भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६४ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


अपनी सखीकी वाक्शक्तिको कार्यक्षम बनाकर उसके ऋणसे उऋण हो जायँ।

तदनन्तर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने सारस्वती इष्टि आरम्भ की। उसने नन्दाकी मूकता दूर करनेके लिये एकाग्रचित्त होकर सारस्वत सूक्तोंका जप किया। इससे वह नागकन्या बोलने लगी। उन दिनों गर्गमुनि रसातलमें रहा करते थे। उन्होंने नन्दाको बताया, 'तुम्हारी सखी बहुलाके पतिने यह अत्यन्त दुष्कर उपकार किया है।' यह बात जानकर शीघ्रगामिनी नन्दा राजाके नगरमें आयी और अपनी सखी महारानी बहुलाको छातीसे लगाकर तथा राजाकी भी बारंबार प्रशंसा करके आसनपर बैठकर मधुर वाणीमें बोली—'वीर!

आपने इस समय मेरा जो उपकार किया है, इससे मेरा हृदय आकृष्ट हो गया है। अतः मैं जो कहती हूँ, उसे सुनो। राजन्! तुम्हें एक महापराक्रमी पुत्र प्राप्त होगा और इस पृथ्वीपर उसका अखण्ड राज्य रहेगा। वह सब शास्त्रोंका ज्ञाता, धर्मपरायण, बुद्धिमान् एवं मन्वन्तरका स्वामी मनु होगा।

राजाको इस प्रकार वर देकर नागराज-कन्या नन्दा अपनी सखीको हृदयसे लगा पाताललोकको चली गयी। तदनन्तर रानीके साथ विहार एवं प्रजापालन करते हुए राजा उत्तमके कितने ही वर्ष व्यतीत हो गये। फिर महात्मा राजाको रानी बहुलाके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पूर्णिमाके पूर्ण चन्द्रकी भाँति कान्तिमान् था। उसके जन्म लेनेपर समस्त प्रजाको महान् आनन्द हुआ। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उसे देखकर मुनियोंने कहा—'यह राजा उत्तमके वंशमें और उत्तम समयमें उत्पन्न हुआ है तथा इसका प्रत्येक अङ्ग उत्तम है; इसलिये यह औत्तम नामसे विख्यात होगा।'

इस प्रकार राजा उत्तमका पुत्र औत्तम नामक मनु हुआ। अब उसके प्रभावका वर्णन सुनो। जो राजा उत्तमके उपाख्यान और औत्तमके जन्मकी कथा प्रतिदिन सुनता है, उसका कभी किसीसे द्वेष नहीं होता। इस चरित्रको सुनने और पढ़नेवालेका कभी प्रिय पत्नी, पुत्र अथवा बन्धुओंसे वियोग नहीं होता। औत्तम मन्वन्तर तीसरा कहा जाता है। उसमें स्वधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन तथा वशवर्ती—ये देवताओंके पाँच गण थे। इनका जैसा नाम, वैसा ही गुण था। ये पाँचों देवगण यज्ञभोगी माने गये हैं। ये सभी गण बारह-बारह व्यक्तियोंके समुदाय हैं। उक्त मन्वन्तरमें सुशान्ति नामक इन्द्र हुए, जो सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इन्द्रपदको प्राप्त हुए थे। आज भी मनुष्य विघ्नोंका नाश करनेके लिये सुशान्तिके नामाक्षरोंसे विभूषित एक गाथाका गान किया करते हैं। वह इस प्रकार है—

सुशान्तिर्देवराट् कान्तः सुशान्तिं संप्रयच्छति।
सहितः शिवसत्याद्यैस्तथैव वशवर्त्तिभिः॥