भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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३६६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पत्नी थी। मेरा नाम उत्पलावती था। मैं दृढ़धन्वाकी पुत्री और आपकी सौ रानियोंमें प्रधान थी।

राजाने पूछा—उत्पलावती तो बड़ी पतिव्रता और धर्मपरायणा थी। वह ऐसी किस प्रकार हुई? उसने कौन-सा ऐसा कर्म किया था, जिससे उसे मृगीकी योनिमें आना पड़ा।

मृगी बोली—राजन्! मैं बाल्यावस्थामें जब पिताके घरपर थी, सखियोंके साथ एक दिन वनमें घूमने गयी थी। वहाँ मैंने मृगीके साथ समागम करते हुए एक मृगको देखा। मैं उसके बिलकुल निकट थी, अतः मैंने उस मृगीको मारा। मुझसे डरकर वह मृगी अन्यत्र चली गयी। तब मृगने कुपित होकर कहा—'ओ मूर्खे! तू क्यों इतनी मतवाली हो रही है, तेरी इस दुष्टताको धिक्कार है।' उस मृगकी मनुष्यके समान वाणी सुनकर मैं डर गयी और बोली—'तुम कौन हो?' उसने उत्तर दिया—'मैं निशीतिचक्षु नामक मुनिका पुत्र हूँ। मेरा नाम सुतपा है। मृगीसे सम्भोग करनेकी इच्छा होनेके कारण मैं मृग हो गया। प्रेमवश मैंने इस मृगीका अनुसरण किया था और इसने भी मेरी अभिलाषा की थी; परन्तु तूने आकर मुझसे उसका वियोग करा दिया, इसलिये मैं तुझे अभी शाप देता हूँ।' मैंने कहा—'मुने! मैंने अनजानमें आपका अपराध किया है, अतः कृपा करके मुझे शाप न दीजिये।' मेरे यों कहनेपर वे मुनि इस प्रकार बोले—'यदि तुझे अपनेको दे सकूँ—तेरे गर्भसे पुत्र उत्पन्न कर सकूँ तो तुझे शाप नहीं दूँगा।' मैंने कहा—'मैं न तो मृगी हूँ और न वनमें मृगीका रूप धारण करके ही घूमती हूँ; अतः मेरी ओरसे अपना मन हटा लीजिये। आपको दूसरी कोई मृगी मिल जायगी।' मेरी यह बात सुनकर मुनिकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उनका ओठ काँपने लगा। वे बोले—'ओ नादान! तू कहती है मैं मृगी नहीं हूँ तो ले तू मृगी ही हो जायगी।' तब मैं अत्यन्त दुःखित हो मुनिको प्रणाम करके बोली—'मुने! मुझपर प्रसन्न होइये। मैं अभी बालिका हूँ। बोलनेका ढंग नहीं जानती। मुनिवर! पिताके न रहनेपर ही स्त्री स्वयं अपना पति चुनती है। मेरे पिताजी तो अभी जीवित हैं, फिर कैसे मैं आपका वरण कर सकती हूँ।^* अथवा सारा अपराध मेरा ही है, फिर भी आप प्रसन्न होइये। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ।' तब मुनिश्रेष्ठ सुतपाने कहा—'मेरी बात झूठी नहीं हो सकती। तू मरनेपर इसी वनमें मृगी होगी। उस समय सिद्धाबीर्य मुनिके पुत्र महाबाहु लोल तेरे गर्भमें आयेंगे। उनके गर्भमें आते ही तुझे अपने पूर्वजन्मका स्मरण होगा, फिर स्मरण-शक्ति प्राप्त करके तू मानवीकी भाँति बोलने लगेगी। उस गर्भके उत्पन्न होनेपर तू मृगीके शरीरसे मुक्त हो जायगी और पतिसे समादृत हो उन लोकोंमें जायगी, जहाँ कुकर्मी मनुष्य कदापि नहीं जा सकते। लोल भी बड़े पराक्रमी होंगे और अपने पिताके शत्रुओंको मारकर सारी पृथ्वी अपने अधिकारमें कर लेंगे। तत्पश्चात् वे मनुके पदपर प्रतिष्ठित होंगे।' इस प्रकार शाप मिलनेपर मैं तिर्यग्योनिमें आयी हूँ। आपके शरीरका स्पर्श होनेमात्रसे मेरे उदरमें गर्भ स्थापित हो गया है।

मृगीके यों कहनेपर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सोचा—'मेरा पुत्र मेरे शत्रुओंको परास्त करके इस पृथ्वीपर मनु होगा, यह कितने आनन्दकी बात है।' तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् मृगीने उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया।


^* पितुर्व्यतीते ह्यभिधीयते हि पतिः स्वयम्। मयि ताते कथं चाहं वृणोमि मुनिसत्तम। (७४। ३४-३५)