संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पुत्री हूँ और विशालके पुत्रकी, जिसका नाम अभी-अभी आपने बताया है, पत्नी हूँ। मुझे दुरात्मा राक्षस बलाक यहाँ हर लाया है। मैं घरके भीतर सो रही थी, उस समय इसने मेरा अपने भ्राता और मातासे वियोग कराया। मैं यहाँ बहुत दुखी रहती हूँ। उसने मुझे इस अत्यन्त गहन वनमें छोड़ रखा है। न तो मेरा उपभोग करता है और न मुझे खा ही डालता है। इसका कुछ कारण समझमें नहीं आता।
राजा बोले— ब्राह्मणकुमारी! क्या तुम्हें मालूम है कि वह राक्षस तुमको यहाँ छोड़कर कहाँ गया है? मुझे तुम्हारे पतिने ही यहाँ भेजा है।
ब्राह्मणीने कहा— वह निशाचर इसी वनके भीतर रहता है। यदि आपको उससे भय न हो तो इसमें प्रवेश करके देखिये।
उसे खाया क्यों नहीं? इसका कारण बताओ।
तदनन्तर राजाने ब्राह्मणीके दिखाये हुए मार्गसे उस वनके भीतर प्रवेश किया और उस राक्षसको परिवारके साथ बैठे देखा। राजाको देखते ही राक्षसने दूरसे ही पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और उनके निकट गया।
राक्षस बोला— राजन्! आपने मेरे घरपर पधारकर मेरे ऊपर बहुत बड़ी कृपा की है। मैं आपके राज्यमें निवास करता हूँ; अतः बताइये, आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? आप यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये और इस आसनपर बैठिये।
राजाने कहा— निशाचर! तुमने मेरा सब काम कर दिया। सब प्रकारसे मेरा आतिथ्य-सत्कार हो गया। अब बताओ, तुम ब्राह्मणकी स्त्रीको क्यों उठा लाये हो? यदि कहीं तुम उसे अपनी भार्या बनानेके लिये लाये हो तो यह ठीक नहीं जान पड़ता; क्योंकि वह सुन्दरी नहीं है और तुम्हारे घरमें दूसरी स्त्रियाँ भी हैं ही। यदि उसे अपना भक्ष्य बनानेका विचार रहा हो तो आजतक तुमने
राक्षस बोला— राजन्! हमलोग मनुष्यको नहीं खाते। मनुष्यभक्षी राक्षस दूसरे ही हैं। हम तो पुण्यका फल ही खाया करते हैं। इसके सिवा यदि कोई स्त्री या पुरुष हमारा आदर या अनादर कर दे तो हम उसके अच्छे-बुरे स्वभावको भी खा जाते हैं। यदि मनुष्यके क्षमा-स्वभावको हम खा लें तो वे क्रोधी बन जाते हैं और दुष्ट-स्वभावको भक्षण कर लें तो वे उत्तम गुणोंसे सम्पन्न होते हैं। महाराज! मेरे घरमें अनेक युवती स्त्रियाँ हैं, जो रूपमें अप्सराओंकी समानता करनेवाली हैं। उनके रहते हुए मनुष्यकी स्त्रियोंमें मेरा अनुराग कैसे हो सकता है!
राजाने कहा— निशाचर! यदि यह ब्राह्मणी न तो तुम्हारे उपभोगके कामकी है न आहारके तो ब्राह्मणके घरमें प्रवेश करके तुमने इसका अपहरण क्यों किया?
राक्षस बोला— राजन्! वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदमन्त्रोंका