संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• तामस मनुकी उत्पत्ति तथा मन्वन्तरका वर्णन • १६५
'शिव, सत्य एवं वशवर्ती आदि देवगणोंके साथ परम सुन्दर देवराज सुशान्ति उत्तम शान्ति प्रदान करते हैं।'
मार्कण्डेयजी कहते हैं—उत्तम मनुके अज, परशुचि और दिव्य—ये तीन पुत्र थे, जो देवताओंके समान तेजस्वी तथा महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न थे। उनके मन्वन्तरमें उन्हींके वंशज इस पृथ्वीका पालन करते रहे। इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है, यह बात पहले बतलायी जा चुकी है। महात्मा वसिष्ठके सात पुत्र ही इस तीसरे मन्वन्तरमें सप्तर्षि थे। इस प्रकार यह तीसरे मन्वन्तरका वर्णन हुआ। अब तामस मनुके चौथे मन्वन्तरका वर्णन किया जाता है। यद्यपि तामस मनुका जन्म मनुष्येतर योनिमें हुआ था तो भी उन्होंने अपने यशसे त्रिभुवनको आलोकित कर दिया था। ब्रह्मन्! अन्य सभी मनुओंकी भाँति चौथे मनुका जन्म भी अलौकिक है। उसे बतलाता हूँ, सुनो।
तामस मनुकी उत्पत्ति तथा मन्वन्तरका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! इस पृथ्वीपर स्वराष्ट्र नामक एक विख्यात राजा हो गये हैं, जो बड़े पराक्रमी थे। उन्होंने अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और वे संग्राममें कभी पीठ नहीं दिखाते थे। राजाके मन्त्रीकी आराधनासे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने राजाको बहुत बड़ी आयु प्रदान की थी। राजाके सौ स्त्रियाँ थीं, किन्तु वे उनकी भाँति बड़ी आयुसे युक्त न होनेके कारण समयानुसार मृत्युको प्राप्त हुईं। इसी प्रकार धीरे-धीरे राजाके मन्त्री और सेवक भी कालके गालमें चले गये। उन सबके अभावमें राजाका चित्त उद्विग्न रहने लगा। प्रतिदिन उनकी शक्ति क्षीण होने लगी। उन्हें वीर्यसे हीन एवं दुखी जानकर विमर्द नामके एक राजाने आक्रमण किया और उनको राज्यच्युत कर दिया। राज्यसे च्युत होनेपर वे विरक्त हो वनमें चले गये और वितस्ता (झेलम) नदीके तटपर रहकर तपस्या करने लगे। वे गर्मीमें पञ्चाग्नि सेवन करते, बरसातमें मैदानमें रहकर वर्षाके जलको शरीरपर सहते और जाड़ेकी ऋतुमें पानीके भीतर शयन करते, निराहार रहते एवं उत्तम व्रतोंका पालन करते। एक बार वर्षाकालमें जब कि वे तपस्या कर रहे थे, लगातार कई दिनोंतक वृष्टि होती रही। इससे बाढ़ आ गयी। राजा भी जलकी प्रखर धारामें बह गये। चारों ओर अन्धकार छा रहा था। जलमें बहते-बहते उन्हें संयोगवश एक हरिणी मिल गयी। उन्होंने उसकी पूँछ पकड़ ली, फिर उस प्रवाहके साथ बहते और अन्धकारमें इधर-उधर भटकते हुए राजा किसी तरह तटपर पहुँचे। वहाँ भी बहुत दूरतक कीचड़ थी, जिसको पार करना अत्यन्त ही कठिन था; तथापि वे हरिणीकी पूँछसे खिंचते हुए उस कीचड़से पार हो एक वनमें जा पहुँचे। हरिणीके स्पर्शसे उन्हें आनन्दका अनुभव होने लगा। उस अन्धकारमें भ्रमण करते हुए वे कामदेवके वशीभूत हो गये। राजाको अनुरागवश अपनी पीठका स्पर्श करते जान उस वनके भीतर मृगीने कहा—'राजन्! आप काँपते हुए हाथोंसे मेरी पीठका स्पर्श क्यों करते हैं? आपके कार्यकी सिद्धि तो किसी और ही प्रकारसे हो गयी है।'
राजा राजाने पूछा—मृगी! तू कौन है? और मनुष्यकी तरह कैसे बोलती है?
मृगी बोली—राजन्! मैं पहले आपकी प्यारी