संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें- राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन * १६३
जाग्रत् हो गया है, तब उसने राजासे कहा—'महाराज! अब आप अपनी प्रिय पत्नीको अपने साथ रखिये और उसके साथ उत्तम भोग भोगते हुए श्रद्धापूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये।'
ब्राह्मणकी बात सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने उस महापराक्रमी सत्यप्रतिज्ञ निशाचरको स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वह राक्षस राजाके पास आ पहुँचा और प्रणाम करके बोला—'क्या आज्ञा है?' तब राजाने विस्तारके साथ अपना सारा वृत्तान्त निवेदन किया। फिर वह राक्षस पातालमें जाकर रानीको ले आया। आनेपर उसने हार्दिक अनुरागके साथ पतिको देखा और बड़ी प्रसन्नताके साथ बारंबार कहा—'मुझपर प्रसन्न होइये।' तब राजाने अपनी मानिनी स्त्रीको हृदयसे लगाकर कहा—'प्रिये! तुम बार-बार मुझसे ऐसा क्यों कहती हो। मैं तो तुमपर प्रसन्न ही हूँ।'
रानी बोली—महाराज! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक याचना करती हूँ; आप उसे पूर्ण करके मेरा आदर कीजिये।
राजा बोले—ब्रह्मन्! यदि मैं पत्नीको लाऊँ भी तो वह सदा मेरे प्रतिकूल रहती है; अतः उससे दुःख ही मिलेगा, सुख नहीं। क्योंकि वह मुझसे मैत्री नहीं रखती। आप कोई ऐसा यत्न करें जिससे वह मेरे अधीन हो जाय।
ब्राह्मणने कहा—राजन्! आपके प्रति रानीका प्रेम होनेके लिये श्रेष्ठ यज्ञ करना उपकारक होगा; अतः मित्रकी कामना रखनेवाले लोग जिसका अनुष्ठान किया करते हैं, वह मित्रविन्दानामक यज्ञ मैं आरम्भ करता हूँ। राजन्! जिन स्त्री-पुरुषोंमें परस्पर प्रेम न हो, उनमें मित्रविन्दा प्रेम उत्पन्न करती है। इसलिये आपके कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे मैं उसीका अनुष्ठान करूँगा।
ब्राह्मणके यों कहनेपर राजाने यज्ञकी सब सामग्री एकत्रित करायी और उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने मित्रविन्दा-यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया। उसने राजाकी स्त्रीमें प्रेम उत्पन्न करनेके लिये एक-एक करके सात यज्ञ किये। जब उसे यह निश्चय हो गया कि रानीके हृदयमें राजाके प्रति मित्रभाव राजाने कहा—प्रिये! तुम्हें जो कुछ भी अभीष्ट हो, वह निःशङ्क होकर कहो। तुम्हारे लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। मैं तुम्हारे अधीन हूँ।
रानी बोली—नाथ! मेरे लिये नागराजने मेरी सखीको शाप दे दिया, जिससे वह गूँगी हो गयी है। यदि आप मेरे प्रेमवश उसके संकटका निवारण कर सकें तो उसकी मूकता दूर करनेके लिये प्रयत्न कीजिये। यदि ऐसा हो गया तो मैं समझूँगी, मेरा सब कार्य सिद्ध हो गया।
तब राजाने उस ब्राह्मणको बुलाकर पूछा—'विप्रवर! इसमें कैसी क्रिया होनी चाहिये, जो उसकी मूकता दूर कर सके?'
ब्राह्मण बोला—राजन्! मैं आपके कहनेसे सारस्वती इष्टि करूँगा, जिससे आपकी वे महारानी