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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

• राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन • १६९

ज्ञाता हैं। मैं जिस किसी यज्ञमें जाता हूँ, रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ करके वह मुझे दूर भगा देता है। मन्त्रोंद्वारा उसके उच्चाटन करनेसे हमलोग भूखे रह जाते हैं। ऐसी दशामें हम कहाँ जायें। प्रायः सभी यज्ञोंमें वह ऋत्विज बना करता है। इसीलिये हमने उसके सामने यह विघ्न खड़ा किया है; क्योंकि कोई भी पुरुष पत्नीके बिना यज्ञ-कर्म करनेके योग्य नहीं रहता। राजन्! मैं आपका विनीत सेवक हूँ, आपके राज्यकी प्रजा हूँ; अतः आप अपने किसी कार्यके लिये आज्ञा देकर मुझपर कृपा कीजिये।

राजाने कहा—राक्षस! तुम पहले कह चुके हो कि हम मनुष्यके स्वभावको खा जाते हैं; अतः हम तुमसे जो काम कराना चाहते हैं, उसे सुनो। तुम इस ब्राह्मणीकी दुष्टताको भक्षण कर लो, जिससे यह विनयशील हो जाय। इसके बाद इसे इसके घरमें पहुँचा आओ। इतना कर देनेपर मैं समझूँगा कि तुमने अपने घरपर आये हुए मुझ अतिथिका सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर दिया।

राजाके यों कहनेपर वह राक्षस अपनी मायासे ब्राह्मणीके शरीरमें प्रवेश कर गया और अपनी शक्तिसे उसके दुष्ट स्वभावको खा गया। फिर तो ब्राह्मणकी पत्नी भयंकर दुष्टतासे मुक्त हो गयी और राजासे बोली—'महाराज! मुझे अपने ही कर्मके फलसे अपने महात्मा स्वामीसे विलग होना पड़ा है। यह निशाचर तो उसमें निमित्तमात्र बना है। न इसका दोष है, न मेरे महात्मा पतिका दोष है; सब दोष मेरा ही है। क्योंकि मनुष्यको अपनी ही करनीका फल भोगना पड़ता है। पूर्वजन्ममें मैंने किसीका वियोग कराया होगा, वह आज मुझपर भी आ पड़ा है। इसमें दूसरेका क्या दोष है।'

राक्षस बोला—राजन्! आपकी आज्ञाके अनुसार मैं इस ब्राह्मणीको इसके स्वामीके घरपर पहुँचा आता हूँ; इसके सिवा और भी यदि मेरे योग्य कोई कार्य हो तो उसके लिये आज्ञा दीजिये।

राजाने कहा—निशाचर! यह कार्य हो जानेपर मैं समझूँगा कि तुमने मेरा सारा कार्य सिद्ध कर दिया। वीर! यदि किसी कार्यके समय मैं तुम्हारा स्मरण करूँ तो तुम मेरे पास आ जाना।

'बहुत अच्छा' कहकर राक्षसने उस ब्राह्मणपत्नीको, जो दुष्टता दूर हो जानेसे अब अच्छे स्वभावकी हो गयी थी, ले जाकर उसके पतिके घरमें पहुँचा दिया। राजा भी उसे भेजकर मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'अब मैं अपने विषयमें क्या करूँ, क्या करनेसे मेरा भला होगा। महात्मा महर्षिने मुझे अर्ध्यके अयोग्य बतलाया है, यह तो मेरे लिये बड़े कष्टकी बात है। अब मैं क्या करूँ। पत्नीको तो मैंने त्याग दिया, अब उसका पता कैसे लगे अथवा उन ज्ञानचक्षु महर्षिसे ही चलकर पूछूँ।' यों विचारकर राजा फिर रथपर आरूढ़ हुए और उस स्थानपर गये, जहाँ वे त्रिकालवेत्ता धर्मात्मा महामुनि रहते थे। रथसे उतरकर उन्होंने मुनिके पास जा उन्हें प्रणाम किया और राक्षससे मिलने, ब्राह्मणीके दिखायी देने तथा उसकी दुष्टताके दूर होने आदिका सब वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया।

ऋषिने कहा—राजन्! तुमने जो कुछ किया है, वह सब मुझे पहलेसे ही मालूम हो चुका है। मेरे पास तुम जिस कार्यसे आये हो, वह भी मुझसे छिपा नहीं है। मनुष्योंके लिये पत्नी धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धिका कारण है। तुमने उसका त्याग करके विशेषतः धर्मको भी त्याग दिया है। राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र कोई भी क्यों न हो, पत्नीके न होनेपर वह अपने कर्मानुष्ठानके योग्य नहीं रहता। तुमने अपनी

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पत्नीका त्याग करके अच्छा नहीं किया। जैसे स्त्रियोंके लिये पतिका त्याग अनुचित है, उसी प्रकार पुरुषोंके लिये स्त्रीका त्याग भी उचित नहीं है।^*

राजा बोले—भगवन्! क्या करूँ, यह सब मेरे कर्मोंका फल है। मैं सदा पत्नीके अनुकूल ही चलता था, फिर भी वह मेरे अनुकूल न हुई। इसलिये मैंने उसे त्याग दिया। उसके वियोगकी पीड़ासे मेरी अन्तरात्मा व्यथित हो रही है। मैंने उसे वनमें छोड़ा था; पता नहीं वह कहाँ चली गयी। अथवा उसे वनमें सिंह, व्याघ्र या निशाचरोंने तो नहीं खा लिया।

ऋषिने कहा—राजन्! उसे सिंह, व्याघ्र या निशाचरोंने नहीं खाया है। वह इस समय रसातलमें है। उसका चरित्र अभीतक नष्ट नहीं हुआ है।

राजा बोले—ब्रह्मन्! यह तो बड़ी अद्भुत बात है। उसे पातालमें कौन ले गया और वह अबतक दूषित कैसे नहीं हुई है, यह सब यथार्थ रूपसे बतलानेकी कृपा करें।

ऋषिने कहा—पातालमें नागराज कपोत एक विख्यात पुरुष हैं। एक दिन उन्होंने तुम्हारी त्यागी हुई सुन्दरी पत्नीको महान् वनके भीतर भटकते हुए देखा। उसका सारा हाल जानकर वे उसपर आसक्त हो गये और उसे पाताललोकमें ले गये। नागराज कपोतके नन्दा नामकी एक पुत्री तथा मनोरमा नामकी स्त्री है। नन्दाने बहुलाको देखकर सोचा, 'हो-न-हो यह मेरी माताकी सौत बननेवाली है।' यो विचारकर वह उसे अपने घरमें ले गयी और अन्तःपुरमें छिपाकर रख दिया। कपोतने जब-जब नन्दासे बहुलाको माँगा, तब-तब उसने उनको कोई उत्तर नहीं दिया। तब पिताने उसे शाप दे दिया—'जा, तू गूँगी हो जायगी।' इस प्रकार शापग्रस्त होकर नन्दा उसके साथ रहती है। नागराज उसे ले गये और उसकी कन्याने उसे अपने संरक्षणमें रख लिया।

राजा बोले—महामुने! मुझे तो बहुला प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है; किन्तु वह मेरे प्रति सदा दुष्टताका ही बर्ताव करती है। इसका क्या कारण है?

ऋषिने कहा—पाणिग्रहणके समय सूर्य, मंगल और शनैश्चरकी तुम्हारे ऊपर तथा शुक्र और बृहस्पतिकी तुम्हारी पत्नीके ऊपर दृष्टि थी। उस मुहूर्त्तमें उसपर चन्द्रमा और बुध भी, जो परस्पर शत्रुभाव रखनेवाले हैं, अनुकूल थे और तुम्हारे ऊपर प्रतिकूल। इसीलिये तुम्हें पत्नीकी प्रतिकूलताका विशेष कष्ट सहना पड़ा है। अच्छा, अब जाओ; धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करो और पत्नीके साथ रहकर सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान करो।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—महर्षिके यों कहनेपर राजा उन्हें प्रणाम करके रथपर आरूढ़ हुए और अपने नगरको लौट आये। वहाँ आनेपर उन्होंने उस ब्राह्मणको देखा, जो अपनी शीलवती भार्याके साथ बहुत प्रसन्न था।

ब्राह्मणने कहा—नृपश्रेष्ठ! आप धर्मके ज्ञाता हैं। आपने मेरी पत्नीको लाकर मेरे धर्मकी रक्षा की है। इससे मैं कृतार्थ हो गया।

राजा बोले—द्विजश्रेष्ठ! आप तो अपने धर्मका पालन करके कृतार्थ हो रहे हैं, किन्तु मैं संकटमें पड़ा हूँ; क्योंकि मेरी पत्नी घरमें नहीं है।

ब्राह्मणने कहा—महाराज! यदि आपकी पत्नी जीवित है और व्यभिचारिणी नहीं हुई है तो आप स्त्रीके बिना रहकर पाप क्यों कमा रहे हैं।


^* त्यजता भवता पत्नी न शोभनमनुष्ठितम्। आचार्यो हि यथा भर्ता स्त्रीणां भार्या तथा नृणाम्॥ (७१।११)

  • राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन * १६३

जाग्रत् हो गया है, तब उसने राजासे कहा—'महाराज! अब आप अपनी प्रिय पत्नीको अपने साथ रखिये और उसके साथ उत्तम भोग भोगते हुए श्रद्धापूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये।'

ब्राह्मणकी बात सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने उस महापराक्रमी सत्यप्रतिज्ञ निशाचरको स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वह राक्षस राजाके पास आ पहुँचा और प्रणाम करके बोला—'क्या आज्ञा है?' तब राजाने विस्तारके साथ अपना सारा वृत्तान्त निवेदन किया। फिर वह राक्षस पातालमें जाकर रानीको ले आया। आनेपर उसने हार्दिक अनुरागके साथ पतिको देखा और बड़ी प्रसन्नताके साथ बारंबार कहा—'मुझपर प्रसन्न होइये।' तब राजाने अपनी मानिनी स्त्रीको हृदयसे लगाकर कहा—'प्रिये! तुम बार-बार मुझसे ऐसा क्यों कहती हो। मैं तो तुमपर प्रसन्न ही हूँ।'

रानी बोली—महाराज! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक याचना करती हूँ; आप उसे पूर्ण करके मेरा आदर कीजिये।

राजा बोले—ब्रह्मन्! यदि मैं पत्नीको लाऊँ भी तो वह सदा मेरे प्रतिकूल रहती है; अतः उससे दुःख ही मिलेगा, सुख नहीं। क्योंकि वह मुझसे मैत्री नहीं रखती। आप कोई ऐसा यत्न करें जिससे वह मेरे अधीन हो जाय।

ब्राह्मणने कहा—राजन्! आपके प्रति रानीका प्रेम होनेके लिये श्रेष्ठ यज्ञ करना उपकारक होगा; अतः मित्रकी कामना रखनेवाले लोग जिसका अनुष्ठान किया करते हैं, वह मित्रविन्दानामक यज्ञ मैं आरम्भ करता हूँ। राजन्! जिन स्त्री-पुरुषोंमें परस्पर प्रेम न हो, उनमें मित्रविन्दा प्रेम उत्पन्न करती है। इसलिये आपके कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे मैं उसीका अनुष्ठान करूँगा।

ब्राह्मणके यों कहनेपर राजाने यज्ञकी सब सामग्री एकत्रित करायी और उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने मित्रविन्दा-यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया। उसने राजाकी स्त्रीमें प्रेम उत्पन्न करनेके लिये एक-एक करके सात यज्ञ किये। जब उसे यह निश्चय हो गया कि रानीके हृदयमें राजाके प्रति मित्रभाव राजाने कहा—प्रिये! तुम्हें जो कुछ भी अभीष्ट हो, वह निःशङ्क होकर कहो। तुम्हारे लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। मैं तुम्हारे अधीन हूँ।

रानी बोली—नाथ! मेरे लिये नागराजने मेरी सखीको शाप दे दिया, जिससे वह गूँगी हो गयी है। यदि आप मेरे प्रेमवश उसके संकटका निवारण कर सकें तो उसकी मूकता दूर करनेके लिये प्रयत्न कीजिये। यदि ऐसा हो गया तो मैं समझूँगी, मेरा सब कार्य सिद्ध हो गया।

तब राजाने उस ब्राह्मणको बुलाकर पूछा—'विप्रवर! इसमें कैसी क्रिया होनी चाहिये, जो उसकी मूकता दूर कर सके?'

ब्राह्मण बोला—राजन्! मैं आपके कहनेसे सारस्वती इष्टि करूँगा, जिससे आपकी वे महारानी

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अपनी सखीकी वाक्शक्तिको कार्यक्षम बनाकर उसके ऋणसे उऋण हो जायँ।

तदनन्तर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने सारस्वती इष्टि आरम्भ की। उसने नन्दाकी मूकता दूर करनेके लिये एकाग्रचित्त होकर सारस्वत सूक्तोंका जप किया। इससे वह नागकन्या बोलने लगी। उन दिनों गर्गमुनि रसातलमें रहा करते थे। उन्होंने नन्दाको बताया, 'तुम्हारी सखी बहुलाके पतिने यह अत्यन्त दुष्कर उपकार किया है।' यह बात जानकर शीघ्रगामिनी नन्दा राजाके नगरमें आयी और अपनी सखी महारानी बहुलाको छातीसे लगाकर तथा राजाकी भी बारंबार प्रशंसा करके आसनपर बैठकर मधुर वाणीमें बोली—'वीर!

आपने इस समय मेरा जो उपकार किया है, इससे मेरा हृदय आकृष्ट हो गया है। अतः मैं जो कहती हूँ, उसे सुनो। राजन्! तुम्हें एक महापराक्रमी पुत्र प्राप्त होगा और इस पृथ्वीपर उसका अखण्ड राज्य रहेगा। वह सब शास्त्रोंका ज्ञाता, धर्मपरायण, बुद्धिमान् एवं मन्वन्तरका स्वामी मनु होगा।

राजाको इस प्रकार वर देकर नागराज-कन्या नन्दा अपनी सखीको हृदयसे लगा पाताललोकको चली गयी। तदनन्तर रानीके साथ विहार एवं प्रजापालन करते हुए राजा उत्तमके कितने ही वर्ष व्यतीत हो गये। फिर महात्मा राजाको रानी बहुलाके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पूर्णिमाके पूर्ण चन्द्रकी भाँति कान्तिमान् था। उसके जन्म लेनेपर समस्त प्रजाको महान् आनन्द हुआ। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उसे देखकर मुनियोंने कहा—'यह राजा उत्तमके वंशमें और उत्तम समयमें उत्पन्न हुआ है तथा इसका प्रत्येक अङ्ग उत्तम है; इसलिये यह औत्तम नामसे विख्यात होगा।'

इस प्रकार राजा उत्तमका पुत्र औत्तम नामक मनु हुआ। अब उसके प्रभावका वर्णन सुनो। जो राजा उत्तमके उपाख्यान और औत्तमके जन्मकी कथा प्रतिदिन सुनता है, उसका कभी किसीसे द्वेष नहीं होता। इस चरित्रको सुनने और पढ़नेवालेका कभी प्रिय पत्नी, पुत्र अथवा बन्धुओंसे वियोग नहीं होता। औत्तम मन्वन्तर तीसरा कहा जाता है। उसमें स्वधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन तथा वशवर्ती—ये देवताओंके पाँच गण थे। इनका जैसा नाम, वैसा ही गुण था। ये पाँचों देवगण यज्ञभोगी माने गये हैं। ये सभी गण बारह-बारह व्यक्तियोंके समुदाय हैं। उक्त मन्वन्तरमें सुशान्ति नामक इन्द्र हुए, जो सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इन्द्रपदको प्राप्त हुए थे। आज भी मनुष्य विघ्नोंका नाश करनेके लिये सुशान्तिके नामाक्षरोंसे विभूषित एक गाथाका गान किया करते हैं। वह इस प्रकार है—

सुशान्तिर्देवराट् कान्तः सुशान्तिं संप्रयच्छति।
सहितः शिवसत्याद्यैस्तथैव वशवर्त्तिभिः॥

• तामस मनुकी उत्पत्ति तथा मन्वन्तरका वर्णन • १६५


'शिव, सत्य एवं वशवर्ती आदि देवगणोंके साथ परम सुन्दर देवराज सुशान्ति उत्तम शान्ति प्रदान करते हैं।'

मार्कण्डेयजी कहते हैं—उत्तम मनुके अज, परशुचि और दिव्य—ये तीन पुत्र थे, जो देवताओंके समान तेजस्वी तथा महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न थे। उनके मन्वन्तरमें उन्हींके वंशज इस पृथ्वीका पालन करते रहे। इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है, यह बात पहले बतलायी जा चुकी है। महात्मा वसिष्ठके सात पुत्र ही इस तीसरे मन्वन्तरमें सप्तर्षि थे। इस प्रकार यह तीसरे मन्वन्तरका वर्णन हुआ। अब तामस मनुके चौथे मन्वन्तरका वर्णन किया जाता है। यद्यपि तामस मनुका जन्म मनुष्येतर योनिमें हुआ था तो भी उन्होंने अपने यशसे त्रिभुवनको आलोकित कर दिया था। ब्रह्मन्! अन्य सभी मनुओंकी भाँति चौथे मनुका जन्म भी अलौकिक है। उसे बतलाता हूँ, सुनो।


तामस मनुकी उत्पत्ति तथा मन्वन्तरका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! इस पृथ्वीपर स्वराष्ट्र नामक एक विख्यात राजा हो गये हैं, जो बड़े पराक्रमी थे। उन्होंने अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और वे संग्राममें कभी पीठ नहीं दिखाते थे। राजाके मन्त्रीकी आराधनासे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने राजाको बहुत बड़ी आयु प्रदान की थी। राजाके सौ स्त्रियाँ थीं, किन्तु वे उनकी भाँति बड़ी आयुसे युक्त न होनेके कारण समयानुसार मृत्युको प्राप्त हुईं। इसी प्रकार धीरे-धीरे राजाके मन्त्री और सेवक भी कालके गालमें चले गये। उन सबके अभावमें राजाका चित्त उद्विग्न रहने लगा। प्रतिदिन उनकी शक्ति क्षीण होने लगी। उन्हें वीर्यसे हीन एवं दुखी जानकर विमर्द नामके एक राजाने आक्रमण किया और उनको राज्यच्युत कर दिया। राज्यसे च्युत होनेपर वे विरक्त हो वनमें चले गये और वितस्ता (झेलम) नदीके तटपर रहकर तपस्या करने लगे। वे गर्मीमें पञ्चाग्नि सेवन करते, बरसातमें मैदानमें रहकर वर्षाके जलको शरीरपर सहते और जाड़ेकी ऋतुमें पानीके भीतर शयन करते, निराहार रहते एवं उत्तम व्रतोंका पालन करते। एक बार वर्षाकालमें जब कि वे तपस्या कर रहे थे, लगातार कई दिनोंतक वृष्टि होती रही। इससे बाढ़ आ गयी। राजा भी जलकी प्रखर धारामें बह गये। चारों ओर अन्धकार छा रहा था। जलमें बहते-बहते उन्हें संयोगवश एक हरिणी मिल गयी। उन्होंने उसकी पूँछ पकड़ ली, फिर उस प्रवाहके साथ बहते और अन्धकारमें इधर-उधर भटकते हुए राजा किसी तरह तटपर पहुँचे। वहाँ भी बहुत दूरतक कीचड़ थी, जिसको पार करना अत्यन्त ही कठिन था; तथापि वे हरिणीकी पूँछसे खिंचते हुए उस कीचड़से पार हो एक वनमें जा पहुँचे। हरिणीके स्पर्शसे उन्हें आनन्दका अनुभव होने लगा। उस अन्धकारमें भ्रमण करते हुए वे कामदेवके वशीभूत हो गये। राजाको अनुरागवश अपनी पीठका स्पर्श करते जान उस वनके भीतर मृगीने कहा—'राजन्! आप काँपते हुए हाथोंसे मेरी पीठका स्पर्श क्यों करते हैं? आपके कार्यकी सिद्धि तो किसी और ही प्रकारसे हो गयी है।'

राजा राजाने पूछा—मृगी! तू कौन है? और मनुष्यकी तरह कैसे बोलती है?

मृगी बोली—राजन्! मैं पहले आपकी प्यारी

३६६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पत्नी थी। मेरा नाम उत्पलावती था। मैं दृढ़धन्वाकी पुत्री और आपकी सौ रानियोंमें प्रधान थी।

राजाने पूछा—उत्पलावती तो बड़ी पतिव्रता और धर्मपरायणा थी। वह ऐसी किस प्रकार हुई? उसने कौन-सा ऐसा कर्म किया था, जिससे उसे मृगीकी योनिमें आना पड़ा।

मृगी बोली—राजन्! मैं बाल्यावस्थामें जब पिताके घरपर थी, सखियोंके साथ एक दिन वनमें घूमने गयी थी। वहाँ मैंने मृगीके साथ समागम करते हुए एक मृगको देखा। मैं उसके बिलकुल निकट थी, अतः मैंने उस मृगीको मारा। मुझसे डरकर वह मृगी अन्यत्र चली गयी। तब मृगने कुपित होकर कहा—'ओ मूर्खे! तू क्यों इतनी मतवाली हो रही है, तेरी इस दुष्टताको धिक्कार है।' उस मृगकी मनुष्यके समान वाणी सुनकर मैं डर गयी और बोली—'तुम कौन हो?' उसने उत्तर दिया—'मैं निशीतिचक्षु नामक मुनिका पुत्र हूँ। मेरा नाम सुतपा है। मृगीसे सम्भोग करनेकी इच्छा होनेके कारण मैं मृग हो गया। प्रेमवश मैंने इस मृगीका अनुसरण किया था और इसने भी मेरी अभिलाषा की थी; परन्तु तूने आकर मुझसे उसका वियोग करा दिया, इसलिये मैं तुझे अभी शाप देता हूँ।' मैंने कहा—'मुने! मैंने अनजानमें आपका अपराध किया है, अतः कृपा करके मुझे शाप न दीजिये।' मेरे यों कहनेपर वे मुनि इस प्रकार बोले—'यदि तुझे अपनेको दे सकूँ—तेरे गर्भसे पुत्र उत्पन्न कर सकूँ तो तुझे शाप नहीं दूँगा।' मैंने कहा—'मैं न तो मृगी हूँ और न वनमें मृगीका रूप धारण करके ही घूमती हूँ; अतः मेरी ओरसे अपना मन हटा लीजिये। आपको दूसरी कोई मृगी मिल जायगी।' मेरी यह बात सुनकर मुनिकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उनका ओठ काँपने लगा। वे बोले—'ओ नादान! तू कहती है मैं मृगी नहीं हूँ तो ले तू मृगी ही हो जायगी।' तब मैं अत्यन्त दुःखित हो मुनिको प्रणाम करके बोली—'मुने! मुझपर प्रसन्न होइये। मैं अभी बालिका हूँ। बोलनेका ढंग नहीं जानती। मुनिवर! पिताके न रहनेपर ही स्त्री स्वयं अपना पति चुनती है। मेरे पिताजी तो अभी जीवित हैं, फिर कैसे मैं आपका वरण कर सकती हूँ।^* अथवा सारा अपराध मेरा ही है, फिर भी आप प्रसन्न होइये। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ।' तब मुनिश्रेष्ठ सुतपाने कहा—'मेरी बात झूठी नहीं हो सकती। तू मरनेपर इसी वनमें मृगी होगी। उस समय सिद्धाबीर्य मुनिके पुत्र महाबाहु लोल तेरे गर्भमें आयेंगे। उनके गर्भमें आते ही तुझे अपने पूर्वजन्मका स्मरण होगा, फिर स्मरण-शक्ति प्राप्त करके तू मानवीकी भाँति बोलने लगेगी। उस गर्भके उत्पन्न होनेपर तू मृगीके शरीरसे मुक्त हो जायगी और पतिसे समादृत हो उन लोकोंमें जायगी, जहाँ कुकर्मी मनुष्य कदापि नहीं जा सकते। लोल भी बड़े पराक्रमी होंगे और अपने पिताके शत्रुओंको मारकर सारी पृथ्वी अपने अधिकारमें कर लेंगे। तत्पश्चात् वे मनुके पदपर प्रतिष्ठित होंगे।' इस प्रकार शाप मिलनेपर मैं तिर्यग्योनिमें आयी हूँ। आपके शरीरका स्पर्श होनेमात्रसे मेरे उदरमें गर्भ स्थापित हो गया है।

मृगीके यों कहनेपर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सोचा—'मेरा पुत्र मेरे शत्रुओंको परास्त करके इस पृथ्वीपर मनु होगा, यह कितने आनन्दकी बात है।' तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् मृगीने उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया।


^* पितुर्व्यतीते ह्यभिधीयते हि पतिः स्वयम्। मयि ताते कथं चाहं वृणोमि मुनिसत्तम। (७४। ३४-३५)

• रैवत मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन • १६७

उसके उत्पन्न होनेपर सम्पूर्ण भूत आनन्दका अनुभव करने लगे। विशेषतः राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। मृगी भी शापसे छूटकर उत्तम लोकोंको चली गयी। तदनन्तर सब ऋषियोंने आकर उसकी भावी समृद्धि देख उस बालकका नामकरण किया—'तापसी योनिमें पड़ी हुई माताके गर्भसे इसका जन्म हुआ है, इसलिये यह बालक संसारमें तामस नामसे विख्यात होगा।' तत्पश्चात् पिता अपने पुत्र तामसका लालन-पालन करने लगे। जब तामसको कुछ समझ हुई तो उसने पितासे पूछा—'तात ! आप कौन हैं ? मैं आपका पुत्र किस प्रकार हुआ ? मेरी माता कौन हैं और आप किसलिये यहाँ आये हैं ? यह सब सच-सच बताइये।'

तब पिताने अपने राज्यसे च्युत होने आदिसे लेकर सब वृत्तान्त पुत्रको बतलाया। ये सब बातें सुनकर तामसने भगवान् सूर्यकी आराधना की और उनसे उपसंहारसहित सम्पूर्ण दिव्य अस्त्र प्राप्त किये। अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता होकर उसने सम्पूर्ण शत्रुओंको परास्त किया और उन्हें पिताके पास ले आकर उनकी आज्ञा मिलनेपर छुटकारा दिया। वह सदा अपने धर्मके पालनमें लगा रहता था। उसके पिता भी शरीर त्यागनेके पश्चात् तप और यज्ञसे उपार्जित पुण्यलोकोंमें गये। सारी पृथ्वीको जीतकर तामस राजा हुआ और फिर मनुके पदपर प्रतिष्ठित हुआ। अब तामस मन्वन्तरका वर्णन सुनो। उसमें सत्य, सुधी, स्वरूप और हरि—ये चार देवगण हुए। इनमेंसे एक-एक गणमें सत्ताईस-सत्ताईस देवता हैं। उन देवताओंके इन्द्रका नाम शिखी था। वे अत्यन्त बली और महापराक्रमी थे। उन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस पदको प्राप्त किया था। ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वलक और पीवर—ये ही सात उस समयके सप्तर्षि थे। नर, क्षान्ति, शान्त, दान्त, जानु और जङ्घ आदि महाबली राजा तामस मनुके पुत्र थे।

रैवत मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! पाँचवें मनुका नाम रैवत था। उनकी उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें ऋतवाक् नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे। उनके बहुत समयतक कोई पुत्र नहीं हुआ। दीर्घ कालके पश्चात् हुआ भी तो रेवती नक्षत्रके अन्तिम चरणमें उसका जन्म हुआ। उन्होंने बालकके जातकर्म आदि संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये। उपनयन आदि भी कराये, किन्तु वह सुशील न हो सका। जबसे उसका जन्म हुआ, तभीसे वे महर्षि भी दीर्घकालव्यापी रोगसे ग्रस्त हो गये। उसकी माता भी कोढ़ आदिसे पीड़ित हो बहुत दुःख उठाने लगी। बालकके पिता अत्यन्त दुःखी होकर सोचने लगे—'यह कैसा अनर्थ प्राप्त हुआ !' उधर उस दुष्टबुद्धिवाले पुत्रने दूसरे मुनिकुमारकी स्त्रीका अपहरण कर लिया। इससे खिन्नचित्त होकर ऋतवाक्‌ने कहा—'मनुष्योंका बिना पुत्रके रहना अच्छा है; किन्तु कुपुत्रका होना कदापि उत्तम नहीं है। कुपुत्र तो पिता-माताके हृदयको सदा ही सालता रहता है और स्वर्गमें गये हुए पितरोंको भी नरकमें गिरा देता है। वह तो केवल माता-पिताको दुःख देनेके लिये ही होता है। उस पापात्मा पुत्रके जन्मको धिक्कार है। जिनके पुत्र सब लोगोंके प्रिय, परोपकारी, शान्त तथा उत्तम कर्मोंमें लगे रहनेवाले होते हैं, वे ही धन्य हैं। मुझे इस जन्ममें कुपुत्रके कारण सुख नहीं मिला और परलोकसे विमुख होना पड़ा।

१६८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


कुपुत्रका आश्रय लेनेवाला मेरा यह अधम जन्म केवल नरकमें ले जानेवाला है, उत्तम गतिकी प्राप्ति करानेवाला नहीं।'

इस प्रकार अत्यन्त दुष्ट पुत्रके दुराचारोंसे ऋतवाक् मुनिका हृदय जलने लगा। उन्होंने गर्गमुनिसे इसका कारण पूछा।

ऋतवाक् बोले—महामुने! पूर्वकालमें उत्तम ऋतका पालन करते हुए मैंने सब वेदोंका विधिपूर्वक अध्ययन किया और उन्हें समाप्त करके वैदिक विधिके अनुसार स्त्रीके साथ विवाह किया; फिर स्त्रीको साथ रखकर वेदों और स्मृतियोंमें बताये हुए सभी कर्तव्य कर्मोंका अनुष्ठान किया। आजतक किसी भी क्रियाके अनुष्ठानमें न्यूनता नहीं आने दी। मुने! 'पुम्' नामके नरकसे डरते हुए मैंने गर्भाधानकी विधिसे पुत्रोत्पत्तिके उद्देश्य रखकर स्त्रीके साथ समागम किया है, कामोपभोगके लिये नहीं। वह सब होनेपर भी ऐसे कुपुत्रका जन्म क्यों हुआ? क्या वह मेरे दोषसे अथवा अपने दोषसे उत्पन्न हुआ है, जो अपनी दुष्टतासे हमारे लिये दुःखदायी और बन्धुजनोंके लिये शोककारक हो गया है?

गर्गने कहा—मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारा यह पुत्र रेवती नक्षत्रके अन्तिम चरणमें उत्पन्न हुआ है, अतः दूषित समयमें जन्म ग्रहण करनेके कारण यह तुम्हारे लिये दुःखदायी हो गया है।

ऋतवाक् बोले—मेरे एक ही पुत्र था तो भी रेवती नक्षत्रके अन्तिम भागमें उत्पन्न होनेके कारण इसमें ऐसी दुष्टता आ गयी; इसलिये रेवतीका शीघ्र ही पतन हो जाय।

मुनिके इस प्रकार शाप देते ही रेवती नक्षत्र आकाशसे गिरा। सारा संसार चकितचित्त होकर यह दृश्य देख रहा था। वह नक्षत्र कुमुदगिरिके चारों ओर गिर पड़ा। वहाँके वन, गुफाएँ तथा झरने आदि सहसा उद्भासित हो उठे। रेवती नक्षत्रके गिरनेसे कुमुदगिरिका नाम रैवतक पर्वत हो गया। उस नक्षत्रकी जो कान्ति थी, वह कमलमण्डित सरोवरके रूपमें प्रकट हुई। उस समय उस सरोवरसे एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याका प्रादुर्भाव हुआ। वह रेवतीकी कान्तिसे प्रकट हुई थी, इसलिये प्रमुच मुनिने उसे देखकर उसका नाम रेवती रख दिया। वह उनके आश्रमके पास ही प्रकट हुई थी, इसलिये वे ही पिताकी भाँति उसका पालन-पोषण करने लगे। जब कन्या यौवनावस्थामें पदार्पण कर चुकी, तब प्रमुच मुनि उसके लिये योग्य वर पूछनेके विचारसे अग्निशालामें गये। उनके प्रश्न करनेपर अग्निदेवने उत्तर दिया—'इस कन्याके स्वामी राजा दुर्गम होंगे, जो महाबली, महापराक्रमी, प्रियवक्ता और धर्मवत्सल हैं।'

इसी बीचमें मृगयाके प्रसङ्गसे राजा दुर्गम मुनिके आश्रमपर आ पहुँचे। वे प्रियव्रतके वंशमें उत्पन्न अत्यन्त बलवान् और पराक्रमी थे। उनके

  • रैवत मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन * १६९

पिताका नाम विक्रमशील था और वे कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। आश्रममें पहुँचनेपर जब उन्हें ऋषि नहीं दिखायी दिये, तब उन्होंने रेवतीको 'प्रिये' कहकर सम्बोधित किया और पूछा—'सुन्दरी! बताओ तो सही, मुनिश्रेष्ठ प्रमुच इस आश्रमसे कहाँ गये हैं? मैं उन्हें प्रणाम करना चाहता हूँ।'

मुनि अग्निशालामें बैठे हुए थे, वहींसे राजाका वार्तालाप और 'प्रिये' सम्बोधन सुनकर वे तुरंत ही बाहर निकले। उन्होंने देखा, राजोचित चिह्नोंसे युक्त महात्मा राजा दुर्गम विनीत भावसे सामने खड़े हैं। उन्हें देखकर मुनिने गौतम नामक शिष्यसे कहा—'गौतम! इन महाराजके लिये अर्घ्य लाओ।' राजा अर्घ्य स्वीकार करके जब आसनपर विराजमान हुए, तब महामुनि प्रमुचने स्वागतपूर्वक पूछा—'राजन्! आपके घर, सेना, खजाना, मित्र, भृत्य, मन्त्री तथा शरीरकी कुशल तो है न?'

राजाने कहा—सुव्रत! आपकी कृपासे मेरे यहाँ सब कुशलसे हैं, कहीं भी कुशलका अभाव नहीं है।

ऋषि बोले—राजन्! मेरे यहाँ एक कन्या है। इसके लिये वर ढूँढ़नेकी इच्छासे मैंने अग्निदेवसे पूछा था—'इसका पति कौन होगा?' अग्निदेवने कहा—'राजा दुर्गम ही इसके स्वामी होंगे।' इसलिये अब आप मेरी दी हुई इस कन्याको ग्रहण करें। आपने भी 'प्रिये' कहकर इसको सम्बोधित किया है, अतः अब क्यों विचार करते हैं।

मुनिकी बात सुनकर राजा दुर्गम मौन रह गये। तब महर्षि प्रमुच अपनी कन्याका वैवाहिक कार्य सम्पन्न करनेको उद्यत हुए। अपने विवाहके लिये पिताको उद्यत देख कन्याने विनयसे मस्तक झुकाकर कहा—'पिताजी! यदि आपका मुझपर प्रेम है तो कृपा करके मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही कीजिये।'

ऋषि बोले—भद्रे! ऋतवाक् नामसे विख्यात तपस्वी मुनिने रेवती नक्षत्रपर क्रोध करके उसे नक्षत्रमण्डलसे नीचे गिरा दिया है।

कन्याने कहा—पिताजी! क्या ऋतवाक् मुनिने ही ऐसी तपस्या की है, आपने नहीं? यदि आप भी तपस्वी हैं तो रेवती नक्षत्रको पुनः आकाशमें स्थापित कीजिये। आप उसी नक्षत्रमें मेरा विवाह क्यों नहीं करते?

ऋषि बोले—भद्रे! तेरा कल्याण हो, अब तू प्रसन्न हो जा। मैं तेरे लिये रेवती नक्षत्रको पुनः चन्द्रमाके मार्गमें स्थापित करता हूँ।

तदनन्तर महामुनि प्रमुचने अपनी तपस्याके प्रभावसे रेवती नक्षत्रको पुनः पहलेकी ही भाँति चन्द्रमण्डलसे संयुक्त कर दिया। फिर उसी नक्षत्रमें वैदिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए कन्याका विधिपूर्वक विवाह किया और प्रसन्न होकर अपने

१७७ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

जामातासे कहा—'राजन्! बताइये, मैं इस विवाहमें दहेजके रूपमें आपको क्या दूँ? मेरी तपस्या अप्रतिहत है। मैं आपको दुर्लभ वस्तु भी दे सकता हूँ।'

राजा ने कहा—मुने! मेरा जन्म स्वायम्भुव मनुके वंशमें हुआ है। अतः मैं आपकी कृपासे ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो मन्वन्तरका स्वामी हो।

ऋषि बोले—राजन्! तुम्हारी यह कामना पूर्ण होगी। तुम्हारा पुत्र मनु होकर सम्पूर्ण पृथ्वीका उपभोग करेगा और धर्मका ज्ञाता होगा।

तब राजा उस स्त्रीको साथ ले अपने नगरको चले गये। उनसे रेवतीके गर्भसे रैवतका जन्म हुआ, जो सब धर्मोंसे सम्पन्न और मनुष्योंसे अजेय थे। वे सब शास्त्रोंके ज्ञाता और वेदविद्याके विशारद थे। उनके मन्वन्तरमें सुमेधा, भूपति, वैकुण्ठ और अमिताभ—ये चार देवगण थे। इनमेंसे प्रत्येक गणमें चौदह-चौदह देवता थे। इन चारों देवगणोंके स्वामी विभु नामक इन्द्र थे, जिन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस पदको प्राप्त किया था। हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य, महामुनि तथा वेद-वेदांगोंके पारगामी महाभाग वसिष्ठ—ये सात रैवत मन्वन्तरके सप्तर्षि थे। बलबन्धु, महावीर्य, सुद्युम्न तथा सत्यक आदि रैवत मनुके पुत्र थे।


चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! यह मैंने तुम्हें पाँचवें मन्वन्तरकी कथा सुनायी है। अब चाक्षुष मनुके छठे मन्वन्तरका वृत्तान्त सुनो। ब्रह्मन्! वे पूर्वजन्ममें ब्रह्माजीके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे, इसलिये इस जन्ममें भी उनका नाम चाक्षुष ही हुआ। यद्यपि महात्मा अनमित्रकी पत्नी भद्राने एक पुत्रको जन्म दिया, जो बहुत ही विद्वान्, पवित्र, पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला और समर्थ था। उस पुत्रको गोदमें लेकर माता बारंबार पुचकारती, प्यारसे बुलाती और स्नेहवश छातीसे चिपका लेती थी; किन्तु वह तो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला था, अतः माताकी गोदमें पड़ा-पड़ा हँसने लगा। इसपर माता बोली—'बेटा! यह क्या? मैं तो डर गयी हूँ; तुम्हारे मुखपर यह हास्य कैसा? क्या तुम्हें असमयमें ही बोध हो गया? क्या तुम कोई शुभ देख रहे हो?'

पुत्र बोला—माँ! क्या तुम नहीं देखती, सामने जो यह बिल्ली खड़ी है मुझे खा जाना चाहती है। दूसरी ओर जातहारिणी मुझे हड़प लेनेको तैयार है। यह अदृश्यभावसे खड़ी है। इधर तुम पुत्र-प्रेमके कारण अत्यन्त स्नेहवश मेरी ओर देखती, बारंबार मुझे बुलाती और छातीसे लगाती हो। तुम्हारे शरीरमें रोमाञ्च हो आता है। वात्सल्य-स्नेहके कारण तुम्हारे नेत्र आँसुओंसे भीग रहे हैं। यही सब देखकर मुझे हँसी आ गयी। जैसे ये दोनों स्वार्थवश स्निग्ध हृदयसे मेरी ओर देखती हैं, उसी प्रकार तुम भी स्वार्थको लेकर ही मुझसे स्नेह करती जान पड़ती हो। अन्तर इतना ही है कि बिल्ली और जातहारिणी तो मुझे अभी खा जाना चाहती हैं और तुम धीरे-धीरे मुझसे प्राप्त होनेवाले उपभोगयोग्य फलकी कामना रखती हो।

माताने कहा—बेटा! मैं उपकारके लिये नहीं, प्रेमके कारण ही तुम्हें छातीसे लगाती हूँ। यदि इससे तुम्हें प्रसन्नता नहीं होती तो इसका

  • चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन * १७१

अर्थ यह है कि तुमने मुझे त्याग दिया। लो, तुमसे प्राप्त होनेवाले स्वार्थका मैंने परित्याग कर दिया।

यों कहकर वह बालकको वहीं छोड़ सूतिका गृहसे बाहर निकल गयी। उसी समय जातहारिणीने उस शुद्धात्मा बालकको हड़प लिया और उसे ले जाकर राजा विक्रान्तकी पत्नीके शयन-गृहमें सुला दिया। फिर रानीके नवजात पुत्रको ले जाकर दूसरेके घरमें रख दिया और उसके बालकको ले जाकर अपना ग्रास बना लिया। इस प्रकार नवजात शिशुओंको चुरानेवाली वह क्रूर राक्षसी तीसरे घरके बालकको खा लिया करती थी। बालकोंके चुराने और बदलनेका काम वह प्रतिदिन करती थी। राजा विक्रान्तने अपने घरमें आये हुए बालकका क्षत्रियोचित संस्कार कराया और बड़ी प्रसन्नताके साथ नामकरण-संस्कारकी विधि पूरी करके उसका नाम आनन्द रखा। जब बालक कुछ बड़ा हुआ, तब उसका उपनयन-संस्कार करते समय आचार्यने कहा—'वत्स ! पहले अपनी माँके पास जाकर उन्हें प्रणाम करो।' गुरुकी बात सुनकर बालक हँस पड़ा और बोला—'गुरुदेव ! मैं किस माताको प्रणाम करूँ—जन्म देनेवाली अथवा पालन करनेवालीको ? मैं राजा अनमित्रके घरमें उनकी धर्मपत्नी गिरिभद्रा देवीके गर्भसे उत्पन्न हुआ; किन्तु जातहारिणी मुझे उठा ले आयी और यहाँ हैमिनीके पास छोड़कर इसके पुत्रको स्वयं उठा ले गयी। फिर उसे भी विप्रवर घोषके गृहमें ले जाकर उसने रख दिया और उनके पुत्रको हड़पकर भक्षण कर लिया। रानी हैमिनीका पुत्र वहाँ ब्राह्मणोचित संस्कारोंके साथ पालित हो रहा है और मेरा यहाँ आप संस्कार करा रहे हैं। मुझे आपकी आज्ञाका पालन करना है; अतः बताइये, किस माताके पास प्रणाम करनेके लिये जाऊँ ?'

गुरु बोले—बेटा ! यह बड़ा गहन संकट उपस्थित हुआ। मेरी समझमें तो कुछ भी नहीं आता। मोहसे मेरी बुद्धि भ्रान्त हो रही है।

आनन्दने कहा—ब्रह्मर्षे ! संसारकी ऐसी ही व्यवस्था है। इसमें मोहके लिये कहाँ अवसर है। सोचिये तो कौन किसका पुत्र है और कौन किसका बन्धु। जीव जन्म लेनेके बादसे ही मनुष्योंका सम्बन्धी होता है, किन्तु मरते ही उसके सभी सम्बन्धी छूट जाते हैं। यहाँ भी जिसका जन्म हुआ है और जन्मके साथ ही बन्धु-बान्धवोंसे सम्बन्ध जुड़ गया है, उस देहका अन्त होते ही सारा सम्बन्ध टूट जाता है। इसीलिये मैं कहता हूँ, संसारमें रहनेवाले जीवका कोई भी बन्धु-बान्धव नहीं है। भला, कौन किसीके साथ सदा ही बन्धुत्व निभाता है। मैंने तो इसी जन्ममें दो माताएँ और दो पिता प्राप्त किये। फिर यदि दूसरी देह धारण करनेपर वे सम्बन्ध बढ़ें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः अब मैं तपस्या करूँगा। आप विशाल नामक ग्रामसे, इस राजाके पुत्रको, जो चैत्र नामसे विख्यात है, यहाँ बुला लीजिये।

आनन्दकी बात सुनकर राजा अपनी स्त्री और बन्धु-बान्धवोंके साथ बड़े विस्मयमें पड़े और उसकी ओरसे ममता हटाकर उन्होंने उसे वन जानेकी अनुमति दे दी। फिर अपने पुत्र चैत्रको बुलाकर उसे राज्य करनेके योग्य बनाया और जिसने गुप्त-बुद्धिसे उसका पालन किया था, उस ब्राह्मणका भी भलीभाँति सम्मान किया। आनन्द तपस्यामें लगे थे। उन्हें तपस्या करते देख ब्रह्माजीने पूछा—'वत्स ! बताओ तो सही, किसलिये इतना कठोर तप करते हो ?

१७२

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

आनन्दने कहा—भगवन्! मैं आत्मशुद्धिके लिये तपस्या कर रहा हूँ। बन्धनके हेतुभूत जो मेरे कर्म हैं, उनका नाश हो जाय—यही इस तपस्याका उद्देश्य है।

ब्रह्माजी बोले—जिसके कर्म-भोगका अधिकार क्षीण हो जाता है, वही मुक्तिके योग्य होता है। जिसके पास कर्मोंका संचय है, वह नहीं। तुम तो सत्त्वाधिकारी हो, मुक्ति कैसे पा सकोगे। तुम्हें छठा मनु होना है; चलो, अपने अधिकारका पालन करो। तुम्हारे लिये तपस्याकी आवश्यकता नहीं है। मनुकी मर्यादाका पालन करके तुम मुक्त हो जाओगे।

ब्रह्माजीके यों कहनेपर परम बुद्धिमान् आनन्दने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और तपस्यासे विरत होकर मनुका कार्य पूर्ण करनेके लिये वहाँसे चल दिये। ब्रह्माजीने उन्हें तपस्यासे हटाते समय चाक्षुष नामसे सम्बोधित किया था, इसलिये वे उसी नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने राजा उग्रकी कन्या विद्रम्भासे विवाह किया और उसके गर्भसे विख्यात पराक्रमी-अनेक पुत्र उत्पन्न किये। चाक्षुष मन्वन्तरमें आर्य्य, प्रसूत, भव्य, पृथग और लेख—ये पाँच देवगण थे। इन सभी गणोंमें आठ-आठ देवताओंका संनिवेश था। सब देवता यज्ञभोजी एवं अमृताशी थे। इन सबके स्वामी मनोजव नामक इन्द्र थे, जिन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका आधिपत्य प्राप्त किया था। उस समय सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उन्नत, मधु, अतिनामा और सहिष्णु—ये सात सप्तर्षि थे। ऊरु, पुरु और शतद्युम्न आदि महाबली नरेश चाक्षुष मनुके पुत्र थे, जिन्होंने इस पृथ्वीका राज्य किया। इस समय वैवस्वत नामके सातवें मनु राज्य करते हैं। उनके मन्वन्तरमें जो देवता आदि हुए हैं, उनका वर्णन सुनो।


वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय

मार्कण्डेयजी कहते हैं—विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा भगवान् सूर्यकी पत्नी हैं। उनके गर्भसे वैवस्वत मनुका जन्म हुआ, जो विख्यात यशस्वी और अनेक विषयोंके ज्ञानमें पारङ्गत थे। विवस्वान्के पुत्र होनेके कारण ही वे वैवस्वत कहलाये। जब भगवान् सूर्य संज्ञाकी ओर देखते तो वे अपनी आँखें बंद कर लेती थीं। इससे रुष्ट होकर सूर्यने संज्ञासे यह निष्ठुर वचन कहा—'ओ मूर्खे ! तू मुझे देखकर सदा नेत्रोंका संयम करती (आँखें मूँद लेती) है। इसलिये तेरे गर्भसे प्रजाजनोंको संयम (शासन)-में रखनेवाला यम उत्पन्न होगा।'

यह सुनकर संज्ञादेवी भयसे व्याकुल हो उठीं। उनकी दृष्टि चञ्चल हो गयी। यह देख सूर्यने फिर कहा—'तूने इस समय मुझे देखकर

  • वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय * १७३

अपनी दृष्टि चञ्चल की है, इसलिये चञ्चल लहरोंसे युक्त नदी तेरी कन्याके रूपमें उत्पन्न होगी। तदनन्तर पतिके शापसे संज्ञाने एक पुत्र और पुत्रीको जन्म दिया। पुत्रका नाम यम हुआ और पुत्री यमुना नामसे विख्यात महानदी हुई। संज्ञा सूर्यके तेजको बड़े कष्टसे सहन करती थी। वह उसके लिये असह्य था। उसने सोचा—‘क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँ जानेसे मुझे शान्ति मिलेगी और मेरे स्वामी मुझपर कुपित भी नहीं होंगे?’ इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके प्रजापतिकुमारी संज्ञाने पिताके घरका आश्रय लेना ही ठीक समझा। वहाँ जानेके लिये उद्यत होकर उसने अपनी छायाको ही सूर्यदेवकी पत्नी बनाया और उससे कहा—‘तू इस घरमें रह और मेरी ही तरह सब संतानों तथा भगवान् सूर्यके प्रति भी उत्तम बर्ताव करना।’

यों कहकर संज्ञादेवी अपने पिताके घर चली गयीं। वहाँ उन्होंने त्वष्टा प्रजापतिका दर्शन किया, उन्होंने भी बड़े आदरके साथ पुत्रीका स्वागत-सत्कार किया। वे कुछ कालतक वहाँ रहीं। इसके बाद पिताने उन्हें प्रेमपूर्वक समझाते हुए कहा—‘बेटी! तुम तीनों लोकके स्वामी भगवान् सूर्यकी पत्नी हो। अतः तुम्हें अधिक समयतक पिताके घरमें नहीं ठहरना चाहिये। अब तुम स्वामीके घर जाओ। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।’

पिताके यों कहनेपर संज्ञाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उन्हें प्रणाम करके वहाँसे चली गयीं। वे सूर्यके तेजसे बहुत डरती थीं और उनके तापका सामना करना नहीं चाहती थीं; इसलिये उत्तरकुरुमें जाकर घोड़ीके रूपमें रहने और तपस्या करने लगीं। उधर छायासंज्ञाको ही संज्ञा समझकर भगवान् सूर्यने उससे दो पुत्र और एक मनोहर कन्या उत्पन्न की। छायासंज्ञा अपनी संतानोंको जितना प्यार करती थी, उतना संज्ञाके पुत्र-पुत्रीको नहीं। मनु तो उसके इस बर्तावको सह लेते थे, किन्तु यमसे सहन नहीं हुआ। उन्होंने क्रोधमें आकर उसे मारनेके लिये लात उठायी, किन्तु फिर क्षमा-भावका आश्रय ले उसके शरीरपर लात नहीं लगायी। तब छायासंज्ञाने कुपित हो यमको शाप दिया—‘मैं तुम्हारे पिताकी पत्नी हूँ, किन्तु तुम मर्यादाका उल्लङ्घन करके मुझे मारनेके लिये लात उठा रहे हो; इसलिये तुम्हारा यह पैर आज ही पृथ्वीपर गिर पड़ेगा।’

माताका दिया हुआ शाप सुनकर यम भयसे व्याकुल हो उठे और अपने पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके बोले—‘पिताजी! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है; ऐसा तो कभी किसीने भी नहीं देखा होगा कि माता वात्सल्य छोड़कर अपने पुत्रको शाप दे डाले। दुर्गुणी पुत्रोंके प्रति भी माताका दुर्भाव नहीं होता।' यमराजकी यह बात सुनकर भगवान् सूर्यने छायासंज्ञाको बुलाकर पूछा—'संज्ञा कहाँ गयी?' वह बोली—'नाथ! मैं ही तो त्वष्टा प्रजापतिकी कन्या और आपकी पत्नी संज्ञा हूँ। आपने मुझसे ही ये संतान उत्पन्न किये हैं।' सूर्यने कई बार घुमा-फिराकर पूछा, किन्तु उसने सच्ची बात नहीं बतायी। तब सूर्यदेव उसे शाप देनेको उद्यत हुए, यह देख उसने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। असली बातका पता लगनेपर भगवान् सूर्य विश्वकर्माके घर गये। विश्वकर्माने अपने घर पधारे हुए त्रिलोकपूजित सूर्यदेवका बड़ी भक्तिके साथ पूजन किया। फिर संज्ञाका पता पूछनेपर उन्होंने कहा—‘भगवन्! वह मेरे घरपर आयी अवश्य थी, किन्तु मैंने पुनः उसे

१७४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

आपके ही घर भेज दिया।' तब सूर्यने समाधिस्थ होकर देखा, वह घोड़ीका रूप धारणकर उत्तरकुरु देशमें तपस्या कर रही है। उसकी तपस्याका एक ही उद्देश्य है, 'मेरे स्वामीकी आकृति सौम्य एवं शुभ हो जाय।' सूर्यको उसकी तपस्याका उद्देश्य ज्ञात हो गया; अतः उन्होंने विश्वकर्मासे कहा- 'आप मेरे तेजको छाँट दीजिये।' तब उन्होंने संवत्सररूप चक्रवाले सूर्यके तेजको छाँट दिया, उस समय देवताओने उनकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर देवताओं और ऋषियोंने सम्पूर्ण त्रिभुवनके पूजनीय भगवान् सूर्यका स्तवन आरम्भ किया-

देवा ऊचुः नमस्ते ऋक्स्वरूपाय सामरूपाय ते नमः। यजुःस्वरूपरूपाय साम्नां धामवते नमः॥ ज्ञानैकधामभूताय निर्धूततमसे नमः। शुद्धज्योतिःस्वरूपाय विशुद्धायामलात्मने॥ वरिष्ठाय वरेण्याय परस्मै परमात्मने। नमोऽखिलजगद्व्यापिस्वरूपायात्ममूर्त्तये ॥ सर्वकारणभूताय निष्ठाय ज्ञानचेतसाम्। नमः सूर्यस्वरूपाय प्रकाशात्मस्वरूपिणे॥ भास्कराय नमस्तुभ्यं तथा दिनकृते नमः। शर्वरीहेतवे चैव सन्ध्याज्योत्स्नाकृते नमः॥

देवता बोले—भगवन्! ऋग्वेदस्वरूप आपको नमस्कार है। सामवेदरूप आपको प्रणाम है। यजुर्वेदस्वरूप आपको नमस्कार है। आप ही समस्त सामोंके अधिष्ठान हैं, आपको प्रणाम है। आप ज्ञानके एकमात्र आधार एवं अन्धकारका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप शुद्ध ज्योतिर्मय है। आप स्वभावसे ही परम शुद्ध एवं निर्मलात्मा हैं, आपको प्रणाम है। आप सबसे महान्, सर्वश्रेष्ठ, सबसे परे और साक्षात् परमात्मा हैं। आपका स्वरूप सम्पूर्ण जगत्में व्यापक है। आप सबके आत्मरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सबकी उत्पत्तिके कारण, ज्ञानका चिन्तन करनेवाले पुरुषोंके प्राप्य स्थान, सूर्यस्वरूप तथा प्रकाशात्मारूप हैं। आपको नमस्कार है। प्रभाका विस्तार करनेवाले आपको नमस्कार है। दिनकी सृष्टि करनेवाले आपको प्रणाम है। रात्रिके हेतु भी आप ही हैं तथा संध्या, और चाँदनीकी सृष्टि भी आप ही करते हैं; आपको नमस्कार है।

त्वं सर्वमेतद् भगवन् जगदुद्भ्रमता त्वया। भ्रमत्यविद्धमखिलं ब्रह्माण्डं सचराचरम्॥ त्वदंशुभिरिदं स्पृष्टं सर्वं संजायते शुचि। क्रियते त्वत्करैः स्पर्शाज्जलादीनां पवित्रता॥ होमदानादिको धर्मो नोपकाराय जायते। तावद् यावन्न संयोगि जगदेतत् त्वदंशुभिः॥

भगवन्! आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। आपमें ही चराचर प्राणियोंसहित समस्त ब्रह्माण्ड ओतप्रोत है; अतएव ऊर्ध्वलोकमें जब आप भ्रमण करते हैं तो आपके साथ यह ब्रह्माण्ड भी घूमता है। आपकी किरणोंका स्पर्श पाकर ही सम्पूर्ण वस्तुएँ पवित्र होती हैं। आपकी किरणें ही अपने स्पर्शसे जल आदिको पवित्र करती हैं। जबतक इस जगत्में आपकी दिव्य रश्मियोंका संयोग नहीं होता, तबतक होम-दान आदि धर्म सफल नहीं हो पाता।

ऋचस्ते सकला होता यजूंष्येतानि चान्यतः। सकलानि च सामानि निपतन्ति त्वदङ्गतः॥ ऋङ्मयस्त्वं जगन्नाथ त्वमेव च यजुर्मयः। यतः साममयश्चैव ततो नाथ त्रयीमयः॥ त्वमेव ब्रह्मणो रूपं परं चापरमेव च। मूर्त्तामूर्त्तस्तथा सूक्ष्मः स्थूलरूपस्तथा स्थितः॥ निमेषकाष्ठादिमयः कालरूपः क्षयात्मकः।

  • वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिंक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय * १७५

प्रसीद स्वेच्छया रूपं स्वतेजःशमने कुरु॥

ऋग्वेदकी ये सम्पूर्ण ऋचाएँ, दूसरी ओर यजुर्वेदके ये सब मन्त्र तथा सामवेदकी सम्पूर्ण श्रुतियाँ आपके ही अङ्गोंसे प्रकट होती हैं। जगन्नाथ! आप ऋग्वैदमय हैं, आप ही यजुर्वेदमय हैं तथा आप ही सामवेदमय हैं। नाथ! इस प्रकार आप त्रयीमय हैं—तीनों वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही ब्रह्मके पर और अपर रूप हैं। मूर्त्त, अमूर्त्त, स्थूल और सूक्ष्म सभी रूपोंमें आपकी ही स्थिति है। निमेष, काष्ठा आदि जो कालके छोटे-छोटे विभाग हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं। आप ही क्षणात्मक (प्रतिक्षण बीतनेवाला) कालरूप हैं। भगवन्! आप प्रसन्न होइये और अपनी इच्छासे ही अपने प्रचण्ड तेजको शान्त कीजिये।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—देवताओं और देवर्षियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर तेजोराशि अविनाशी भगवान् सूर्यने विश्वकर्माके द्वारा अपने तेजको कम कर दिया। उनका जो ऋग्वेदद्मय तेज था, उससे पृथ्वीका निर्माण हुआ। यजुर्वेदमय तेजसे द्युलोककी रचना हुई और सामवेदमय तेज ही स्वर्गलोकके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ। विश्वकर्माने सूर्यके तेजके सोलह भागोंमेंसे पंद्रह भाग छाँट दिये और उनके द्वारा शंकरजीका त्रिशूल, भगवान् विष्णुका चक्र, वसुगणोंके भयंकर शङ्कु, अग्निकी शक्ति, कुबेरकी शिविका तथा अन्यान्य देवता, यक्ष एवं विद्याधरोंके लिये भयंकर अस्त्र शस्त्र बनाये। भगवान् सूर्य तबसे अपने तेजके सोलहवें भागको धारण करते हैं। तेज कम होनेके बाद वे अश्वका रूप धारण करके उत्तरकुरु नामक देशमें गये और वहाँ उन्होंने घोड़ीके रूपमें संज्ञाको देखा। उन्हें आते देख संज्ञाको पराये पुरुषकी आशङ्का हुई, इसलिये वह अपने पृष्ठभागकी रक्षा करती हुई सामनेकी ओरसे उनके सम्मुख गयी; फिर वहाँ उनके मिलनेपर पहले दोनोंकी नासिकाका संयोग हुआ। इससे अश्वरूपधारिणी संज्ञाके मुखसे दो पुत्र प्रकट हुए, जो नासत्य और दस्र नामसे प्रसिद्ध हुए। फिर वीर्यपातके अनन्तर रेवन्त नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ढाल, तलवार और कवच धारण किये, बाण और तरकससे सुसज्जित हो घोड़ेपर चढ़ा हुआ ही प्रकट हुआ था।

तत्पश्चात् भगवान् सूर्यने संज्ञाको अपने अनुपम स्वरूपका दर्शन कराया। उनके इस रूपको देखकर संज्ञाको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर उसने भी अपना रूप धारण कर लिया। तब सूर्यदेव अपनी प्रीतिमती पत्नी संज्ञाको साथ ले अपने निवास-स्थानपर आये। भगवान् सूर्यके जो प्रथम पुत्र थे, उनकी वैवस्वत नामसे प्रसिद्धि हुई। दूसरे पुत्रका नाम यम था। ये माताके शापसे ग्रस्त थे। पिताने इनके शापका अन्त इस प्रकार किया था—‘कीड़े यमके पैरका मांस लेकर पृथ्वीपर गिर पड़ेंगे। फिर इनका पैर ठीक हो जायगा।’ यम धर्मपर दृष्टि रखते थे और मित्र तथा शत्रुके प्रति उनका समान भाव था। अतः सूर्यने प्रजाओंके धर्माधर्मका फल देनेके लिये उन्हें यमराजके पदपर प्रतिष्ठित किया। यमुना कलिन्दपर्वतके बीचसे बहनेवाली नदी हो गयी। दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके वैद्य नियुक्त किये गये। रेवन्तको भी गुह्यकोंका स्वामी बनाया गया। अब छायासंज्ञाके पुत्रोंकी जहाँ नियुक्ति हुई, उसका हाल सुनो। छायासंज्ञाके ज्येष्ठ पुत्रका वर्ण (रूप-रंग) वैवस्वत मनुके ही समान था, अतः वे सावर्णिंक नामसे प्रसिद्ध हुए। वे ही आठवें मनु होंगे। उस समय राजा बलि इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित रहेंगे। छायाके दूसरे पुत्र शनैश्चरको पिताने ग्रहोंके

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
पद्ममें नियुक्त किया। तीसरी संतान तपती नामकी कन्या थी। उसने राजा संवरणको अपना स्वामी बनाया और उनसे कुरु नामक पुत्रको जन्म दिया। ये कुरु एक प्रसिद्ध राजा हुए। <br> वैवस्वत मन्वन्तरमें आठ देवगण माने गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुत्, भृगु तथा अङ्गिरा। इनमें आदित्यगण, मरुद्गण तथा रुद्रगण कश्यपजीके पुत्र हैं। साध्यगण, वसुगण और विश्वेदेवगण—ये धर्मके पुत्र हैं। भृगुगण भृगुके और आङ्गिरसगण महर्षि अङ्गिराके पुत्र हैं। ब्रह्मन्! यह सब नारीच सर्ग है। मरीचिनन्दन कश्यपकी संतान होनेके कारण इन्हें मारीच कहते हैं। इस मन्वन्तरमें जो इन्द्र हैं, उनका नाम ऊर्जस्वी है। वे महात्मा यज्ञभागके भोक्ता हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानमें जो इन्द्र होते हैं, उन सबका लक्षण एक सा ही समझना चाहिये। <br> अब वर्तमान त्रिलोकीका वर्णन सुनो। भूर्लोक तो यह पृथ्वी है। अन्तरिक्षको द्युलोक या भुवर्लोक माना गया है और दिव्यलोकको स्वर्लोक कहते हैं। अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र तथा जमदग्नि—ये ही इस मन्वन्तरके सप्तर्षि हैं। इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, करूष और पृषध्र—ये नौ वैवस्वत मनुके पुत्र कहे गये हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे यह वैवस्वत मन्वन्तरका वर्णन किया है। इसका श्रवण और पाठ करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता और महान् पुण्यका भागी होता है। <br> क्रौष्टुकि बोले— महामुने! आपने स्वायम्भुव आदि सात मनुओंका वर्णन किया तथा उनकेमन्वन्तरोंमें जो देवता, राजा और मुनि हुए थे, उनको भी बतलाया। इस कल्पमें जो दूसरे सात मनु होंगे, उनका परिचय दीजिये तथा उनके मन्वन्तरोंमें जो देवता आदि होनेवाले हैं, उनका भी वर्णन कीजिये। <br> मार्कण्डेयजीने कहा— ब्रह्मन्! छायासंज्ञाके पुत्र सवर्णिका नाम मैं तुम्हें बतला चुका हूँ। वे सब बातोंमें अपने बड़े भाई वैवस्वत मनुके ही समान हैं। ये ही आठवें मनु होंगे। परशुराम, व्यास, गालव, दीप्तिमान्, कृप, ऋष्यशृङ्ग तथा अश्वत्थामा—ये सात सावर्णि मन्वन्तरमें सप्तर्षि होंगे। सुतपा, अमिताभ और मुख्य—ये तीन देवगण होंगे। इनमेंसे प्रत्येक गण पृथक्-पृथक् बीस-बीस देवताओंका समुदाय होगा। तपस्तप, शक्र, द्युति, ज्योति, प्रभाकर, प्रभास, दयित, धर्म, तेज, रश्मि तथा वक्रतु आदि देवता सुतपागणके बीस देवताओंके अन्तर्गत हैं। प्रभु, विभु और विभास आदि देवता अमिताभ नामक द्वितीय गणके बीस देवताओंके अन्तर्गत हैं। तीसरे गणके जो बीस देवता हैं, उनमें दम, दान्त, रित, सोम और विन्त आदि प्रधान हैं। वे मुख्यगणके देवता कहे गये हैं। ये सभी मन्वन्तरके स्वामी होंगे। ये मरीचिनन्दन प्रजापति कश्यपके ही पुत्र हैं। विरोचनके पुत्र बलि इनके इन्द्र होंगे। वे बलि आज भी अपनी प्रतिज्ञाके बन्धनसे बँधकर पाताललोकमें विराजमान हैं। विरजा, अर्ववीर, निर्मोह, सत्यवाक्, कृति तथा विष्णु आदि सावर्णि मनुके पुत्र होंगे।
  • मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना * १७७ सावर्णि मनुकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें देवी-माहात्म्य प्रथमोऽध्यायः मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वधका प्रसङ्ग सुनाना विनियोग [ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः । प्रथम चरित्रके ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व और ऋग्वेद स्वरूप है। श्रीमहाकाली देवताकी प्रसन्नताके लिये प्रथम चरित्रके जपमें विनियोग किया जाता है। ध्यान खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् । नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥ भगवान् विष्णुके सो जानेपर मधु और कैटभको मारनेके लिये कमलजन्मा ब्रह्माजीने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवीका मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथोंमें खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अङ्गोंमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके शरीरकी कान्ति नीलमणिके समान है तथा वे दस मुख और दस पैरोंसे युक्त हैं।] ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ 'ॐ ऐं' मार्कण्डेय उवाच ॥ १ ॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः । निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥ २ ॥ महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः । स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥ ३ ॥ स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः । सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥ ४ ॥ तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् । बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥ ५ ॥ तस्य तैरभवद्युद्धमतिप्रबलदण्डिनः । न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ ६ ॥ ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् । आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥ ७ ॥ मार्कण्डेयजी बोले- ॥ १ ॥ सूर्यके पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्तिकी कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥ २ ॥ सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामायाके अनुग्रहसे जिस प्रकार मन्वन्तरके स्वामी हुए, वही प्रसङ्ग सुनाता हूँ ॥ ३ ॥ पूर्वकालकी बात है, स्वारोचिष मन्वन्तरमें सुरथ नामके एक राजा थे, जो चैत्रवंशमें उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डलपर अधिकार था ॥ ४ ॥ वे प्रजाका अपने औरस पुत्रोंकी भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे; फिर भी उस समय कोलाविध्वंसी२ नामके क्षत्रिय उनके शत्रु हो १. ॐ चण्डीदेवीको नमस्कार है। २. 'कोलाविध्वंसी' यह किसी विशेष कुलके क्षत्रियोंकी संज्ञा है। दक्षिणमें 'कोला' नगरी प्रसिद्ध है, वह प्राचीन कालमें राजधानी थी। जिन क्षत्रियोंने उसपर आक्रमण करके उसको विध्वस्त किया, वे 'कोलाविध्वंसी' कहलाये।

१७८ « संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * गये॥५॥ राजा सुरथकी दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओंके साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्यामें कम थे तो भी राजा सुरथ युद्धमें उनसे परास्त हो गये ॥ ६ ॥ तब वे युद्धभूमिसे अपने नगरको लौट आये और केवल अपने देशके राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वीसे अब उनका अधिकार जाता रहा) किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओंने उस समय महाभाग राजा सुरथपर आक्रमण कर दिया ॥७॥ प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥१९॥ राजाका बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा मन्त्रियोंने वहाँ उनकी राजधानीमें भी राजकीय सेना और खजानेको वहाँसे हथिया लिया ॥ ८ ॥ सुरथका प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलनेके बहाने घोड़ेपर सवार हो वहाँसे अकेले ही एक घने अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः। कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८ ॥ ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः। एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ ९ ॥ स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः। प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ १० ॥ तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः। इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥ ११ ॥ सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः। १ मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥ १२ ॥ मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा। न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ॥ १३ ॥ मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते । ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥ १४ ॥ अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् । असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ॥ १५ ॥ संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति । एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ १६ ॥ तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः । स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥ १७ ॥ सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ॥ १८ ॥ जङ्गलमें चले गये ॥ ९ ॥ वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनिका आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव [अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम शान्तभावसे रहते थे। मुनिके बहुत-से शिष्य उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १० ॥ वहाँ जानेपर मुनिने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठके आश्रमपर इधर उधर विचरते हुए कुछ कालतक वहाँ रहे ॥ ११ ॥ फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे- १. पाठान्तर-ममत्वाकृष्टमानसः ।

• मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना • १७९

'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा ? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा—'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?' राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा—॥ १२–१९ ॥

वैश्य उवाच ॥ २० ॥

समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥ २१ ॥
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ॥ २२ ॥
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ॥ २३ ॥
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥ २४ ॥
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥ २५ ॥

वैश्य बोला— ॥ २० ॥ राजन्! मैं धनियोंके कुलमें उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है॥ २१॥ मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रोंने धनके लोभसे मुझे घरसे बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रसे वञ्चित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओंने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दुखी होकर मैं वनमें चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बातको नहीं जानता कि मेरे पुत्रोंकी, स्त्रीकी और स्वजनोंकी कुशल है या नहीं। इस समय घरमें वे कुशलसे रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है ? ॥ २२—२४॥ वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं ॥ २५ ॥

राजोवाच ॥ २६ ॥

यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥ २७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ २८ ॥

राजाने पूछा— ॥ २६ ॥ जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदिने धनके कारण तुम्हें घरसे निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्तमें इतना स्नेह क्यों है? ॥ २७–२८ ॥

वैश्य उवाच ॥ २९ ॥

एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ॥ ३० ॥
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥ ३१ ॥

१८० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः । राजोवाच ॥ ३९ ॥ किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥ ३२ ॥ भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥ ४० ॥ यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु । दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां बिना। तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥ ३३ ॥ ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥ ४१ ॥ करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ ३४ ॥ जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम। वैश्य बोला- ॥ २९ ॥ आप मेरे विषयमें जो अयं च निकृतः १ पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ ४२ ॥ बात कहते हैं, वह सब ठीक है ॥ ३० ॥ किंतु क्या स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति । करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥ ४३ ॥ जिन्होंने धनके लोभमें पड़कर पिताके प्रति स्नेह, दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ । पत्तिके प्रति प्रेम तथा आत्मीय जनके प्रति अनुरागको तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ ४४ ॥ तिलाञ्जलि दे मुझे घरसे निकाल दिया है, उन्हींके ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥ ४५ ॥ प्रति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है। महामते ! गुणहीन राजा ने कहा - ॥ ३९ ॥ भगवन् ! मैं आपसे बन्धुओंके प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये ॥ ४० ॥ प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बातको मैं मेरा चित्त अपने अधीन न होनेके कारण वह बात जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी मेरे मनको बहुत दुःख देती है। मुनिश्रेष्ठ ! जो साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित राज्य मेरे हाथसे चला गया है, उसमें और उसके हो रहा है॥ ३१-३३॥ उन लोगोंमें प्रेमका सम्पूर्ण अङ्गोंमें मेरी ममता हो रही है ॥ ४१ ॥ यह सर्वथा अभाव है तो भी उनके प्रति जो मेरा मन जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ ॥ ३४ ॥ अज्ञानीकी भाँति मुझे उसके लिये दुःख होता है; मार्कण्डेय उवाच ॥ ३५ ॥ यह क्या है ? इधर यह वैश्य भी घरसे अपमानित ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥ ३६॥ होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्योंने समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । इसको छोड़ दिया है ॥ ४२ ॥ स्वजनोंने भी इसका कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथाई तेन संविदम् ॥ ३७॥ परित्याग कर दिया है, तो भी इसके हृदयमें उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥ ३८ ॥ उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है। इस प्रकार यह तथा 'मार्कण्डेयजी कहते हैं- ॥ ३५ ॥ ब्रह्मन् ! मैं दोनों ही बहुत दुखी हैं ॥ ४३ ॥ जिसमें प्रत्यक्ष तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि दोष देखा गया है, उस विषयके लिये भी हमारे नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनिकी मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है। सेवामें उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य महाभाग ! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है ? विवेकशून्य वैश्य और राजाने कुछ वार्तालाप आरम्भ पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता किया ॥ ३६-३८ ॥ प्रत्यक्ष दिखायी देती है ॥ ४४-४५ ॥ १. पा०- निष्कृतः । २. पा०- तत्किमेतन् ।