भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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  • राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन * १५७

राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन

क्रौष्टुकि बोले—ब्रह्मन्! आपने स्वारोचिष मन्वन्तरका वृत्तान्त मुझे विस्तारके साथ सुनाया, साथ ही मेरे प्रश्नके अनुसार आठ निधियोंका भी वर्णन किया। स्वायम्भुव मन्वन्तरका वर्णन तो पहले ही हो चुका है। अब उत्तम नामक तीसरे मन्वन्तरकी कथा सुनाइये।

मार्कण्डेयजीने कहा—राजा उत्तानपादके सुरुचिके गर्भसे एक उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था, जो महान् बलवान् और पराक्रमी था। शत्रु और मित्रमें तथा पुत्र और पराये मनुष्यमें उसका समान भाव था। वह धर्मका ज्ञाता था और दुष्टोंके लिये यमराजके समान भयङ्कर एवं साधु पुरुषोंके लिये चन्द्रमाके समान आनन्ददायी था। राजकुमार उत्तमने बभ्रुकुमारी बहुलाके साथ विवाह किया था। वे सदा उसीमें आसक्त रहते थे। उनका मन और किसी काममें नहीं लगता था, स्वप्नमें भी उनका चित्त बहुलामें ही लगा रहता था। वे सदा रानीकी इच्छाके अनुसार ही चलते थे तो भी वह कभी उनके अनुकूल नहीं होती थी। एक समय दूसरे-दूसरे राजाओंके समक्ष ही रानीने राजाकी आज्ञा माननेसे इन्कार कर दिया। इससे उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे कुपित सर्पकी भाँति फुफकारते हुए द्वारपालसे बोले—'दरबान ! तू इस दुष्टहृदया स्त्रीको निर्जन वनमें ले जाकर छोड़ दे। यह मेरी आज्ञा है, अतः तुझे इसपर कुछ सोच-विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।'

तब राजाकी आज्ञाको अविचारणीय मानकर द्वारपाल रानीको रथपर बिठा वनमें छोड़ आया। राजाके द्वारा इस प्रकार निर्जन वनमें त्यागी जानेपर बहुलाने उनकी दृष्टिसे दूर होनेके कारण अपने ऊपर राजाका बहुत बड़ा अनुग्रह माना। उधर राजा अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते हुए समय व्यतीत करने लगे। एक दिनकी बात है, कोई ब्राह्मण उनके दरबारमें आया और अत्यन्त दुःखितचित्त होकर इस प्रकार कहने लगा।

ब्राह्मण बोला—महाराज! मैं बहुत दुःखी हूँ, मेरी बात सुनिये; क्योंकि राजाके सिवा और किसीसे मनुष्योंकी संकटसे रक्षा नहीं हो सकती। रातको सोते समय मेरे घरका दरवाजा खोले बिना ही कोई मेरी स्त्रीको चुरा ले गया है। आप उसे पता लगाकर ला देनेकी कृपा करें। राजन्! हमारी आय और धर्मका छठा भाग आप वेतनके रूपमें ग्रहण करते हैं, इसलिये आप ही हमलोगोंके रक्षक हैं। आपसे रक्षित होनेके कारण ही मनुष्य रात्रिमें निश्चिन्त होकर सोते हैं।

राजाने पूछा—ब्रह्मन्! आपकी स्त्री शरीरसे कैसी है, यह मैंने कभी नहीं देखा है। उसकी अवस्था क्या है, यह भी आपको ही बतलाना