मेरे प्रश्नके अनुसार आठ निधियोंका भी वर्णन किया। स्वायम्भुव मन्वन्तरका वर्णन तो पहले ही हो चुका है। अब उत्तम नामक तीसरे मन्वन्तरकी कथा सुनाइये।

मार्कण्डेयजीने कहा—राजा उत्तानपादके सुरुचिके गर्भसे एक उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था, जो महान् बलवान् और पराक्रमी था। शत्रु और मित्रमें तथा पुत्र और पराये मनुष्यमें उसका समान भाव था। वह धर्मका ज्ञाता था और दुष्टोंके लिये यमराजके समान भयङ्कर एवं साधु पुरुषोंके लिये चन्द्रमाके समान आनन्ददायी था। राजकुमार उत्तमने बभ्रुकुमारी बहुलाके साथ विवाह किया था। वे सदा उसीमें आसक्त रहते थे। उनका मन और किसी काममें नहीं लगता था, स्वप्नमें भी उनका चित्त बहुलामें ही लगा रहता था। वे सदा रानीकी इच्छाके अनुसार ही चलते थे तो भी वह कभी उनके अनुकूल नहीं होती थी। एक समय दूसरे-दूसरे राजाओंके समक्ष ही रानीने राजाकी आज्ञा माननेसे इन्कार कर दिया। इससे उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे कुपित सर्पकी भाँति फुफकारते हुए द्वारपालसे बोले—'दरबान ! तू इस दुष्टहृदया स्त्रीको निर्जन वनमें ले जाकर छोड़ दे। यह मेरी आज्ञा है, अतः तुझे इसपर कुछ सोच-विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।'

तब राजाकी आज्ञाको अविचारणीय मानकर द्वारपाल रानीको रथपर बिठा वनमें छोड़ आया। राजाके द्वारा इस प्रकार निर्जन वनमें त्यागी जानेपर बहुलाने उनकी दृष्टिसे दूर होनेके कारण अपने ऊपर राजाका बहुत बड़ा अनुग्रह माना। उधर राजा अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते हुए समय व्यतीत करने लगे। एक दिनकी बात है, कोई ब्राह्मण उनके दरबारमें आया और अत्यन्त दुःखितचित्त होकर इस प्रकार कहने लगा।

ब्राह्मण बोला—महाराज! मैं बहुत दुःखी हूँ, मेरी बात सुनिये; क्योंकि राजाके सिवा और किसीसे मनुष्योंकी संकटसे रक्षा नहीं हो सकती। रातको सोते समय मेरे घरका दरवाजा खोले बिना ही कोई मेरी स्त्रीको चुरा ले गया है। आप उसे पता लगाकर ला देनेकी कृपा करें। राजन्! हमारी आय और धर्मका छठा भाग आप वेतनके रूपमें ग्रहण करते हैं, इसलिये आप ही हमलोगोंके रक्षक हैं। आपसे रक्षित होनेके कारण ही मनुष्य रात्रिमें निश्चिन्त होकर सोते हैं।

राजाने पूछा—ब्रह्मन्! आपकी स्त्री शरीरसे कैसी है, यह मैंने कभी नहीं देखा है। उसकी अवस्था क्या है, यह भी आपको ही बतलाना

१५८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


होगा। साथ ही यह भी सूचित कीजिये कि आपकी ब्राह्मणीका स्वभाव कैसा है ?

**ब्राह्मण बोला—**राजन्! मेरी स्त्रीकी दृष्टिसे क्रूरता टपकती है। उसकी कद तो बहुत ऊँची है, किन्तु बाँहें छोटी, मुँह दुबला-पतला और शरीर कुरूप है। यह मैं उसकी निन्दा नहीं करता, ठीक ठीक हुलिया बतलाता हूँ। उसकी बातें बड़ी कड़वी होती हैं तथा स्वभावसे भी वह कोमल नहीं है। उसकी पहली अवस्था कुछ कुछ बीत चुकी है।

**राजाने कहा—**ब्राह्मण! ऐसी स्त्री लेकर क्या करोगे। मैं तुम्हें दूसरी भार्या देता हूँ। अच्छे स्वभावकी स्त्री ही कल्याणमयी एवं सुख देनेवाली होती है। वैसी स्त्री तो केवल दुःखका ही कारण है। रूप और शील दोनोंसे हीन होनेके कारण वह स्त्री त्याग देनेयोग्य है।

**ब्राह्मण बोला—**राजन्! अपनी पत्नीकी रक्षा करनी चाहिये—यह श्रुतिका उत्तम आदेश है। उसकी रक्षा न करनेपर उससे वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। वर्णसंकर अपने पितरोंको स्वर्गसे नीचे गिरा देता है। पत्नी न होनेके कारण मेरे नित्यकर्म छूट रहे हैं। इससे प्रतिदिन धर्ममें बाधा आती है, जिसके कारण मेरा पतन अवश्यम्भावी है। उसके गर्भसे जो मेरी संतति होगी, वह धर्मका पालन करनेवाली होगी। प्रभो! इस प्रकार मैंने अपनी स्त्रीका वृत्तान्त आपके सामने निवेदन किया है। आप उसे लाइये, क्योंकि आप ही प्रजाकी रक्षाके अधिकारी हैं।

ब्राह्मणकी ऐसी बात सुनकर और उसपर भलीभाँति विचार करके राजा उत्तम सब सामग्रियोंसे युक्त अपने विशाल रथपर आरूढ़ हुए और पृथ्वीपर इधर उधर घूमने लगे। एक दिन एक बहुत बड़े वनमें किसी तपस्वीका उत्तम आश्रम दिखायी दिया। तब रथसे उतरकर वे उस आश्रममें गये। वहाँ उन्हें एक मुनिका दर्शन हुआ, जो कुशासनपर विराजमान थे और अपने तेजसे अग्निकी भाँति प्रज्वलित हो रहे थे। राजाको आया देख मुनि शीघ्रतापूर्वक उठकर खड़े हो गये और स्वागतपूर्वक उनका सम्मान करते हुए शिष्यसे बोले, 'अर्घ्य ले आओ।' शिष्यने धीरेसे कहा—'मुने! क्या इन्हें अर्घ्य देना उचित है? इस बातका भलीभाँति विचार करके जैसी आज्ञा दें, उसका पालन करूँ।' तब मुनिने राजाके वृत्तान्तको ध्यानद्वारा जानकर केवल आसन दे बातचीतके द्वारा उनका सत्कार किया।

**ऋषिने पूछा—**राजन्! मैं जानता हूँ, आप महाराज उत्तानपादके पुत्र उत्तम हैं। बताइये, किसलिये यहाँ आये हैं? इस वनमें कौन-सा कार्य सिद्ध करनेका विचार है?

**राजाने कहा—**मुने! एक ब्राह्मणके घरसे किसी अपरिचित व्यक्तिने उसकी स्त्रीको चुरा लिया है। उसीकी खोज करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। इस समय आपसे एक बात पूछता हूँ, कृपा करके बताइये। जब मैं आपके आश्रमपर आया तो प्रथम दृष्टि पड़ते ही आपने मुझे अर्घ्य देनेका विचार किया; किन्तु फिर उसे रोक क्यों दिया?

**ऋषि बोले—**राजन्! आपको देखकर मैंने जल्दीमें अर्घ्य देनेकी आज्ञा प्रदान कर दी थी; किन्तु इस शिष्यने मुझे सावधान किया। मेरे प्रसादसे यह भी मेरी ही भाँति संसारके भूत, भविष्य और वर्तमानका हाल जानता है। इसने कहा, 'विचारकर आज्ञा दीजिये।' तब मैंने भी आपका वृत्तान्त जान लिया। इसीलिये आपको विधिपूर्वक अर्घ्य नहीं दिया। राजन्! इसमें संदेह नहीं कि आप स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न

  • राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन * १५९

होनेके कारण अर्घ्य पानेके अधिकारी हैं तथापि हमलोग आपको अर्घ्यका उत्तम पात्र नहीं मानते।

राजाने पूछा— ब्रह्मन्! मैंने जानकर या अनजानमें ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिससे बहुत दिनोंके पश्चात् आनेपर भी मैं आपसे अर्घ्य पानेका अधिकारी न रहा?

ऋषि बोले— राजन्! क्या आप इस बातको भूल गये कि आपने अपनी पत्नीका वनमें परित्याग किया है और उसके साथ ही आप धर्मको भी छोड़ बैठे हैं? एक पक्षतक भी नित्य-कर्म छोड़ देनेसे मनुष्य अस्पृश्य हो जाता है; फिर आपने तो एक वर्षसे उसको छोड़ रखा है। अतः आपके विषयमें क्या कहना है। नरेश्वर! पतिका स्वभाव कैसा ही हो, पत्नीको उचित है कि वह सदा पतिके अनुकूल रहे। इसी प्रकार पतिका भी कर्तव्य है कि वह दुष्ट स्वभाववाली पत्नीका भी पालन-पोषण करे।* ब्राह्मणकी वह पत्नी जिसका अपहरण हुआ है, सदा पतिके प्रतिकूल ही चलती है तथापि धर्मपालनकी इच्छासे वह आपके पास गया और पत्नीको खोजनेके लिये प्रेरित करता रहा। आप तो धर्मसे विचलित हुए दूसरे-दूसरे मनुष्योंको धर्ममें लगाते हैं; फिर जब आप स्वयं ही विचलित होंगे, तब आपको कौन धर्ममें लगायेगा।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुनिके यों कहनेपर राजा लज्जित हो गये। आपका कहना ठीक है, यों कहकर उन्होंने ब्राह्मणकी पत्नीके विषयमें पूछा—'भगवन्! आप भूत और भविष्यके यथार्थ ज्ञाता हैं। बताइये, ब्राह्मणकी पत्नीको कौन ले गया है?'

ऋषि बोले— राजन्! अद्रिके पुत्र बलाक नामके राक्षसने उसका अपहरण किया है। उत्पलावत वनमें जानेपर आप उस ब्राह्मणकी पत्नीको देख सकेंगे। जाइये, शीघ्र ही उस श्रेष्ठ ब्राह्मणका पत्नीसे संयोग कराइये, जिससे आपकी तरह उसे भी दिनोंदिन पापका भागी न होना पड़े।

तदनन्तर उन महामुनिको प्रणाम करके राजा उत्तम पुनः अपने रथपर आरूढ़ हुए और उनके बताये हुए उत्पलावत वनमें गये। वहाँ उन्होंने ब्राह्मणकी पत्नीको देखा। उसका स्वरूप ठीक वैसा ही था, जैसा कि ब्राह्मणने बतलाया था। वह श्रीफल खा रही थी। राजाने उससे पूछा—'भद्रे! तुम इस वनमें कैसे आयीं? सब बातें स्पष्ट रूपसे बताओ। जान पड़ता है, तुम विशालके पुत्र सुशर्माकी स्त्री हो।'

ब्राह्मणीने कहा— मैं वनवासी ब्राह्मण अतिरात्रकी


* पक्षेण कर्मणो हान्या प्रयत्यस्पृश्यतां नरः। किमुत वार्षिकी यस्य हानिस्ते नित्यकर्मणः॥
पत्यानुकूल्या भार्या स्यादसतोऽपि भर्तुः। दुःशीलापि तथा भार्या पोषणीया नरेश्वर॥ (६१।५८-५९)

२६० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पुत्री हूँ और विशालके पुत्रकी, जिसका नाम अभी-अभी आपने बताया है, पत्नी हूँ। मुझे दुरात्मा राक्षस बलाक यहाँ हर लाया है। मैं घरके भीतर सो रही थी, उस समय इसने मेरा अपने भ्राता और मातासे वियोग कराया। मैं यहाँ बहुत दुखी रहती हूँ। उसने मुझे इस अत्यन्त गहन वनमें छोड़ रखा है। न तो मेरा उपभोग करता है और न मुझे खा ही डालता है। इसका कुछ कारण समझमें नहीं आता।

राजा बोले— ब्राह्मणकुमारी! क्या तुम्हें मालूम है कि वह राक्षस तुमको यहाँ छोड़कर कहाँ गया है? मुझे तुम्हारे पतिने ही यहाँ भेजा है।

ब्राह्मणीने कहा— वह निशाचर इसी वनके भीतर रहता है। यदि आपको उससे भय न हो तो इसमें प्रवेश करके देखिये।

उसे खाया क्यों नहीं? इसका कारण बताओ।

तदनन्तर राजाने ब्राह्मणीके दिखाये हुए मार्गसे उस वनके भीतर प्रवेश किया और उस राक्षसको परिवारके साथ बैठे देखा। राजाको देखते ही राक्षसने दूरसे ही पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और उनके निकट गया।

राक्षस बोला— राजन्! आपने मेरे घरपर पधारकर मेरे ऊपर बहुत बड़ी कृपा की है। मैं आपके राज्यमें निवास करता हूँ; अतः बताइये, आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? आप यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये और इस आसनपर बैठिये।

राजाने कहा— निशाचर! तुमने मेरा सब काम कर दिया। सब प्रकारसे मेरा आतिथ्य-सत्कार हो गया। अब बताओ, तुम ब्राह्मणकी स्त्रीको क्यों उठा लाये हो? यदि कहीं तुम उसे अपनी भार्या बनानेके लिये लाये हो तो यह ठीक नहीं जान पड़ता; क्योंकि वह सुन्दरी नहीं है और तुम्हारे घरमें दूसरी स्त्रियाँ भी हैं ही। यदि उसे अपना भक्ष्य बनानेका विचार रहा हो तो आजतक तुमने

राक्षस बोला— राजन्! हमलोग मनुष्यको नहीं खाते। मनुष्यभक्षी राक्षस दूसरे ही हैं। हम तो पुण्यका फल ही खाया करते हैं। इसके सिवा यदि कोई स्त्री या पुरुष हमारा आदर या अनादर कर दे तो हम उसके अच्छे-बुरे स्वभावको भी खा जाते हैं। यदि मनुष्यके क्षमा-स्वभावको हम खा लें तो वे क्रोधी बन जाते हैं और दुष्ट-स्वभावको भक्षण कर लें तो वे उत्तम गुणोंसे सम्पन्न होते हैं। महाराज! मेरे घरमें अनेक युवती स्त्रियाँ हैं, जो रूपमें अप्सराओंकी समानता करनेवाली हैं। उनके रहते हुए मनुष्यकी स्त्रियोंमें मेरा अनुराग कैसे हो सकता है!

राजाने कहा— निशाचर! यदि यह ब्राह्मणी न तो तुम्हारे उपभोगके कामकी है न आहारके तो ब्राह्मणके घरमें प्रवेश करके तुमने इसका अपहरण क्यों किया?

राक्षस बोला— राजन्! वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदमन्त्रोंका

• राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन • १६९

ज्ञाता हैं। मैं जिस किसी यज्ञमें जाता हूँ, रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ करके वह मुझे दूर भगा देता है। मन्त्रोंद्वारा उसके उच्चाटन करनेसे हमलोग भूखे रह जाते हैं। ऐसी दशामें हम कहाँ जायें। प्रायः सभी यज्ञोंमें वह ऋत्विज बना करता है। इसीलिये हमने उसके सामने यह विघ्न खड़ा किया है; क्योंकि कोई भी पुरुष पत्नीके बिना यज्ञ-कर्म करनेके योग्य नहीं रहता। राजन्! मैं आपका विनीत सेवक हूँ, आपके राज्यकी प्रजा हूँ; अतः आप अपने किसी कार्यके लिये आज्ञा देकर मुझपर कृपा कीजिये।

राजाने कहा—राक्षस! तुम पहले कह चुके हो कि हम मनुष्यके स्वभावको खा जाते हैं; अतः हम तुमसे जो काम कराना चाहते हैं, उसे सुनो। तुम इस ब्राह्मणीकी दुष्टताको भक्षण कर लो, जिससे यह विनयशील हो जाय। इसके बाद इसे इसके घरमें पहुँचा आओ। इतना कर देनेपर मैं समझूँगा कि तुमने अपने घरपर आये हुए मुझ अतिथिका सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर दिया।

राजाके यों कहनेपर वह राक्षस अपनी मायासे ब्राह्मणीके शरीरमें प्रवेश कर गया और अपनी शक्तिसे उसके दुष्ट स्वभावको खा गया। फिर तो ब्राह्मणकी पत्नी भयंकर दुष्टतासे मुक्त हो गयी और राजासे बोली—'महाराज! मुझे अपने ही कर्मके फलसे अपने महात्मा स्वामीसे विलग होना पड़ा है। यह निशाचर तो उसमें निमित्तमात्र बना है। न इसका दोष है, न मेरे महात्मा पतिका दोष है; सब दोष मेरा ही है। क्योंकि मनुष्यको अपनी ही करनीका फल भोगना पड़ता है। पूर्वजन्ममें मैंने किसीका वियोग कराया होगा, वह आज मुझपर भी आ पड़ा है। इसमें दूसरेका क्या दोष है।'

राक्षस बोला—राजन्! आपकी आज्ञाके अनुसार मैं इस ब्राह्मणीको इसके स्वामीके घरपर पहुँचा आता हूँ; इसके सिवा और भी यदि मेरे योग्य कोई कार्य हो तो उसके लिये आज्ञा दीजिये।

राजाने कहा—निशाचर! यह कार्य हो जानेपर मैं समझूँगा कि तुमने मेरा सारा कार्य सिद्ध कर दिया। वीर! यदि किसी कार्यके समय मैं तुम्हारा स्मरण करूँ तो तुम मेरे पास आ जाना।

'बहुत अच्छा' कहकर राक्षसने उस ब्राह्मणपत्नीको, जो दुष्टता दूर हो जानेसे अब अच्छे स्वभावकी हो गयी थी, ले जाकर उसके पतिके घरमें पहुँचा दिया। राजा भी उसे भेजकर मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'अब मैं अपने विषयमें क्या करूँ, क्या करनेसे मेरा भला होगा। महात्मा महर्षिने मुझे अर्ध्यके अयोग्य बतलाया है, यह तो मेरे लिये बड़े कष्टकी बात है। अब मैं क्या करूँ। पत्नीको तो मैंने त्याग दिया, अब उसका पता कैसे लगे अथवा उन ज्ञानचक्षु महर्षिसे ही चलकर पूछूँ।' यों विचारकर राजा फिर रथपर आरूढ़ हुए और उस स्थानपर गये, जहाँ वे त्रिकालवेत्ता धर्मात्मा महामुनि रहते थे। रथसे उतरकर उन्होंने मुनिके पास जा उन्हें प्रणाम किया और राक्षससे मिलने, ब्राह्मणीके दिखायी देने तथा उसकी दुष्टताके दूर होने आदिका सब वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया।

ऋषिने कहा—राजन्! तुमने जो कुछ किया है, वह सब मुझे पहलेसे ही मालूम हो चुका है। मेरे पास तुम जिस कार्यसे आये हो, वह भी मुझसे छिपा नहीं है। मनुष्योंके लिये पत्नी धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धिका कारण है। तुमने उसका त्याग करके विशेषतः धर्मको भी त्याग दिया है। राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र कोई भी क्यों न हो, पत्नीके न होनेपर वह अपने कर्मानुष्ठानके योग्य नहीं रहता। तुमने अपनी

१६२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पत्नीका त्याग करके अच्छा नहीं किया। जैसे स्त्रियोंके लिये पतिका त्याग अनुचित है, उसी प्रकार पुरुषोंके लिये स्त्रीका त्याग भी उचित नहीं है।^*

राजा बोले—भगवन्! क्या करूँ, यह सब मेरे कर्मोंका फल है। मैं सदा पत्नीके अनुकूल ही चलता था, फिर भी वह मेरे अनुकूल न हुई। इसलिये मैंने उसे त्याग दिया। उसके वियोगकी पीड़ासे मेरी अन्तरात्मा व्यथित हो रही है। मैंने उसे वनमें छोड़ा था; पता नहीं वह कहाँ चली गयी। अथवा उसे वनमें सिंह, व्याघ्र या निशाचरोंने तो नहीं खा लिया।

ऋषिने कहा—राजन्! उसे सिंह, व्याघ्र या निशाचरोंने नहीं खाया है। वह इस समय रसातलमें है। उसका चरित्र अभीतक नष्ट नहीं हुआ है।

राजा बोले—ब्रह्मन्! यह तो बड़ी अद्भुत बात है। उसे पातालमें कौन ले गया और वह अबतक दूषित कैसे नहीं हुई है, यह सब यथार्थ रूपसे बतलानेकी कृपा करें।

ऋषिने कहा—पातालमें नागराज कपोत एक विख्यात पुरुष हैं। एक दिन उन्होंने तुम्हारी त्यागी हुई सुन्दरी पत्नीको महान् वनके भीतर भटकते हुए देखा। उसका सारा हाल जानकर वे उसपर आसक्त हो गये और उसे पाताललोकमें ले गये। नागराज कपोतके नन्दा नामकी एक पुत्री तथा मनोरमा नामकी स्त्री है। नन्दाने बहुलाको देखकर सोचा, 'हो-न-हो यह मेरी माताकी सौत बननेवाली है।' यो विचारकर वह उसे अपने घरमें ले गयी और अन्तःपुरमें छिपाकर रख दिया। कपोतने जब-जब नन्दासे बहुलाको माँगा, तब-तब उसने उनको कोई उत्तर नहीं दिया। तब पिताने उसे शाप दे दिया—'जा, तू गूँगी हो जायगी।' इस प्रकार शापग्रस्त होकर नन्दा उसके साथ रहती है। नागराज उसे ले गये और उसकी कन्याने उसे अपने संरक्षणमें रख लिया।

राजा बोले—महामुने! मुझे तो बहुला प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है; किन्तु वह मेरे प्रति सदा दुष्टताका ही बर्ताव करती है। इसका क्या कारण है?

ऋषिने कहा—पाणिग्रहणके समय सूर्य, मंगल और शनैश्चरकी तुम्हारे ऊपर तथा शुक्र और बृहस्पतिकी तुम्हारी पत्नीके ऊपर दृष्टि थी। उस मुहूर्त्तमें उसपर चन्द्रमा और बुध भी, जो परस्पर शत्रुभाव रखनेवाले हैं, अनुकूल थे और तुम्हारे ऊपर प्रतिकूल। इसीलिये तुम्हें पत्नीकी प्रतिकूलताका विशेष कष्ट सहना पड़ा है। अच्छा, अब जाओ; धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करो और पत्नीके साथ रहकर सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान करो।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—महर्षिके यों कहनेपर राजा उन्हें प्रणाम करके रथपर आरूढ़ हुए और अपने नगरको लौट आये। वहाँ आनेपर उन्होंने उस ब्राह्मणको देखा, जो अपनी शीलवती भार्याके साथ बहुत प्रसन्न था।

ब्राह्मणने कहा—नृपश्रेष्ठ! आप धर्मके ज्ञाता हैं। आपने मेरी पत्नीको लाकर मेरे धर्मकी रक्षा की है। इससे मैं कृतार्थ हो गया।

राजा बोले—द्विजश्रेष्ठ! आप तो अपने धर्मका पालन करके कृतार्थ हो रहे हैं, किन्तु मैं संकटमें पड़ा हूँ; क्योंकि मेरी पत्नी घरमें नहीं है।

ब्राह्मणने कहा—महाराज! यदि आपकी पत्नी जीवित है और व्यभिचारिणी नहीं हुई है तो आप स्त्रीके बिना रहकर पाप क्यों कमा रहे हैं।


^* त्यजता भवता पत्नी न शोभनमनुष्ठितम्। आचार्यो हि यथा भर्ता स्त्रीणां भार्या तथा नृणाम्॥ (७१।११)

  • राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन * १६३

जाग्रत् हो गया है, तब उसने राजासे कहा—'महाराज! अब आप अपनी प्रिय पत्नीको अपने साथ रखिये और उसके साथ उत्तम भोग भोगते हुए श्रद्धापूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये।'

ब्राह्मणकी बात सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने उस महापराक्रमी सत्यप्रतिज्ञ निशाचरको स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वह राक्षस राजाके पास आ पहुँचा और प्रणाम करके बोला—'क्या आज्ञा है?' तब राजाने विस्तारके साथ अपना सारा वृत्तान्त निवेदन किया। फिर वह राक्षस पातालमें जाकर रानीको ले आया। आनेपर उसने हार्दिक अनुरागके साथ पतिको देखा और बड़ी प्रसन्नताके साथ बारंबार कहा—'मुझपर प्रसन्न होइये।' तब राजाने अपनी मानिनी स्त्रीको हृदयसे लगाकर कहा—'प्रिये! तुम बार-बार मुझसे ऐसा क्यों कहती हो। मैं तो तुमपर प्रसन्न ही हूँ।'

रानी बोली—महाराज! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक याचना करती हूँ; आप उसे पूर्ण करके मेरा आदर कीजिये।

राजा बोले—ब्रह्मन्! यदि मैं पत्नीको लाऊँ भी तो वह सदा मेरे प्रतिकूल रहती है; अतः उससे दुःख ही मिलेगा, सुख नहीं। क्योंकि वह मुझसे मैत्री नहीं रखती। आप कोई ऐसा यत्न करें जिससे वह मेरे अधीन हो जाय।

ब्राह्मणने कहा—राजन्! आपके प्रति रानीका प्रेम होनेके लिये श्रेष्ठ यज्ञ करना उपकारक होगा; अतः मित्रकी कामना रखनेवाले लोग जिसका अनुष्ठान किया करते हैं, वह मित्रविन्दानामक यज्ञ मैं आरम्भ करता हूँ। राजन्! जिन स्त्री-पुरुषोंमें परस्पर प्रेम न हो, उनमें मित्रविन्दा प्रेम उत्पन्न करती है। इसलिये आपके कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे मैं उसीका अनुष्ठान करूँगा।

ब्राह्मणके यों कहनेपर राजाने यज्ञकी सब सामग्री एकत्रित करायी और उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने मित्रविन्दा-यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया। उसने राजाकी स्त्रीमें प्रेम उत्पन्न करनेके लिये एक-एक करके सात यज्ञ किये। जब उसे यह निश्चय हो गया कि रानीके हृदयमें राजाके प्रति मित्रभाव राजाने कहा—प्रिये! तुम्हें जो कुछ भी अभीष्ट हो, वह निःशङ्क होकर कहो। तुम्हारे लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। मैं तुम्हारे अधीन हूँ।

रानी बोली—नाथ! मेरे लिये नागराजने मेरी सखीको शाप दे दिया, जिससे वह गूँगी हो गयी है। यदि आप मेरे प्रेमवश उसके संकटका निवारण कर सकें तो उसकी मूकता दूर करनेके लिये प्रयत्न कीजिये। यदि ऐसा हो गया तो मैं समझूँगी, मेरा सब कार्य सिद्ध हो गया।

तब राजाने उस ब्राह्मणको बुलाकर पूछा—'विप्रवर! इसमें कैसी क्रिया होनी चाहिये, जो उसकी मूकता दूर कर सके?'

ब्राह्मण बोला—राजन्! मैं आपके कहनेसे सारस्वती इष्टि करूँगा, जिससे आपकी वे महारानी

२६४ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


अपनी सखीकी वाक्शक्तिको कार्यक्षम बनाकर उसके ऋणसे उऋण हो जायँ।

तदनन्तर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने सारस्वती इष्टि आरम्भ की। उसने नन्दाकी मूकता दूर करनेके लिये एकाग्रचित्त होकर सारस्वत सूक्तोंका जप किया। इससे वह नागकन्या बोलने लगी। उन दिनों गर्गमुनि रसातलमें रहा करते थे। उन्होंने नन्दाको बताया, 'तुम्हारी सखी बहुलाके पतिने यह अत्यन्त दुष्कर उपकार किया है।' यह बात जानकर शीघ्रगामिनी नन्दा राजाके नगरमें आयी और अपनी सखी महारानी बहुलाको छातीसे लगाकर तथा राजाकी भी बारंबार प्रशंसा करके आसनपर बैठकर मधुर वाणीमें बोली—'वीर!

आपने इस समय मेरा जो उपकार किया है, इससे मेरा हृदय आकृष्ट हो गया है। अतः मैं जो कहती हूँ, उसे सुनो। राजन्! तुम्हें एक महापराक्रमी पुत्र प्राप्त होगा और इस पृथ्वीपर उसका अखण्ड राज्य रहेगा। वह सब शास्त्रोंका ज्ञाता, धर्मपरायण, बुद्धिमान् एवं मन्वन्तरका स्वामी मनु होगा।

राजाको इस प्रकार वर देकर नागराज-कन्या नन्दा अपनी सखीको हृदयसे लगा पाताललोकको चली गयी। तदनन्तर रानीके साथ विहार एवं प्रजापालन करते हुए राजा उत्तमके कितने ही वर्ष व्यतीत हो गये। फिर महात्मा राजाको रानी बहुलाके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पूर्णिमाके पूर्ण चन्द्रकी भाँति कान्तिमान् था। उसके जन्म लेनेपर समस्त प्रजाको महान् आनन्द हुआ। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उसे देखकर मुनियोंने कहा—'यह राजा उत्तमके वंशमें और उत्तम समयमें उत्पन्न हुआ है तथा इसका प्रत्येक अङ्ग उत्तम है; इसलिये यह औत्तम नामसे विख्यात होगा।'

इस प्रकार राजा उत्तमका पुत्र औत्तम नामक मनु हुआ। अब उसके प्रभावका वर्णन सुनो। जो राजा उत्तमके उपाख्यान और औत्तमके जन्मकी कथा प्रतिदिन सुनता है, उसका कभी किसीसे द्वेष नहीं होता। इस चरित्रको सुनने और पढ़नेवालेका कभी प्रिय पत्नी, पुत्र अथवा बन्धुओंसे वियोग नहीं होता। औत्तम मन्वन्तर तीसरा कहा जाता है। उसमें स्वधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन तथा वशवर्ती—ये देवताओंके पाँच गण थे। इनका जैसा नाम, वैसा ही गुण था। ये पाँचों देवगण यज्ञभोगी माने गये हैं। ये सभी गण बारह-बारह व्यक्तियोंके समुदाय हैं। उक्त मन्वन्तरमें सुशान्ति नामक इन्द्र हुए, जो सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इन्द्रपदको प्राप्त हुए थे। आज भी मनुष्य विघ्नोंका नाश करनेके लिये सुशान्तिके नामाक्षरोंसे विभूषित एक गाथाका गान किया करते हैं। वह इस प्रकार है—

सुशान्तिर्देवराट् कान्तः सुशान्तिं संप्रयच्छति।
सहितः शिवसत्याद्यैस्तथैव वशवर्त्तिभिः॥

• तामस मनुकी उत्पत्ति तथा मन्वन्तरका वर्णन • १६५


'शिव, सत्य एवं वशवर्ती आदि देवगणोंके साथ परम सुन्दर देवराज सुशान्ति उत्तम शान्ति प्रदान करते हैं।'

मार्कण्डेयजी कहते हैं—उत्तम मनुके अज, परशुचि और दिव्य—ये तीन पुत्र थे, जो देवताओंके समान तेजस्वी तथा महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न थे। उनके मन्वन्तरमें उन्हींके वंशज इस पृथ्वीका पालन करते रहे। इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है, यह बात पहले बतलायी जा चुकी है। महात्मा वसिष्ठके सात पुत्र ही इस तीसरे मन्वन्तरमें सप्तर्षि थे। इस प्रकार यह तीसरे मन्वन्तरका वर्णन हुआ। अब तामस मनुके चौथे मन्वन्तरका वर्णन किया जाता है। यद्यपि तामस मनुका जन्म मनुष्येतर योनिमें हुआ था तो भी उन्होंने अपने यशसे त्रिभुवनको आलोकित कर दिया था। ब्रह्मन्! अन्य सभी मनुओंकी भाँति चौथे मनुका जन्म भी अलौकिक है। उसे बतलाता हूँ, सुनो।


तामस मनुकी उत्पत्ति तथा मन्वन्तरका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! इस पृथ्वीपर स्वराष्ट्र नामक एक विख्यात राजा हो गये हैं, जो बड़े पराक्रमी थे। उन्होंने अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और वे संग्राममें कभी पीठ नहीं दिखाते थे। राजाके मन्त्रीकी आराधनासे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने राजाको बहुत बड़ी आयु प्रदान की थी। राजाके सौ स्त्रियाँ थीं, किन्तु वे उनकी भाँति बड़ी आयुसे युक्त न होनेके कारण समयानुसार मृत्युको प्राप्त हुईं। इसी प्रकार धीरे-धीरे राजाके मन्त्री और सेवक भी कालके गालमें चले गये। उन सबके अभावमें राजाका चित्त उद्विग्न रहने लगा। प्रतिदिन उनकी शक्ति क्षीण होने लगी। उन्हें वीर्यसे हीन एवं दुखी जानकर विमर्द नामके एक राजाने आक्रमण किया और उनको राज्यच्युत कर दिया। राज्यसे च्युत होनेपर वे विरक्त हो वनमें चले गये और वितस्ता (झेलम) नदीके तटपर रहकर तपस्या करने लगे। वे गर्मीमें पञ्चाग्नि सेवन करते, बरसातमें मैदानमें रहकर वर्षाके जलको शरीरपर सहते और जाड़ेकी ऋतुमें पानीके भीतर शयन करते, निराहार रहते एवं उत्तम व्रतोंका पालन करते। एक बार वर्षाकालमें जब कि वे तपस्या कर रहे थे, लगातार कई दिनोंतक वृष्टि होती रही। इससे बाढ़ आ गयी। राजा भी जलकी प्रखर धारामें बह गये। चारों ओर अन्धकार छा रहा था। जलमें बहते-बहते उन्हें संयोगवश एक हरिणी मिल गयी। उन्होंने उसकी पूँछ पकड़ ली, फिर उस प्रवाहके साथ बहते और अन्धकारमें इधर-उधर भटकते हुए राजा किसी तरह तटपर पहुँचे। वहाँ भी बहुत दूरतक कीचड़ थी, जिसको पार करना अत्यन्त ही कठिन था; तथापि वे हरिणीकी पूँछसे खिंचते हुए उस कीचड़से पार हो एक वनमें जा पहुँचे। हरिणीके स्पर्शसे उन्हें आनन्दका अनुभव होने लगा। उस अन्धकारमें भ्रमण करते हुए वे कामदेवके वशीभूत हो गये। राजाको अनुरागवश अपनी पीठका स्पर्श करते जान उस वनके भीतर मृगीने कहा—'राजन्! आप काँपते हुए हाथोंसे मेरी पीठका स्पर्श क्यों करते हैं? आपके कार्यकी सिद्धि तो किसी और ही प्रकारसे हो गयी है।'

राजा राजाने पूछा—मृगी! तू कौन है? और मनुष्यकी तरह कैसे बोलती है?

मृगी बोली—राजन्! मैं पहले आपकी प्यारी

३६६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पत्नी थी। मेरा नाम उत्पलावती था। मैं दृढ़धन्वाकी पुत्री और आपकी सौ रानियोंमें प्रधान थी।

राजाने पूछा—उत्पलावती तो बड़ी पतिव्रता और धर्मपरायणा थी। वह ऐसी किस प्रकार हुई? उसने कौन-सा ऐसा कर्म किया था, जिससे उसे मृगीकी योनिमें आना पड़ा।

मृगी बोली—राजन्! मैं बाल्यावस्थामें जब पिताके घरपर थी, सखियोंके साथ एक दिन वनमें घूमने गयी थी। वहाँ मैंने मृगीके साथ समागम करते हुए एक मृगको देखा। मैं उसके बिलकुल निकट थी, अतः मैंने उस मृगीको मारा। मुझसे डरकर वह मृगी अन्यत्र चली गयी। तब मृगने कुपित होकर कहा—'ओ मूर्खे! तू क्यों इतनी मतवाली हो रही है, तेरी इस दुष्टताको धिक्कार है।' उस मृगकी मनुष्यके समान वाणी सुनकर मैं डर गयी और बोली—'तुम कौन हो?' उसने उत्तर दिया—'मैं निशीतिचक्षु नामक मुनिका पुत्र हूँ। मेरा नाम सुतपा है। मृगीसे सम्भोग करनेकी इच्छा होनेके कारण मैं मृग हो गया। प्रेमवश मैंने इस मृगीका अनुसरण किया था और इसने भी मेरी अभिलाषा की थी; परन्तु तूने आकर मुझसे उसका वियोग करा दिया, इसलिये मैं तुझे अभी शाप देता हूँ।' मैंने कहा—'मुने! मैंने अनजानमें आपका अपराध किया है, अतः कृपा करके मुझे शाप न दीजिये।' मेरे यों कहनेपर वे मुनि इस प्रकार बोले—'यदि तुझे अपनेको दे सकूँ—तेरे गर्भसे पुत्र उत्पन्न कर सकूँ तो तुझे शाप नहीं दूँगा।' मैंने कहा—'मैं न तो मृगी हूँ और न वनमें मृगीका रूप धारण करके ही घूमती हूँ; अतः मेरी ओरसे अपना मन हटा लीजिये। आपको दूसरी कोई मृगी मिल जायगी।' मेरी यह बात सुनकर मुनिकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उनका ओठ काँपने लगा। वे बोले—'ओ नादान! तू कहती है मैं मृगी नहीं हूँ तो ले तू मृगी ही हो जायगी।' तब मैं अत्यन्त दुःखित हो मुनिको प्रणाम करके बोली—'मुने! मुझपर प्रसन्न होइये। मैं अभी बालिका हूँ। बोलनेका ढंग नहीं जानती। मुनिवर! पिताके न रहनेपर ही स्त्री स्वयं अपना पति चुनती है। मेरे पिताजी तो अभी जीवित हैं, फिर कैसे मैं आपका वरण कर सकती हूँ।^* अथवा सारा अपराध मेरा ही है, फिर भी आप प्रसन्न होइये। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ।' तब मुनिश्रेष्ठ सुतपाने कहा—'मेरी बात झूठी नहीं हो सकती। तू मरनेपर इसी वनमें मृगी होगी। उस समय सिद्धाबीर्य मुनिके पुत्र महाबाहु लोल तेरे गर्भमें आयेंगे। उनके गर्भमें आते ही तुझे अपने पूर्वजन्मका स्मरण होगा, फिर स्मरण-शक्ति प्राप्त करके तू मानवीकी भाँति बोलने लगेगी। उस गर्भके उत्पन्न होनेपर तू मृगीके शरीरसे मुक्त हो जायगी और पतिसे समादृत हो उन लोकोंमें जायगी, जहाँ कुकर्मी मनुष्य कदापि नहीं जा सकते। लोल भी बड़े पराक्रमी होंगे और अपने पिताके शत्रुओंको मारकर सारी पृथ्वी अपने अधिकारमें कर लेंगे। तत्पश्चात् वे मनुके पदपर प्रतिष्ठित होंगे।' इस प्रकार शाप मिलनेपर मैं तिर्यग्योनिमें आयी हूँ। आपके शरीरका स्पर्श होनेमात्रसे मेरे उदरमें गर्भ स्थापित हो गया है।

मृगीके यों कहनेपर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सोचा—'मेरा पुत्र मेरे शत्रुओंको परास्त करके इस पृथ्वीपर मनु होगा, यह कितने आनन्दकी बात है।' तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् मृगीने उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया।


^* पितुर्व्यतीते ह्यभिधीयते हि पतिः स्वयम्। मयि ताते कथं चाहं वृणोमि मुनिसत्तम। (७४। ३४-३५)

• रैवत मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन • १६७

उसके उत्पन्न होनेपर सम्पूर्ण भूत आनन्दका अनुभव करने लगे। विशेषतः राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। मृगी भी शापसे छूटकर उत्तम लोकोंको चली गयी। तदनन्तर सब ऋषियोंने आकर उसकी भावी समृद्धि देख उस बालकका नामकरण किया—'तापसी योनिमें पड़ी हुई माताके गर्भसे इसका जन्म हुआ है, इसलिये यह बालक संसारमें तामस नामसे विख्यात होगा।' तत्पश्चात् पिता अपने पुत्र तामसका लालन-पालन करने लगे। जब तामसको कुछ समझ हुई तो उसने पितासे पूछा—'तात ! आप कौन हैं ? मैं आपका पुत्र किस प्रकार हुआ ? मेरी माता कौन हैं और आप किसलिये यहाँ आये हैं ? यह सब सच-सच बताइये।'

तब पिताने अपने राज्यसे च्युत होने आदिसे लेकर सब वृत्तान्त पुत्रको बतलाया। ये सब बातें सुनकर तामसने भगवान् सूर्यकी आराधना की और उनसे उपसंहारसहित सम्पूर्ण दिव्य अस्त्र प्राप्त किये। अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता होकर उसने सम्पूर्ण शत्रुओंको परास्त किया और उन्हें पिताके पास ले आकर उनकी आज्ञा मिलनेपर छुटकारा दिया। वह सदा अपने धर्मके पालनमें लगा रहता था। उसके पिता भी शरीर त्यागनेके पश्चात् तप और यज्ञसे उपार्जित पुण्यलोकोंमें गये। सारी पृथ्वीको जीतकर तामस राजा हुआ और फिर मनुके पदपर प्रतिष्ठित हुआ। अब तामस मन्वन्तरका वर्णन सुनो। उसमें सत्य, सुधी, स्वरूप और हरि—ये चार देवगण हुए। इनमेंसे एक-एक गणमें सत्ताईस-सत्ताईस देवता हैं। उन देवताओंके इन्द्रका नाम शिखी था। वे अत्यन्त बली और महापराक्रमी थे। उन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस पदको प्राप्त किया था। ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वलक और पीवर—ये ही सात उस समयके सप्तर्षि थे। नर, क्षान्ति, शान्त, दान्त, जानु और जङ्घ आदि महाबली राजा तामस मनुके पुत्र थे।

रैवत मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! पाँचवें मनुका नाम रैवत था। उनकी उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें ऋतवाक् नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे। उनके बहुत समयतक कोई पुत्र नहीं हुआ। दीर्घ कालके पश्चात् हुआ भी तो रेवती नक्षत्रके अन्तिम चरणमें उसका जन्म हुआ। उन्होंने बालकके जातकर्म आदि संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये। उपनयन आदि भी कराये, किन्तु वह सुशील न हो सका। जबसे उसका जन्म हुआ, तभीसे वे महर्षि भी दीर्घकालव्यापी रोगसे ग्रस्त हो गये। उसकी माता भी कोढ़ आदिसे पीड़ित हो बहुत दुःख उठाने लगी। बालकके पिता अत्यन्त दुःखी होकर सोचने लगे—'यह कैसा अनर्थ प्राप्त हुआ !' उधर उस दुष्टबुद्धिवाले पुत्रने दूसरे मुनिकुमारकी स्त्रीका अपहरण कर लिया। इससे खिन्नचित्त होकर ऋतवाक्‌ने कहा—'मनुष्योंका बिना पुत्रके रहना अच्छा है; किन्तु कुपुत्रका होना कदापि उत्तम नहीं है। कुपुत्र तो पिता-माताके हृदयको सदा ही सालता रहता है और स्वर्गमें गये हुए पितरोंको भी नरकमें गिरा देता है। वह तो केवल माता-पिताको दुःख देनेके लिये ही होता है। उस पापात्मा पुत्रके जन्मको धिक्कार है। जिनके पुत्र सब लोगोंके प्रिय, परोपकारी, शान्त तथा उत्तम कर्मोंमें लगे रहनेवाले होते हैं, वे ही धन्य हैं। मुझे इस जन्ममें कुपुत्रके कारण सुख नहीं मिला और परलोकसे विमुख होना पड़ा।

१६८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


कुपुत्रका आश्रय लेनेवाला मेरा यह अधम जन्म केवल नरकमें ले जानेवाला है, उत्तम गतिकी प्राप्ति करानेवाला नहीं।'

इस प्रकार अत्यन्त दुष्ट पुत्रके दुराचारोंसे ऋतवाक् मुनिका हृदय जलने लगा। उन्होंने गर्गमुनिसे इसका कारण पूछा।

ऋतवाक् बोले—महामुने! पूर्वकालमें उत्तम ऋतका पालन करते हुए मैंने सब वेदोंका विधिपूर्वक अध्ययन किया और उन्हें समाप्त करके वैदिक विधिके अनुसार स्त्रीके साथ विवाह किया; फिर स्त्रीको साथ रखकर वेदों और स्मृतियोंमें बताये हुए सभी कर्तव्य कर्मोंका अनुष्ठान किया। आजतक किसी भी क्रियाके अनुष्ठानमें न्यूनता नहीं आने दी। मुने! 'पुम्' नामके नरकसे डरते हुए मैंने गर्भाधानकी विधिसे पुत्रोत्पत्तिके उद्देश्य रखकर स्त्रीके साथ समागम किया है, कामोपभोगके लिये नहीं। वह सब होनेपर भी ऐसे कुपुत्रका जन्म क्यों हुआ? क्या वह मेरे दोषसे अथवा अपने दोषसे उत्पन्न हुआ है, जो अपनी दुष्टतासे हमारे लिये दुःखदायी और बन्धुजनोंके लिये शोककारक हो गया है?

गर्गने कहा—मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारा यह पुत्र रेवती नक्षत्रके अन्तिम चरणमें उत्पन्न हुआ है, अतः दूषित समयमें जन्म ग्रहण करनेके कारण यह तुम्हारे लिये दुःखदायी हो गया है।

ऋतवाक् बोले—मेरे एक ही पुत्र था तो भी रेवती नक्षत्रके अन्तिम भागमें उत्पन्न होनेके कारण इसमें ऐसी दुष्टता आ गयी; इसलिये रेवतीका शीघ्र ही पतन हो जाय।

मुनिके इस प्रकार शाप देते ही रेवती नक्षत्र आकाशसे गिरा। सारा संसार चकितचित्त होकर यह दृश्य देख रहा था। वह नक्षत्र कुमुदगिरिके चारों ओर गिर पड़ा। वहाँके वन, गुफाएँ तथा झरने आदि सहसा उद्भासित हो उठे। रेवती नक्षत्रके गिरनेसे कुमुदगिरिका नाम रैवतक पर्वत हो गया। उस नक्षत्रकी जो कान्ति थी, वह कमलमण्डित सरोवरके रूपमें प्रकट हुई। उस समय उस सरोवरसे एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याका प्रादुर्भाव हुआ। वह रेवतीकी कान्तिसे प्रकट हुई थी, इसलिये प्रमुच मुनिने उसे देखकर उसका नाम रेवती रख दिया। वह उनके आश्रमके पास ही प्रकट हुई थी, इसलिये वे ही पिताकी भाँति उसका पालन-पोषण करने लगे। जब कन्या यौवनावस्थामें पदार्पण कर चुकी, तब प्रमुच मुनि उसके लिये योग्य वर पूछनेके विचारसे अग्निशालामें गये। उनके प्रश्न करनेपर अग्निदेवने उत्तर दिया—'इस कन्याके स्वामी राजा दुर्गम होंगे, जो महाबली, महापराक्रमी, प्रियवक्ता और धर्मवत्सल हैं।'

इसी बीचमें मृगयाके प्रसङ्गसे राजा दुर्गम मुनिके आश्रमपर आ पहुँचे। वे प्रियव्रतके वंशमें उत्पन्न अत्यन्त बलवान् और पराक्रमी थे। उनके