भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 171
  • चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन * १७१

अर्थ यह है कि तुमने मुझे त्याग दिया। लो, तुमसे प्राप्त होनेवाले स्वार्थका मैंने परित्याग कर दिया।

यों कहकर वह बालकको वहीं छोड़ सूतिका गृहसे बाहर निकल गयी। उसी समय जातहारिणीने उस शुद्धात्मा बालकको हड़प लिया और उसे ले जाकर राजा विक्रान्तकी पत्नीके शयन-गृहमें सुला दिया। फिर रानीके नवजात पुत्रको ले जाकर दूसरेके घरमें रख दिया और उसके बालकको ले जाकर अपना ग्रास बना लिया। इस प्रकार नवजात शिशुओंको चुरानेवाली वह क्रूर राक्षसी तीसरे घरके बालकको खा लिया करती थी। बालकोंके चुराने और बदलनेका काम वह प्रतिदिन करती थी। राजा विक्रान्तने अपने घरमें आये हुए बालकका क्षत्रियोचित संस्कार कराया और बड़ी प्रसन्नताके साथ नामकरण-संस्कारकी विधि पूरी करके उसका नाम आनन्द रखा। जब बालक कुछ बड़ा हुआ, तब उसका उपनयन-संस्कार करते समय आचार्यने कहा—'वत्स ! पहले अपनी माँके पास जाकर उन्हें प्रणाम करो।' गुरुकी बात सुनकर बालक हँस पड़ा और बोला—'गुरुदेव ! मैं किस माताको प्रणाम करूँ—जन्म देनेवाली अथवा पालन करनेवालीको ? मैं राजा अनमित्रके घरमें उनकी धर्मपत्नी गिरिभद्रा देवीके गर्भसे उत्पन्न हुआ; किन्तु जातहारिणी मुझे उठा ले आयी और यहाँ हैमिनीके पास छोड़कर इसके पुत्रको स्वयं उठा ले गयी। फिर उसे भी विप्रवर घोषके गृहमें ले जाकर उसने रख दिया और उनके पुत्रको हड़पकर भक्षण कर लिया। रानी हैमिनीका पुत्र वहाँ ब्राह्मणोचित संस्कारोंके साथ पालित हो रहा है और मेरा यहाँ आप संस्कार करा रहे हैं। मुझे आपकी आज्ञाका पालन करना है; अतः बताइये, किस माताके पास प्रणाम करनेके लिये जाऊँ ?'

गुरु बोले—बेटा ! यह बड़ा गहन संकट उपस्थित हुआ। मेरी समझमें तो कुछ भी नहीं आता। मोहसे मेरी बुद्धि भ्रान्त हो रही है।

आनन्दने कहा—ब्रह्मर्षे ! संसारकी ऐसी ही व्यवस्था है। इसमें मोहके लिये कहाँ अवसर है। सोचिये तो कौन किसका पुत्र है और कौन किसका बन्धु। जीव जन्म लेनेके बादसे ही मनुष्योंका सम्बन्धी होता है, किन्तु मरते ही उसके सभी सम्बन्धी छूट जाते हैं। यहाँ भी जिसका जन्म हुआ है और जन्मके साथ ही बन्धु-बान्धवोंसे सम्बन्ध जुड़ गया है, उस देहका अन्त होते ही सारा सम्बन्ध टूट जाता है। इसीलिये मैं कहता हूँ, संसारमें रहनेवाले जीवका कोई भी बन्धु-बान्धव नहीं है। भला, कौन किसीके साथ सदा ही बन्धुत्व निभाता है। मैंने तो इसी जन्ममें दो माताएँ और दो पिता प्राप्त किये। फिर यदि दूसरी देह धारण करनेपर वे सम्बन्ध बढ़ें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः अब मैं तपस्या करूँगा। आप विशाल नामक ग्रामसे, इस राजाके पुत्रको, जो चैत्र नामसे विख्यात है, यहाँ बुला लीजिये।

आनन्दकी बात सुनकर राजा अपनी स्त्री और बन्धु-बान्धवोंके साथ बड़े विस्मयमें पड़े और उसकी ओरसे ममता हटाकर उन्होंने उसे वन जानेकी अनुमति दे दी। फिर अपने पुत्र चैत्रको बुलाकर उसे राज्य करनेके योग्य बनाया और जिसने गुप्त-बुद्धिसे उसका पालन किया था, उस ब्राह्मणका भी भलीभाँति सम्मान किया। आनन्द तपस्यामें लगे थे। उन्हें तपस्या करते देख ब्रह्माजीने पूछा—'वत्स ! बताओ तो सही, किसलिये इतना कठोर तप करते हो ?