संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें• राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन • १६९
ज्ञाता हैं। मैं जिस किसी यज्ञमें जाता हूँ, रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ करके वह मुझे दूर भगा देता है। मन्त्रोंद्वारा उसके उच्चाटन करनेसे हमलोग भूखे रह जाते हैं। ऐसी दशामें हम कहाँ जायें। प्रायः सभी यज्ञोंमें वह ऋत्विज बना करता है। इसीलिये हमने उसके सामने यह विघ्न खड़ा किया है; क्योंकि कोई भी पुरुष पत्नीके बिना यज्ञ-कर्म करनेके योग्य नहीं रहता। राजन्! मैं आपका विनीत सेवक हूँ, आपके राज्यकी प्रजा हूँ; अतः आप अपने किसी कार्यके लिये आज्ञा देकर मुझपर कृपा कीजिये।
राजाने कहा—राक्षस! तुम पहले कह चुके हो कि हम मनुष्यके स्वभावको खा जाते हैं; अतः हम तुमसे जो काम कराना चाहते हैं, उसे सुनो। तुम इस ब्राह्मणीकी दुष्टताको भक्षण कर लो, जिससे यह विनयशील हो जाय। इसके बाद इसे इसके घरमें पहुँचा आओ। इतना कर देनेपर मैं समझूँगा कि तुमने अपने घरपर आये हुए मुझ अतिथिका सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर दिया।
राजाके यों कहनेपर वह राक्षस अपनी मायासे ब्राह्मणीके शरीरमें प्रवेश कर गया और अपनी शक्तिसे उसके दुष्ट स्वभावको खा गया। फिर तो ब्राह्मणकी पत्नी भयंकर दुष्टतासे मुक्त हो गयी और राजासे बोली—'महाराज! मुझे अपने ही कर्मके फलसे अपने महात्मा स्वामीसे विलग होना पड़ा है। यह निशाचर तो उसमें निमित्तमात्र बना है। न इसका दोष है, न मेरे महात्मा पतिका दोष है; सब दोष मेरा ही है। क्योंकि मनुष्यको अपनी ही करनीका फल भोगना पड़ता है। पूर्वजन्ममें मैंने किसीका वियोग कराया होगा, वह आज मुझपर भी आ पड़ा है। इसमें दूसरेका क्या दोष है।'
राक्षस बोला—राजन्! आपकी आज्ञाके अनुसार मैं इस ब्राह्मणीको इसके स्वामीके घरपर पहुँचा आता हूँ; इसके सिवा और भी यदि मेरे योग्य कोई कार्य हो तो उसके लिये आज्ञा दीजिये।
राजाने कहा—निशाचर! यह कार्य हो जानेपर मैं समझूँगा कि तुमने मेरा सारा कार्य सिद्ध कर दिया। वीर! यदि किसी कार्यके समय मैं तुम्हारा स्मरण करूँ तो तुम मेरे पास आ जाना।
'बहुत अच्छा' कहकर राक्षसने उस ब्राह्मणपत्नीको, जो दुष्टता दूर हो जानेसे अब अच्छे स्वभावकी हो गयी थी, ले जाकर उसके पतिके घरमें पहुँचा दिया। राजा भी उसे भेजकर मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'अब मैं अपने विषयमें क्या करूँ, क्या करनेसे मेरा भला होगा। महात्मा महर्षिने मुझे अर्ध्यके अयोग्य बतलाया है, यह तो मेरे लिये बड़े कष्टकी बात है। अब मैं क्या करूँ। पत्नीको तो मैंने त्याग दिया, अब उसका पता कैसे लगे अथवा उन ज्ञानचक्षु महर्षिसे ही चलकर पूछूँ।' यों विचारकर राजा फिर रथपर आरूढ़ हुए और उस स्थानपर गये, जहाँ वे त्रिकालवेत्ता धर्मात्मा महामुनि रहते थे। रथसे उतरकर उन्होंने मुनिके पास जा उन्हें प्रणाम किया और राक्षससे मिलने, ब्राह्मणीके दिखायी देने तथा उसकी दुष्टताके दूर होने आदिका सब वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया।
ऋषिने कहा—राजन्! तुमने जो कुछ किया है, वह सब मुझे पहलेसे ही मालूम हो चुका है। मेरे पास तुम जिस कार्यसे आये हो, वह भी मुझसे छिपा नहीं है। मनुष्योंके लिये पत्नी धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धिका कारण है। तुमने उसका त्याग करके विशेषतः धर्मको भी त्याग दिया है। राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र कोई भी क्यों न हो, पत्नीके न होनेपर वह अपने कर्मानुष्ठानके योग्य नहीं रहता। तुमने अपनी