भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१५८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


होगा। साथ ही यह भी सूचित कीजिये कि आपकी ब्राह्मणीका स्वभाव कैसा है ?

**ब्राह्मण बोला—**राजन्! मेरी स्त्रीकी दृष्टिसे क्रूरता टपकती है। उसकी कद तो बहुत ऊँची है, किन्तु बाँहें छोटी, मुँह दुबला-पतला और शरीर कुरूप है। यह मैं उसकी निन्दा नहीं करता, ठीक ठीक हुलिया बतलाता हूँ। उसकी बातें बड़ी कड़वी होती हैं तथा स्वभावसे भी वह कोमल नहीं है। उसकी पहली अवस्था कुछ कुछ बीत चुकी है।

**राजाने कहा—**ब्राह्मण! ऐसी स्त्री लेकर क्या करोगे। मैं तुम्हें दूसरी भार्या देता हूँ। अच्छे स्वभावकी स्त्री ही कल्याणमयी एवं सुख देनेवाली होती है। वैसी स्त्री तो केवल दुःखका ही कारण है। रूप और शील दोनोंसे हीन होनेके कारण वह स्त्री त्याग देनेयोग्य है।

**ब्राह्मण बोला—**राजन्! अपनी पत्नीकी रक्षा करनी चाहिये—यह श्रुतिका उत्तम आदेश है। उसकी रक्षा न करनेपर उससे वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। वर्णसंकर अपने पितरोंको स्वर्गसे नीचे गिरा देता है। पत्नी न होनेके कारण मेरे नित्यकर्म छूट रहे हैं। इससे प्रतिदिन धर्ममें बाधा आती है, जिसके कारण मेरा पतन अवश्यम्भावी है। उसके गर्भसे जो मेरी संतति होगी, वह धर्मका पालन करनेवाली होगी। प्रभो! इस प्रकार मैंने अपनी स्त्रीका वृत्तान्त आपके सामने निवेदन किया है। आप उसे लाइये, क्योंकि आप ही प्रजाकी रक्षाके अधिकारी हैं।

ब्राह्मणकी ऐसी बात सुनकर और उसपर भलीभाँति विचार करके राजा उत्तम सब सामग्रियोंसे युक्त अपने विशाल रथपर आरूढ़ हुए और पृथ्वीपर इधर उधर घूमने लगे। एक दिन एक बहुत बड़े वनमें किसी तपस्वीका उत्तम आश्रम दिखायी दिया। तब रथसे उतरकर वे उस आश्रममें गये। वहाँ उन्हें एक मुनिका दर्शन हुआ, जो कुशासनपर विराजमान थे और अपने तेजसे अग्निकी भाँति प्रज्वलित हो रहे थे। राजाको आया देख मुनि शीघ्रतापूर्वक उठकर खड़े हो गये और स्वागतपूर्वक उनका सम्मान करते हुए शिष्यसे बोले, 'अर्घ्य ले आओ।' शिष्यने धीरेसे कहा—'मुने! क्या इन्हें अर्घ्य देना उचित है? इस बातका भलीभाँति विचार करके जैसी आज्ञा दें, उसका पालन करूँ।' तब मुनिने राजाके वृत्तान्तको ध्यानद्वारा जानकर केवल आसन दे बातचीतके द्वारा उनका सत्कार किया।

**ऋषिने पूछा—**राजन्! मैं जानता हूँ, आप महाराज उत्तानपादके पुत्र उत्तम हैं। बताइये, किसलिये यहाँ आये हैं? इस वनमें कौन-सा कार्य सिद्ध करनेका विचार है?

**राजाने कहा—**मुने! एक ब्राह्मणके घरसे किसी अपरिचित व्यक्तिने उसकी स्त्रीको चुरा लिया है। उसीकी खोज करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। इस समय आपसे एक बात पूछता हूँ, कृपा करके बताइये। जब मैं आपके आश्रमपर आया तो प्रथम दृष्टि पड़ते ही आपने मुझे अर्घ्य देनेका विचार किया; किन्तु फिर उसे रोक क्यों दिया?

**ऋषि बोले—**राजन्! आपको देखकर मैंने जल्दीमें अर्घ्य देनेकी आज्ञा प्रदान कर दी थी; किन्तु इस शिष्यने मुझे सावधान किया। मेरे प्रसादसे यह भी मेरी ही भाँति संसारके भूत, भविष्य और वर्तमानका हाल जानता है। इसने कहा, 'विचारकर आज्ञा दीजिये।' तब मैंने भी आपका वृत्तान्त जान लिया। इसीलिये आपको विधिपूर्वक अर्घ्य नहीं दिया। राजन्! इसमें संदेह नहीं कि आप स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न