संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन * १५९
होनेके कारण अर्घ्य पानेके अधिकारी हैं तथापि हमलोग आपको अर्घ्यका उत्तम पात्र नहीं मानते।
राजाने पूछा— ब्रह्मन्! मैंने जानकर या अनजानमें ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिससे बहुत दिनोंके पश्चात् आनेपर भी मैं आपसे अर्घ्य पानेका अधिकारी न रहा?
ऋषि बोले— राजन्! क्या आप इस बातको भूल गये कि आपने अपनी पत्नीका वनमें परित्याग किया है और उसके साथ ही आप धर्मको भी छोड़ बैठे हैं? एक पक्षतक भी नित्य-कर्म छोड़ देनेसे मनुष्य अस्पृश्य हो जाता है; फिर आपने तो एक वर्षसे उसको छोड़ रखा है। अतः आपके विषयमें क्या कहना है। नरेश्वर! पतिका स्वभाव कैसा ही हो, पत्नीको उचित है कि वह सदा पतिके अनुकूल रहे। इसी प्रकार पतिका भी कर्तव्य है कि वह दुष्ट स्वभाववाली पत्नीका भी पालन-पोषण करे।* ब्राह्मणकी वह पत्नी जिसका अपहरण हुआ है, सदा पतिके प्रतिकूल ही चलती है तथापि धर्मपालनकी इच्छासे वह आपके पास गया और पत्नीको खोजनेके लिये प्रेरित करता रहा। आप तो धर्मसे विचलित हुए दूसरे-दूसरे मनुष्योंको धर्ममें लगाते हैं; फिर जब आप स्वयं ही विचलित होंगे, तब आपको कौन धर्ममें लगायेगा।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुनिके यों कहनेपर राजा लज्जित हो गये। आपका कहना ठीक है, यों कहकर उन्होंने ब्राह्मणकी पत्नीके विषयमें पूछा—'भगवन्! आप भूत और भविष्यके यथार्थ ज्ञाता हैं। बताइये, ब्राह्मणकी पत्नीको कौन ले गया है?'
ऋषि बोले— राजन्! अद्रिके पुत्र बलाक नामके राक्षसने उसका अपहरण किया है। उत्पलावत वनमें जानेपर आप उस ब्राह्मणकी पत्नीको देख सकेंगे। जाइये, शीघ्र ही उस श्रेष्ठ ब्राह्मणका पत्नीसे संयोग कराइये, जिससे आपकी तरह उसे भी दिनोंदिन पापका भागी न होना पड़े।
तदनन्तर उन महामुनिको प्रणाम करके राजा उत्तम पुनः अपने रथपर आरूढ़ हुए और उनके बताये हुए उत्पलावत वनमें गये। वहाँ उन्होंने ब्राह्मणकी पत्नीको देखा। उसका स्वरूप ठीक वैसा ही था, जैसा कि ब्राह्मणने बतलाया था। वह श्रीफल खा रही थी। राजाने उससे पूछा—'भद्रे! तुम इस वनमें कैसे आयीं? सब बातें स्पष्ट रूपसे बताओ। जान पड़ता है, तुम विशालके पुत्र सुशर्माकी स्त्री हो।'
ब्राह्मणीने कहा— मैं वनवासी ब्राह्मण अतिरात्रकी
* पक्षेण कर्मणो हान्या प्रयत्यस्पृश्यतां नरः। किमुत वार्षिकी यस्य हानिस्ते नित्यकर्मणः॥
पत्यानुकूल्या भार्या स्यादसतोऽपि भर्तुः। दुःशीलापि तथा भार्या पोषणीया नरेश्वर॥ (६१।५८-५९)