संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
आनन्दने कहा—भगवन्! मैं आत्मशुद्धिके लिये तपस्या कर रहा हूँ। बन्धनके हेतुभूत जो मेरे कर्म हैं, उनका नाश हो जाय—यही इस तपस्याका उद्देश्य है।
ब्रह्माजी बोले—जिसके कर्म-भोगका अधिकार क्षीण हो जाता है, वही मुक्तिके योग्य होता है। जिसके पास कर्मोंका संचय है, वह नहीं। तुम तो सत्त्वाधिकारी हो, मुक्ति कैसे पा सकोगे। तुम्हें छठा मनु होना है; चलो, अपने अधिकारका पालन करो। तुम्हारे लिये तपस्याकी आवश्यकता नहीं है। मनुकी मर्यादाका पालन करके तुम मुक्त हो जाओगे।
ब्रह्माजीके यों कहनेपर परम बुद्धिमान् आनन्दने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और तपस्यासे विरत होकर मनुका कार्य पूर्ण करनेके लिये वहाँसे चल दिये। ब्रह्माजीने उन्हें तपस्यासे हटाते समय चाक्षुष नामसे सम्बोधित किया था, इसलिये वे उसी नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने राजा उग्रकी कन्या विद्रम्भासे विवाह किया और उसके गर्भसे विख्यात पराक्रमी-अनेक पुत्र उत्पन्न किये। चाक्षुष मन्वन्तरमें आर्य्य, प्रसूत, भव्य, पृथग और लेख—ये पाँच देवगण थे। इन सभी गणोंमें आठ-आठ देवताओंका संनिवेश था। सब देवता यज्ञभोजी एवं अमृताशी थे। इन सबके स्वामी मनोजव नामक इन्द्र थे, जिन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका आधिपत्य प्राप्त किया था। उस समय सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उन्नत, मधु, अतिनामा और सहिष्णु—ये सात सप्तर्षि थे। ऊरु, पुरु और शतद्युम्न आदि महाबली नरेश चाक्षुष मनुके पुत्र थे, जिन्होंने इस पृथ्वीका राज्य किया। इस समय वैवस्वत नामके सातवें मनु राज्य करते हैं। उनके मन्वन्तरमें जो देवता आदि हुए हैं, उनका वर्णन सुनो।
वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय
मार्कण्डेयजी कहते हैं—विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा भगवान् सूर्यकी पत्नी हैं। उनके गर्भसे वैवस्वत मनुका जन्म हुआ, जो विख्यात यशस्वी और अनेक विषयोंके ज्ञानमें पारङ्गत थे। विवस्वान्के पुत्र होनेके कारण ही वे वैवस्वत कहलाये। जब भगवान् सूर्य संज्ञाकी ओर देखते तो वे अपनी आँखें बंद कर लेती थीं। इससे रुष्ट होकर सूर्यने संज्ञासे यह निष्ठुर वचन कहा—'ओ मूर्खे ! तू मुझे देखकर सदा नेत्रोंका संयम करती (आँखें मूँद लेती) है। इसलिये तेरे गर्भसे प्रजाजनोंको संयम (शासन)-में रखनेवाला यम उत्पन्न होगा।'
यह सुनकर संज्ञादेवी भयसे व्याकुल हो उठीं। उनकी दृष्टि चञ्चल हो गयी। यह देख सूर्यने फिर कहा—'तूने इस समय मुझे देखकर