भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 162

१६२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पत्नीका त्याग करके अच्छा नहीं किया। जैसे स्त्रियोंके लिये पतिका त्याग अनुचित है, उसी प्रकार पुरुषोंके लिये स्त्रीका त्याग भी उचित नहीं है।^*

राजा बोले—भगवन्! क्या करूँ, यह सब मेरे कर्मोंका फल है। मैं सदा पत्नीके अनुकूल ही चलता था, फिर भी वह मेरे अनुकूल न हुई। इसलिये मैंने उसे त्याग दिया। उसके वियोगकी पीड़ासे मेरी अन्तरात्मा व्यथित हो रही है। मैंने उसे वनमें छोड़ा था; पता नहीं वह कहाँ चली गयी। अथवा उसे वनमें सिंह, व्याघ्र या निशाचरोंने तो नहीं खा लिया।

ऋषिने कहा—राजन्! उसे सिंह, व्याघ्र या निशाचरोंने नहीं खाया है। वह इस समय रसातलमें है। उसका चरित्र अभीतक नष्ट नहीं हुआ है।

राजा बोले—ब्रह्मन्! यह तो बड़ी अद्भुत बात है। उसे पातालमें कौन ले गया और वह अबतक दूषित कैसे नहीं हुई है, यह सब यथार्थ रूपसे बतलानेकी कृपा करें।

ऋषिने कहा—पातालमें नागराज कपोत एक विख्यात पुरुष हैं। एक दिन उन्होंने तुम्हारी त्यागी हुई सुन्दरी पत्नीको महान् वनके भीतर भटकते हुए देखा। उसका सारा हाल जानकर वे उसपर आसक्त हो गये और उसे पाताललोकमें ले गये। नागराज कपोतके नन्दा नामकी एक पुत्री तथा मनोरमा नामकी स्त्री है। नन्दाने बहुलाको देखकर सोचा, 'हो-न-हो यह मेरी माताकी सौत बननेवाली है।' यो विचारकर वह उसे अपने घरमें ले गयी और अन्तःपुरमें छिपाकर रख दिया। कपोतने जब-जब नन्दासे बहुलाको माँगा, तब-तब उसने उनको कोई उत्तर नहीं दिया। तब पिताने उसे शाप दे दिया—'जा, तू गूँगी हो जायगी।' इस प्रकार शापग्रस्त होकर नन्दा उसके साथ रहती है। नागराज उसे ले गये और उसकी कन्याने उसे अपने संरक्षणमें रख लिया।

राजा बोले—महामुने! मुझे तो बहुला प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है; किन्तु वह मेरे प्रति सदा दुष्टताका ही बर्ताव करती है। इसका क्या कारण है?

ऋषिने कहा—पाणिग्रहणके समय सूर्य, मंगल और शनैश्चरकी तुम्हारे ऊपर तथा शुक्र और बृहस्पतिकी तुम्हारी पत्नीके ऊपर दृष्टि थी। उस मुहूर्त्तमें उसपर चन्द्रमा और बुध भी, जो परस्पर शत्रुभाव रखनेवाले हैं, अनुकूल थे और तुम्हारे ऊपर प्रतिकूल। इसीलिये तुम्हें पत्नीकी प्रतिकूलताका विशेष कष्ट सहना पड़ा है। अच्छा, अब जाओ; धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करो और पत्नीके साथ रहकर सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान करो।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—महर्षिके यों कहनेपर राजा उन्हें प्रणाम करके रथपर आरूढ़ हुए और अपने नगरको लौट आये। वहाँ आनेपर उन्होंने उस ब्राह्मणको देखा, जो अपनी शीलवती भार्याके साथ बहुत प्रसन्न था।

ब्राह्मणने कहा—नृपश्रेष्ठ! आप धर्मके ज्ञाता हैं। आपने मेरी पत्नीको लाकर मेरे धर्मकी रक्षा की है। इससे मैं कृतार्थ हो गया।

राजा बोले—द्विजश्रेष्ठ! आप तो अपने धर्मका पालन करके कृतार्थ हो रहे हैं, किन्तु मैं संकटमें पड़ा हूँ; क्योंकि मेरी पत्नी घरमें नहीं है।

ब्राह्मणने कहा—महाराज! यदि आपकी पत्नी जीवित है और व्यभिचारिणी नहीं हुई है तो आप स्त्रीके बिना रहकर पाप क्यों कमा रहे हैं।


^* त्यजता भवता पत्नी न शोभनमनुष्ठितम्। आचार्यो हि यथा भर्ता स्त्रीणां भार्या तथा नृणाम्॥ (७१।११)